भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

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( ३८ ) श्री गोडा वर्मा ने कुछ ऐसे कारिका और वृत्ति के विरोधी स्थलों का निर्देश किया है जिनसे कारिकाकार और वृत्तिकार के भिन्न होने का अनुमान होता है, उनके द्वारा निर्दिष्ट कुछ स्थल काणे महाशय के अनुसार विचारणीय हैं । ( क ) कारिका १।४ ‘प्रतीयमानं पुनरन्यदेव०’ (पृ० ४७) में वृत्ति ने ‘प्रसिद्ध’ की दो व्याख्याएं प्रस्तुत की हैं—‘यत्तत्सहृदयसुप्रसिद्धं प्रसिद्धेभ्योऽलङ्कृतेभ्यः प्रतीतेम्यो वाऽवयवेभ्यो व्यतिरिक्तत्वेन प्रकाशते’; ‘लोचन’ का भी निर्देश है—‘प्रसिद्धशब्दस्य सर्वप्रतीतत्वमलङ्कृतत्वं चार्थः’ ( पृ० ४८ ) । यदि कारिकाकार और वृत्तिकार एक व्यक्ति थे तो वह वृत्ति में एक अर्थ करते । ( ख ) कारिका २।१० है—‘समर्पकत्वं काव्यस्य यत्तु सर्वरसान् प्रति । स प्रसादो गुणो ज्ञेयः सर्वसाधारणक्रियः ॥’ ( पृ० २२४ ) इसमें ‘सर्वरसान् प्रति’ के अनुसार ‘सर्वसाधारणक्रियः’ का ‘सर्व’ शब्द ‘सर्वरस’ का निर्देशक है, किन्तु वृत्ति में ‘सर्वरससाधारणो गुणः सर्वरचनासाधारणश्च’ है, इस प्रकार दूसरी व्याख्या अनावश्यक है और ( डॉ० मुकर्जी ने जैसा कि कहा है ) ‘उत्सूत्रव्याख्यान’ है । ( ग ) ३।१९ कारिका का उत्तरार्ध है—‘रसंस्य स्याद् विरोध्याय वृत्त्यनौचित्यमेव वा ।’ इसकी वृत्ति में ‘वृत्ति’ शब्द के तीन अर्थ हैं । ( श्री वर्मा के लेख का यह उद्धरण श्री काणे महाशय ने अपने ग्रन्थ में प्रस्तुत किया है ) । म० म० काणे महाशय ग्रन्थ के नाम के सम्बन्ध में निर्देश करते हैं कि ग्रन्थ की पुष्पिकाओं ( Colophons ) में इसे प्रायः सहृदयालोक, सहृदयहृदयालोक, काव्यालोक, काव्यालङ्कार और ध्वनि कहा गया है । लोचन के आरम्भिक दूसरे पद्य में ग्रन्थ का नाम ‘काव्यालोक’ निर्दिष्ट है ( यत्किञ्चिदप्यनुसरन् स्फुटयामि काव्य;लोकं सुलोचननियोजनया जनस्य ) । लोचन (चतुर्थ उद्योत) के अन्त का द्वितीय श्लोक आनन्दवर्धन के ग्रन्थ का नाम ‘काव्यालोक’ कहता है ( आनन्दवर्धन- विवेकविकासिकाव्यालोकार्थतत्त्वघटनादनुमेयसारम् ) । अभिनवभारती में स्वयं अभिनवगुप्त ने इसे ‘सहृदयालोक’ कहा है । चतुर्थ उद्योत के वृत्तिग्रन्थ के अन्त में ‘काव्याख्येऽखिलसौख्यधाम्नि विबुधो- द्याने ध्वनिदर्शितः’ के अनुसार ‘काव्य’ शब्द मूलग्रन्थ के नाम का भाग है, अथवा स्वयं नाम है, जिस पर आनन्दवर्धन ने वृत्ति लिखी ( सम्भवतः उसे काव्यध्वनि कहा जाता हो अथवा काव्य या ध्वनि ) । ३।४७ कारिका के अनुसार कारिकाएं ‘काव्यलक्षण’ हैं ( वृत्तयोऽपि प्रकाशन्ते ज्ञातेऽस्मिन् काव्यलक्षणे ) । इस प्रकार वृत्ति को ‘काव्यालोक’ या ‘ध्वन्यालोक’ कहा गया । कहना कठिन है कि ‘सहृदयालोक’ इस ग्रन्थ को कैसे कहा गया । डॉ० सोवानी का विचार है कि ‘सहृदय’ कारिकाओं के रचयिता का नाम है । मुकुल की ‘अभिधावृत्तिमातृका’, जो ‘लोचन’ से लगभग सौ वर्ष पूर्व लिखी गई थी, लक्षणा में ध्वनिमार्ग को अन्तर्भूत करते हुए ‘ध्वनि’ को नूतन रूप से किन्हीं सहृदय द्वारा उपवर्णित बताती है—‘लक्षणामाग्र्गाविगाहित्वं तु ध्वनेः सहृदयैर्नूतनतयोपवर्णितस्य विद्यत इति दिशमुन्मीलयितुमिद- मत्रोक्तम्’ ( पृ० २१ ); इसी प्रकार मुकुल लिखते हैं—‘तथाहि तत्र विवक्षितान्यपरता सहृदयैः काव्य- वर्त्मनि निरूपिता’ ( पृ० १९ ) । यह स्पष्ट रूप से निर्देश करता है कि जब मुकुल ने ( लगभग ९००–९२५ ई० ) लिखी उस समय ध्वनि नया सिद्धान्त था और ‘सहृदय’ ने उसे प्रतिपादित किया था । इसी प्रकार, मुकुल के शिष्य प्रतीहारेन्दुराज कहते हैं—‘ननु यत्र काव्ये सहृदयहृदयाह्ला- दिनः प्रधानभूतस्य स्वशब्दव्यापारास्पृष्टत्वेन प्रतीयमानैकरूपस्यार्थस्य सद्भावस्तत्र तथाविधार्थाभि- व्यक्तिहेतुः काव्यजीवितभूतः कैश्चित् सहृदयैर्ध्वनिर्नाम व्यञ्जकत्वभेदात्मा काव्यधर्मोऽभिहितः’ ( पृ० ७९ ) । इन उदाहरणों से प्रतीत होता है कि बहुत सम्भव है, सहृदय रचयिता का नाम है