ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१३० सलोचन-ध्वन्यालोकः लोचनम् प्रतीतिरेव प्रधानीभवत्यनुप्राणकत्वेनेति व्यङ्ग्यव्यञ्जकयोः प्राधान्यम् । कदा- चित्तु नैमित्तिकमप्रस्तुतं वर्ण्यमानं सत्प्रस्तुतं निमित्तं व्यनक्ति । यथा सेतौ— सग्गं अपारिजाअं कोत्थुहलच्छिरहिअं महुमहस्स उरम् । सुमरामि महणपुरओ अमुद्धअन्दं च हरजडापब्भारम् ॥ अत्र जाम्बवान् कौस्तुभलक्ष्मीविरहितहरिवक्षःस्मरणादिकमप्रस्तुत नैमि- त्तिकं वर्णयति प्रस्तुतं वृद्धसेवाचिरजीवित्वव्यवहारकौशलादिनिमित्तभूतं मन्त्रि- तायामुपादेयमभिव्यङ्क्तुम् । तत्र निमित्तप्रतीतावपि नैमित्तिकं वाच्यभूतं प्रत्युत तन्निमित्तानुप्राणितत्वेनोद्धुरकन्धरोत्यात्मानमिति समप्रधानतैव वाच्यव्यङ्ग्ययोः । एवं द्वौ प्रकारौ प्रत्येकं द्विविधौ विचार्य तृतीयः प्रकारः परीक्ष्यते सारूप्यलक्षणः । तत्रापि द्वौ प्रकारौ—अप्रस्तुतात्कदाचिद्वाच्याच्चम- त्कारः, व्यङ्ग्यं तु तन्मुखप्रेक्षम् । यथास्मदुपाध्यायभट्टेन्दूराजस्य— प्रतीति में भी निमित्त की प्रतीति ही अनुप्राणक होने के कारण प्रधान हो जाती है, अतः व्यङ्ग्य और व्यञ्जक, दोनों का प्राधान्य¹ है । कभी तो नैमित्तिक अप्रस्तुत अभिधीयमान होता हुआ प्रस्तुत निमित्त को व्यक्त करता है। जैसे ‘सेतुबन्ध’ में— 'समुद्रमथन से पहले पारिजात वृक्ष से रहित स्वर्ग को, कौस्तुभ और लक्ष्मी से रहित मधुसूदन (विष्णु) के वक्ष को तथा सुन्दर चन्द्र से रहित शिवजी के जटाभार को स्मरण करता हूँ।' यहाँ जाम्बवान् वृद्धसेवा, चिरजीवितत्व एवं व्यवहारकौशल आदि निमित्तभूत प्रस्तुत को मन्त्रित्व में उपादेय के रूप में व्यक्त करने के लिए कौस्तुभ और लक्ष्मी (अथवा कौस्तुभमणि की शोभा) से रहित विष्णु के वक्ष के स्मरण आदि अप्रस्तुत नैमित्तिक का वर्णन करते हैं । वहाँ नैमित्तिक की प्रतीति में भी वाच्यभूत नैमित्तिक (?) प्रत्युत उस निमित्त से अनुप्राणित होने के कारण अपने कन्धे को ऊपर उठाता है (अर्थात् प्रधान होता है) । अतः वाच्य और व्यङ्ग्य की समप्रधानता ही है। इस प्रकार दोनों प्रकारों को, प्रत्येक के दो-दो प्रभेदों के साथ विचार करके 'सारूप्य' नामक तीसरे प्रकार की परीक्षा करते हैं । वहाँ भी दो प्रकार हैं—कभी अप्रस्तुत वाच्य से चमत्कार होता है, व्यङ्ग्य तो वाच्य का मुँह ताकता है (अर्थात् अप्रधान होता है)। जैसे हमारे उपाध्याय भट्टेन्दुराज का— सभी विशेषों का अन्तर्भाव हो जाता है। यही नियम अप्रस्तुत से प्रस्तुत के निमित्तनैमित्तिकभाव अर्थात् कार्यकारणभावरूप सम्बन्ध के होने पर लागू होगा । १. प्रस्तुत उदाहरण में निमित्त या कारणरूप अप्रस्तुत सुहृद्-बान्धव का वर्णन है तथा उससे प्रस्तुत नैमित्तिक या कार्य 'सुहृद्-बान्धव का श्रद्धेय-वचनत्व' आक्षिप्त होता है अर्थात् व्यञ्जन से प्रतीत होता है । परन्तु व्यञ्जना प्रतीत होनेमात्र से ध्वनि का प्रसंग नहीं होता, बल्कि उसके प्राधान्य के साथ अभिधीयमान का गुणीभाव भी होना चाहिए। किन्तु यहाँ अभिधीयमान अप्रस्तुत निमित्त प्रतीयमान प्रस्तुत नैमित्तिक के अनुप्राणक होने के कारण गुणीभूत न होकर प्रधान हो जाता है। इस प्रकार यहाँ व्यंग्य और व्यञ्जक दोनों का प्राधान्य है। इसी प्रकार आगे के