ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ३६ ) लोचन के इस वाक्य को भी अभिन्नकर्तृत्व की सिद्धि में उपस्थापित किया जाता है—'प्रक्रा- न्तप्रकारद्वयोपसंहारं तृतीयप्रकारसूचनं चैकेनैव यत्नेन करोमीत्याशयेन साधारणमवतरणपदं प्रक्षिपति वृत्तिकृत्—तथा चेति' (पृ० २७१)। म० म० काणे इसे भी अभिन्नकर्तृकत्व की सिद्धि का प्रमाण नहीं मानते, क्योंकि यहाँ भी कारिका वृत्ति का भाग बन गई है। यहाँ लोचन कहता है कि कारिका (२।२३) ने दो प्रकारों (varieties) का निर्देश किया है और वृत्ति ने तृतीय को भी संलग्न कर दिया है। यदि अभिन्नकर्तृकत्व है तो कारिका में क्यों नहीं तीनों का निर्देश किया गया और क्यों वृत्ति उत्सूत्र व्याख्यान के अपराध से युक्त हुई ? किन्तु यदि विचार किया जाय तो यह लगता है कि एक ही कारिका वाक्य से दो प्रकारों का उपसंहार और तृतीय प्रकार का सूचन करता हूँ इस आशय से वृत्तिकार साधारण रूप से अवतरण देते हैं—'तथा च'। अर्थात् 'तथा च' यह वृत्तिग्रन्थ कारिकाग्रन्थ को अपनी कुक्षि में ले लेता है, इसे ही म० म० काणे कारिका का वृत्ति का भाग हो जाना कहते हैं। इतने मात्र से अभिन्नकर्तृकत्व का पक्ष निराकृत नहीं हो जाता है। डॉ० के० सी० पाण्डेय ने प्रश्न उठाया है कि लोचन केवल वृत्तिग्रन्थ का व्याख्यान है अथवा कारिका और वृत्ति दोनों का। इस प्रकार यदि यह सिद्ध हो जाता है कि लोचन दोनों का व्याख्यान है तब दोनों के एककर्तृक मानने में आपत्ति नहीं होगी। किन्तु म० म० काणे लोचन को केवल वृत्तिग्रन्थ का व्याख्यान सिद्ध करते हैं, क्योंकि 'काव्यालोक', जिसके व्याख्यान के लिए लोचनकार प्रवृत्त हैं वह वृत्तिग्रन्थ है न कि कारिकाग्रन्थ। कारिकाग्रन्थ को केवल ध्वनिकारिका या ध्वनि कहते थे। यही कारण है कि लोचनकार ने आरम्भ में वृत्तिग्रन्थ के मङ्गलाचरण के व्याख्यान से 'लोचन' का आरम्भ किया और 'आदिवाक्य' के रूप में प्रथम कारिका का निर्देश मात्र करके उस पर के वृत्तिग्रन्थ के व्याख्यान में लग जाते हैं। हाँ, जहाँ कारिकाग्रन्थ पर वृत्ति बहुत संक्षिप्त है वहाँ लोचन कारिका के कुछ शब्दों का व्याख्यान करता है, किन्तु ऐसे स्थल बहुत कम हैं। साथ ही, काणे महाशय का यह भी तर्क है कि यदि कारिका और वृत्ति एक ही व्यक्ति की रचनाएं हैं तो कारिकाओं के टुकड़े और उनमें वृत्ति का छिटफुट नियोजन समान रूप से होना चाहिए था, किन्तु ऐसी समानता नहीं है, वृत्ति की किसी पाण्डुलिपि में कारिकाएं टुकड़ों में पढ़ी गई हैं और किसी में पूरी कारिकाएँ पढ़ी गई हैं। यद्यपि 'काव्यप्रकाश' में कारिकाएं तोड़-तोड़ कर बीच में वृत्ति के साथ भी रखी गई हैं, तथापि वहाँ ऐसी अव्यवस्था नहीं है। ध्वन्यालोक के अन्त में दो पद्य हैं—'इत्यक्लिष्ट०' और 'सत्काव्यतत्त्व०'। 'इति' पर टिप्पणी करते हुए अभिनवगुप्त लिखते हैं—'इतीति कारिकातद्वृत्तिनिरूपणप्रकारेणेत्यर्थः', अर्थात् कारिका और उसकी वृत्ति के निरूपण के प्रकार से। डॉ० मुकर्जी के अनुसार यह टिप्पण सूचित करता है कि अभिनवगुप्त कारिका और वृत्ति को एक व्यक्ति की रचना मानते हैं। दूसरा श्लोक आनन्द- वर्धन को सुधियों के मन में काव्य के चिरप्रसुप्तकल्पतत्त्व को प्रवृत्त करने वाला बताता है, इसका अर्थ है कि आनन्दवर्धन ने ही पहले पहल ध्वनिमार्ग का आलोकन कारिका और वृत्ति द्वारा किया, और भी, ठीक इसी प्रकार तृतीय उद्योत की ४६वीं कारिका के अनुसार जो यह काव्यतत्त्व अस्फुट रूप से स्फुरित था उसका व्याख्यान करने में असमर्थ लोगों ने रीतियों का मार्ग प्रवर्तित किया, दोनों