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ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

पृष्ठ 39, कुल 680 में से

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किया है, वस्तु, अलङ्कार और रस इन तीन व्यङ्ग्यों के प्रकार से । लोचनकार इस व्याख्यान पर आपत्ति करते हैं तथा प्रश्न करते हैं कि इन तीन भेदों को वृत्तिकार ने निर्देश किया है, कारिकाकार ने नहीं । फिर अब वृत्तिकार भेद का प्रकाशन नहीं कर रहे हैं । जब कि कर्ता का भेद है (कारिका- कार और वृत्तिकार को भिन्न मानते हैं) तो यह कहने में क्या सङ्गति है 'कि (वृत्तिकार) यह कर चुके हैं और (कारिकाकार) यह कर रहे हैं ? म० म० काणे को यह स्पष्ट है कि चन्द्रिकाकार कर्तृभेद का विचार रखते थे, और लोचन का कहना है कि 'व्यङ्ग्यमुखेन' का जो व्याख्यान 'चन्द्रिका' ने किया है उसकी सङ्गति नहीं बैठती । जब तक 'चन्द्रिका' व्याख्या नहीं मिल जाती, इसे स्पष्ट रूप से कहना सम्भव नहीं कि चन्द्रिका- कार कारिकाकार और वृत्तिकार को भिन्न मानते थे अथवा अभिन्न । डॉ० मुकर्जी प्रस्तुत वृत्तिग्रन्थ के लोचन व्याख्यान को क्लिष्ट एवं गलत समझते हैं और 'चन्द्रिका' के व्याख्यान को बहुत कुछ सन्तोषजनक एवं दृढ़ (consistent) मानते हैं । क्योंकि ऐसा नहीं कि वस्तु, अलङ्कार और रस का विभाग कारिका में नहीं हुआ है, बल्कि २।३ कारिका में रस ध्वनि का निर्देश है, २।२१ में शब्दशक्त्युद्भव पर आधारित अलङ्कारध्वनि पर विचार किया है, २।२२-२४ कारिकाओं में वस्तु- ध्वनि का निरूपण किया गया है । ऐसी स्थिति में अभिनवगुप्त का यह कहना कि ये तीनों व्यङ्ग्यभेद केवल वृत्तिकार ने किया है, कारिकाकार ने नहीं, सङ्गत नहीं । और, डॉ० मुकर्जी के अनुसार अभिनवगुप्त यह भूल गए हैं कि वृत्तिकार एक भी वस्तु प्रस्तुत नहीं कर सकते जो कारिकाकार की अभिप्रेत अथवा उनकी पोषित नहीं है । अन्यथा व्याख्यान 'उत्सूत्र' होगा । डॉ० मुकर्जी के इस विचार से डॉ० कृष्णमूर्ति सहमत नहीं हैं । यद्यपि डॉ० मुकर्जी ने अपने निबन्ध में 'कर्तृभेदे' के कर्ता को ग्रन्थकार ही माना था किन्तु अब उन्होंने 'Indian Culture' (भाग १२, पृ० ५७- ६०) में दूसरी व्याख्या प्रस्तुत की है जिसमें कर्तृ का अर्थ है केवल कर्ता (grammatical agent of an action), न कि ग्रन्थ का कर्ता । अस्तु, यह मानते हुए कि 'कर्तृभेदे' का अर्थ अभी तक कोई स्थिर रूप से नहीं प्रस्तुत किया जा सका है, फिर हम विद्वानों पर ही इसका निर्णय छोड़ते हैं । वृत्तिग्रन्थ में 'परिकरश्लोक', 'संग्रहश्लोक' और 'संक्षेपश्लोक' के साथ और 'तदयमत्र परमार्थः', 'तदिदमुक्तं', और 'तदिदमुच्यते' के साथ अनेक श्लोकों को प्रस्तुत किया गया है । जिनमें बहुत से श्लोक कुछ कारिकाओं से अधिक अर्थगर्भित हैं । म० म० काणे महाशय का कहना है कि यदि दोनों (कारिकाकार और वृत्तिकार) अभिन्न हैं तो क्यों उस व्यक्ति ने उन उत्तम श्लोकों को कारिकाओं में न रख कर वृत्ति में अप्रधान स्थिति में रखा ? काणे महाशय के अनुसार अभिन्नकर्तृकत्ववादी डॉ० मुकर्जी, डॉ० कृष्णमूर्ति और डॉ० के० सी० पाण्डेय में किसी ने इसका सन्तोषजनक व्याख्यान नहीं किया है । आचार्य मम्मट ने जो अपने काव्यप्रकाश के कारिकाकार और वृत्तिकार भी हैं इसी प्रकार वृत्ति में परिकरश्लोक अथवा संग्रहश्लोक क्यों नहीं दिया ? डॉ० कृष्णमूर्ति के अनुसार आनन्दवर्धन ने पहले कारिकाएं लिखीं और अपने शिष्यों को उन्हें पढ़ाया, तब कुछ समय बाद वृत्ति का निर्माण किया । काणे महाशय इसे नहीं मानते, क्योंकि यदि यह माना भी जाय तो लेखक को क्या बाधक हुआ कि उसने इन पद्यों को कारिकाओं के रूप में नहीं लिखा ।