ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथम उद्योतः १३१ लोचनम् प्राणा येन समर्पितास्तव बलाद्येन त्वमुत्थापितः स्कन्धे यस्य चिरं स्थितोऽसि विदधे यस्ते सपर्यामपि । तस्यास्य स्मितमात्रकेण जनयन् प्राणापहारक्रियां भ्रातः प्रत्युपकारिणां धुरि परं वेताल लीलायसे ॥ अत्र यद्यपि सारूप्यवशेन कृतघ्नः कश्चिदन्यः प्रस्तुत आक्षिप्यते, तथाप्य- प्रस्तुतस्यैव वेतालवृत्तान्तस्य चमत्कारकारित्वम् । न ह्यचेतनोपालम्भवदस- म्भाव्यमानोऽयमर्थो न च न हृद्य इति वाच्यस्यात्र प्रधानता । यदि पुनर- चेतनादिनात्यन्तासम्भाव्यमानतदर्थविशेषणेनाप्रस्तुतेन वर्णितेन प्रस्तुतमा- क्षिप्यमाणं चमत्कारकारि तदा वस्तुध्वनिरसौ । यथा ममैव— भावव्रात हठाज्जनस्य हृदयान्याक्रम्य यन्नर्तयन् भङ्गीभिर्विविधाभिरात्महृदयं प्रच्छाद्य संक्रीडसे । स त्वामाह जडं ततः सहृदयम्मन्यस्त्वदुःशिक्षितो मन्येऽमुष्य जडात्मता स्तुतिपदं त्वत्साम्यसम्भावनात् ॥ ‘भाई बेताल ! जिसने तुम्हें वाणों को अर्पित किया, बलपूर्वक जिसने तुम्हें उठाया, जिसके कन्धे पर देर तक तुम बैठे रहे, जिसने तुम्हारी पूजा भी की, उस प्रकार के इसका स्थितमात्र में प्राणापहार करते हुए तुम प्रत्यपकार करने वालों के आगे पहुँच जाते हो ।’ यहाँ यद्यपि सारूप्यवश कोई दूसरा कृतघ्न आक्षिप्त होता है, तथापि अप्रस्तुत वेताल-वृत्तान्त की ही चमत्कार-कारिता है । न कि अचेतन के उपालम्भ की भाँति यह अर्थ असम्भाव्यमान होने से हृद्य नहीं है, इस लिए वाच्य की प्रधानता है । फिर यदि अत्यन्त असम्भाव्यमान उस ( अप्रस्तुत अर्थ ) के विशेषण वाले वर्णित अचेतन आदि से प्रस्तुत आक्षिप्यमाण हो करके चमत्कारकारी हो तब वह वस्तुध्वनि होता है ।¹ जैसे, मेरा ही— ‘हे पदार्थसमूह, लोगों के हृदयों को हठपूर्वक आक्रान्त करके उन्हें विविध चेष्टाओं से नचाते हुए अपने रहस्य को ढंककर जो कि तुम खेला करते हो तब भी अपने आपको सहृदय मानने के कारण दुर्ललित जन तुम्हें ‘जड़’ कहता है, वस्तुतः वह जड़ है, पर मैं मानता हूँ कि उसे जड़ कहना भी उसकी स्तुति है क्योंकि इस अंश में तुमसे उसकी समानता की सम्भावना होती है ।’ उदाहरण में अभिधीयमान अप्रस्तुत नैमित्तिक से प्रस्तुत निमित्त की प्रतीति में निमित्त के द्वारा अनुप्राणित होने के कारण वाच्यभूत नैमित्तिक की प्रधानता भी होने के कारण वाच्य और व्यंग्य का समप्राधान्य समझना चाहिए । १. सारूप्य का सादृश्य के वश अप्रस्तुत से प्रस्तुत के आक्षेप में यदि अधिक चमत्कारकारी प्रस्तुत होता है तब वहाँ वस्तुध्वनि का प्रसंग होता है। वह अप्रस्तुतप्रशंसा का स्थल नहीं है । यह बात भी मान्य है कि जो बात अत्यन्त असम्भव होती है उसके कथन में स्वभावतः चमत्कार