ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
पृष्ठ 192, कुल 680 में से
संदर्भ में पढ़ें१३२ सलोचन-ध्वन्यालोकः लोचनम् कश्चिन्महापुरुषो वीतरागोऽपि सरागवदिति न्यायेन गाढविवेकालोकतिर- स्कृततिमिरप्रतानोऽपि लोकमध्ये स्वात्मानं प्रच्छादयँल्लोकं च वाचालय- न्नात्मन्यप्रतिभासमेवाङ्गीकुर्वंस्तेनैव लोकेन मूर्खोऽयमिति यदवज्ञायते तदा तदीयं लोकोत्तरं चरितं प्रस्तुतं व्यङ्ग्यतया प्राधान्येन प्रकाश्यते । जडोऽयमिति ह्युद्यानेन्दूदयादिर्भावो लोकेनावज्ञायते, स च प्रत्युत कस्यचिद्विरहिण औत्सुक्यचिन्तादूयमानमानसामन्यस्य प्रहर्षपरवशतां करोतीति हठादेव लोकं यथेच्छं विकारकारणाभिर्नर्तयति । न च तस्य हृदयं केनापि ज्ञायते कीदृगयमिति, प्रत्युत महागम्भीरोऽतिविदग्धः सुष्ठु गर्वहीनोऽतिशयेन क्रीडा- चतुरः स यदि लोकेन जड इति तत एव कारणात्प्रत्युत वैदग्ध्यसम्भावन- निमित्तात्सम्भावितः, आत्मा च यत एव कारणात्प्रत्युत जाड्येन सम्भाव्यस्तत एव सहृदयः सम्भावितस्तदस्य लोकस्य जडोऽसीति यद्युच्यते तदा जाड्यमेवं- विधस्य भावव्रातस्याविदग्धस्य प्रसिद्धमिति सा प्रत्युत स्तुतिरिति । जडादपि 'वीतराग भी सराग-जैसा' इस नियम के अनुसार कोई महापुरुष अपने अतिशय विवेक के आलोक से फैले अन्धकार को तिरस्कृत करके भी लोगों के बीच अपने को छिपाता हुआ, लोगों को मुखर करता हुआ, अपने में अज्ञान को स्वीकार करता हुआ, उन्हीं लोगों द्वारा 'यह मूर्ख है' कहकर जो तिरस्कृत होता है, ऐसी स्थिति में उसका प्रस्तुत लोकोत्तर चरित व्यङ्ग्य के रूप में प्राधान्यतः प्रकाशित होता है। क्योंकि उद्यान, चन्द्रोदय आदि भाव ( पदार्थ ) लोगों द्वारा 'यह जड़ है' कह कर तिरस्कृत होता है। बल्कि वह किसी विरही के मन को औत्सुक्य, चिन्ता से दुःखी करता है, दूसरे को खुश करता है, इस प्रकार स्वेच्छा से लोगों को विकार के प्रवर्तनों द्वारा नचाता रहता है। 'यह कैसा है' इस प्रकार कोई भी उसके भेद को नहीं समझता है, प्रत्युत महागम्भीर, अतिविदग्ध, शोभन, गर्वहीन, अतिशय क्रीड़ा में चतुर वह ( भावव्रात = पदार्थ समूह ) लोगों द्वारा 'जड़' रूप में उस कारण उसी वैदग्ध्य के सम्भावन रूप निमित्त से ही सम्भावित किया जाता है। जिस कारण से आत्मा को जड़ रूप से सम्भावन किया जाय उसी कारण यदि लोग 'सहृदय' सम्भावित हैं तो उन लोगों की, यदि 'तुम जड़ हो' तो इस प्रकार के अविदग्ध भावव्रात का जाड्य प्रसिद्ध है, इस प्रकार स्तुति' ही है। ध्वनित होता है कि यह लोक (संसार के लोग) जड़ से नहीं होता । इस प्रकार जहाँ अत्यन्त असम्भाव्यमान के विशेषणों से युक्त अप्रस्तुत अर्थ द्वारा प्रस्तुत का आक्षेप करते हैं वहाँ वाच्य की अपेक्षा व्यंग्य अधिक चमत्कारकारी होगा ही । १. 'भावव्रात' यह उदाहरण कुछ क्लिष्ट हो गया है। यह वस्तुध्वनि का उदाहरण है। यहाँ अभिधीयमान प्रस्तुत से अप्रस्तुत का आक्षेप है। जैसा कि अभिधीयमान प्रस्तुत है कि भावव्रात या चन्द्र, उद्यान आदि पदार्थसमूह को लोग 'जड़' कहा करते हैं और स्वयं को 'सहृदय' कहते हैं। उन्हें यह जब विदित नहीं कि ये पदार्थ संसार को अनेक प्रकार से नचाया करते हैं और इस प्रकार अत्यन्त वैदग्ध्यपूर्ण हैं, ऐसी स्थिति में उन्हें 'जड़' कहना अपने को 'जड़' कहना हुआ । दूसरे अजड़ को 'जड़' कहना अजड़रूप जड़ की निन्दा नहीं, बल्कि स्तुति है। यह उक्त श्लोक का