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ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

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( ३६ ) जिसने ध्वनि सिद्धान्त का प्रतिपादन किया, अथवा बहुत अधिक सम्भव है कि यह उसके प्रशंसकों की दी हुई उपाधि हो । राजशेखर ने 'आनन्द' का नाम लेते हुए 'काव्यमीमांसा' में 'अव्युत्पत्तिकृतो दोषः०' इस श्लोक को उद्धृत किया है जो ध्वन्यालोक के वृत्तिग्रन्थ का परिकर श्लोक है (पृ० ३४६) । इससे प्रतीत होता है कि ९००-९२५ ई० के लगभग यह सर्वविदित था कि आनन्दवर्धन वृत्ति के रचयिता थे । इससे अभिन्नत्व सिद्ध नहीं होता । जल्हण की सूक्तिमुक्तावली में राजशेखर के नाम से यह श्लोक उद्धृत है— 'ध्वनिनाऽतिगभीरेण काव्यतत्त्वनिवेशिना । आनन्दवर्धनः कस्य नासीदानन्दवर्धनः ॥' इससे प्रतीत होता है कि आनन्दवर्धन ने 'ध्वनि' की स्थापना की । प्रतीहारेन्दुराज के उद्धरणों से विदित होता है कि वह कारिका और वृत्ति दोनों के रचयिता को 'सहृदय' कहते हैं । 'वक्रोक्तिजीवित' ( कुन्तकरचित ) रूढ़िवक्रता के उदाहरण में आनन्दवर्धन के निजी श्लोक 'ताला जाअन्ति गुणा०' (पृ० १७८) को रखा तथा निर्देश किया—'ध्वनिकारेण व्यङ्ग्यव्यञ्जक- भावोऽत्र सुतरां समर्थितः किं पौनरुक्त्येन ।' इस प्रकार वक्रोक्तिजीवित आनन्दवर्धन को 'ध्वनिकार' कहता हैं । 'लोचन' के बहुत कुछ समसामयिक महिमभट्ट के 'व्यक्तिविवेक' में कारिका और वृत्तिग्रन्थों के लेखक का पृथक्करण नहीं किया है। ध्वनिकार के नाम से कारिकाग्रन्थ और वृत्तिग्रन्थ दोनों को आचार्य कुन्तक ने उद्धृत किया है। यहाँ तक कि 'अर्थो वाच्यविशेष इति स्वयं विवृतत्वाच्च' (पृ० ८२) के द्वारा स्पष्ट कह दिया कि कारिकाओं के रचयिता ने ही स्वयं वृत्ति लिखी है । 'औचित्यविचारचर्चा' में क्षेमेन्द्र ने 'विरोधी वाविरोधी वा०' (३।२४) इस कारिका को आनन्दवर्धन के नाम के साथ उद्धृत किया है । हेमचन्द्र ने 'काव्यानुशासन' में 'प्रतीयमानं पुनरन्यदेव०' ( १।४) को आनन्दवर्धन की लिखा है। साहित्यदर्पणकार ने भी कारिका और वृत्तिग्रन्थों को ध्वनिकार की रचना बताई है । इस परिस्थिति में जब कि कारिकाकार और वृत्तिकार के भिन्न होने और न होने, दोनों के विरोधी प्रमाण मिलते हैं, दो ही रचनाएं समस्या का समाधान कर सकती थीं, एक तो 'चन्द्रिका' व्याख्या, जो लोचन से पूर्व ध्वन्यालोक पर लिखी गई थी, दूसरी भट्टनायक का 'हृदयदर्पण', जिसमें ध्वन्यालोक की खूब आलोचना की गई थी, किन्तु दुर्भाग्य से दोनों रचनाएं अभी तक उपलब्ध नहीं की जा सकी हैं। म० म० काणे महाशय का ख्याल है कि यदि लोचन का उपर्युक्त अंश 'चन्द्रिका' को ठीक रूप में उपस्थित करता है तो लगता है कि 'चन्द्रिका' कारिकाकार और वृत्तिकार को भिन्न मानती है। काणे महाशय 'लोचन' के अंश को मुकुलभट्ट को ठीक मानते हैं तथा कुन्तक, महिमभट्ट और क्षेमेन्द्र आदि को कहते हैं कि उन्होंने ठीक परम्परा ग्रहण नहीं की । ध्वन्यालोक में 'सहृदय' शब्द का अनेक स्थलों पर प्रयोग मिलता है। प्रथम कारिका के 'सहृदयमनःप्रीतये' की वृत्ति है—'रामायणमहाभारतप्रभृतिनि लक्ष्ये सर्वत्र प्रसिद्धव्यवहारं लक्षयतां सहृदयानामानन्दो मनसि लभतां प्रतिष्ठामिति प्रकाश्यते' (पृ० ३७) । इसका दूसरा तात्पर्य यह भी हो सकता है कि आनन्द (आनन्दवर्धनाचार्य) ध्वनि के प्रतिष्ठापक 'सहृदय' के मन में प्रतिष्ठा