ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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प्राप्त करें। 'सहृदयोदयलाभहेतोः' यह ग्रन्थान्त के श्लोक का शब्द भी सहृदय के उदयलाभ के लिए अर्थात् सहृदय द्वारा प्रवर्तित ध्वनि-सिद्धान्त की प्रगति के लिए आनन्दवर्धन का प्रयत्न निर्देश करता है। 'सहृदय' के पर्यायवाची 'सचेतस्' का प्रयोग कारिका, वृत्ति और लोचन में अनेक स्थलों पर मिलता है। लोचन ने 'सहृदय' का लक्षण भी प्रस्तुत किया है (पृ० ३९-४०)। लोचन ने आनन्दवर्धन को 'सहृदयचक्रवर्ती' कहा है (पृ० ४२)। म० म० काणे लिखते हैं कि कारिकाकार के नाम का प्रश्न कारिका और वृत्ति के लेखक के प्रश्न से पृथक् है। जो विद्वान् भिन्नकर्तृकत्ववादी हैं, तर्क दे सकते हैं कि कारिकाकार का नाम ज्ञात नहीं है। प्रो० सोवानी ने कारिकाकार का नाम 'सहृदय' बताया। मुकुल के अनुसार सम्भव है कि कारिकाकार 'सहृदय' थे अथवा प्रतीहारेन्दुराज के अनुसार समग्र ग्रन्थ के रचयिता थे। राघवभट्ट ने ग्रन्थ का नाम 'सहृदयहृदयालोक' निर्दिष्ट किया है। अभिनवभारती के उद्धरण के अनुसार अभिनवगुप्त भट्टनायक के ग्रन्थ को 'सहृदयदर्पण' कहते हैं ('भट्टनायकस्तु ब्रह्मणा परमात्मना यदुदाहृतं......इति व्याख्यानं सहृदयदर्पणे पर्यग्रहीत्' अ० भा० भाग १, पृ० ४-५)। लोचन में 'हृदयदर्पण' के नाम से यह ग्रन्थ उद्धृत है। म० म० काणे महाशय 'हृदयदर्पण' से अधिक 'सहृदयदर्पण' पसंद करते हैं। जैसा कि काणे महाशय समझते हैं अभिनवभारती (भाग १, पृ० १७३) में "अत एव सहृदयाः स्मरन्ति 'वध (स) य चूडामणिआ' " में 'सहृदय' का प्रयोग किसी ग्रन्थकार के लिए किया है। कारिकाकार का नाम 'सहृदय' था इसका निर्देश व्यक्तिविवेक के रुय्यककृत व्याख्यान में भी मिलता है, जैसा कि व्यक्तिविवेक के द्वितीय विमर्श के आरम्भ में लिखा है—'तत्र विभावाअनुभावव्यभिचारिणामयथायथं रसेषु यो विनियोगस्तन्मात्रलक्षणमैकमन्तरङ्गमाद्यैरेवो- क्तमिति नेह प्रतन्यते।' इस पर व्याख्यान है—'उक्तमिति सहृदयैः'। इस प्रकार 'सहृदयैः' कह कर कारिकाग्रन्थ का निर्देश किया है (ध्वनिकारिका ३।१०)। अभिन्नकर्तृकत्ववादी डॉ० मुकर्जी का सबसे मूलभूत तर्क है कि परम्परा सम्पूर्ण ध्वन्यालोक को एक व्यक्ति की, वह भी आनन्दवर्धन की कृति मानती है। काणे महाशय का मूलभूत आधार है अभिनवगुप्त का 'लोचन', जिसमें कारिकाकार और वृत्तिकार को भिन्न रूप से निर्देश किया गया है। दोनों पक्षों के विद्वानों के पास अपने-अपने पक्ष के समर्थन में अन्तः-बाह्य प्रमाण हैं, जिनका विस्तारपूर्वक ऊपर निर्देश किया गया। किन्तु नितान्त सन्देहरहित होकर किसी एक पक्ष में अपना निर्णय देना अत्यन्त कठिन है, जब कि अनुकूल तर्क दोनों पक्षों में संकलित मिलते हैं। फिर भी इतना अवश्य कहा जा सकता है कि आगे के जिन आलंकारिकों ने सम्पूर्ण ध्वन्यालोक को ध्वनिकार या आनन्दवर्धन की कृति माना और निर्देश किया है उनकी दृष्टि से 'लोचन' भी अवश्य ही गुजरा होगा, ऐसी स्थिति में स्वाभाविक था कि 'लोचन' द्वारा कारिकाकार और वृत्तिकार के पृथक्- करण के प्रति उनका ध्यान अवश्य आकर्षित होता, किन्तु ऐसा किसी ने नहीं किया। इस प्रकार के पृथक्करण की कल्पना डॉ० बूहलर द्वारा प्रस्तुत की गई और काव्यमाला संस्करण के सम्पादकों ने उसे सर्वथा मान लिया। म० म० काणे महाशय ने उसकी प्रबल तर्कों से युक्तिसंगत पुष्टि की। फिर भी, तर्कों की पेचीदगी से कुछ हट कर सामान्यतः देखें तो अभी तक कारिकाकार और वृत्तिकार दोनों आनन्दवर्धन ही ठहरते हैं। जब तक 'चन्द्रिका' व्याख्या और भट्टनायक का 'हृदयदर्पण' ग्रन्थ प्रकाश में नहीं आ जाते तब तक इस समस्या का पूर्णतः समाधान देना सम्भव नहीं। इसका