भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

पृष्ठ 193, कुल 680 में से

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पृष्ठ 193

प्रथम उद्योतः १३३ ध्वन्यालोकः यदा तु सारूप्यमात्रवशेनैवाप्रस्तुतप्रशंसायामप्रकृतप्रकृतयोः सम्ब- न्धस्तदाप्यप्रस्तुतस्य सरूपस्याभिधीयमानस्य प्राधान्येनाविवक्षायां ध्वनावेवान्तःपातः । इतरथा त्वलङ्कारान्तरमेव । तदयमत्र सङ्क्षेपः— जब कि केवल सारूप्यवश अप्रस्तुतप्रशंसा में अप्रकृत और प्रकृत का सम्बन्ध है तब अभिधीयमान अप्रस्तुत सरूप का प्राधान्यतः विवक्षा न करने पर ध्वनि में ही अन्तर्भाव है । इतरथा ( ऐसा न होने पर ) एक प्रकार का अलङ्कार ही है । तो यह यहाँ संक्षेप है— लोचनम् पापीयानयं लोक इति ध्वन्यते । तदाह—यदा त्विति । इतरथा त्विति । इतरथैव पुनरलंकारान्तरत्वमलंकारविशेषत्वं न व्यङ्ग्यस्य कथंचिदपि प्राधान्य इति भावः । उद्देशे यदादिग्रहणं कृतं समासोक्तीत्यत्र द्वन्द्वे तेन व्याजस्तुतिप्रभृतिर- लङ्कारवर्गोऽपि सम्भाव्यमानव्यङ्ग्यानुवेशः सम्भावितः । तत्र सर्वत्र साधारण- मुत्तरं दातुमुपक्रमते—तदयमत्रेति । कियद्वा प्रतिपदं लिख्यतामिति भावः । तत्र व्याजस्तुतिर्यथा— किं वृत्तान्तैः परगृहगतैः किन्तु नाहं समर्थ- स्तूष्णीं स्थातुं प्रकृतिमुखरो दाक्षिणात्यस्वभावः । गेहे गेहे विपणिषु तथा चत्वरे पानगोष्ठ्या- मुन्मत्तेव भ्रमति भवतो वल्लभा हन्त कीर्तिः ॥ अधिक पापी है। तो कहते हैं—जबकि— । इतरथा— । भाव यह कि अन्यथा ही, किसी प्रकार व्यङ्ग्य का प्राधान्य न होने पर अलङ्कारान्तरत्व अर्थात् अलङ्कार- विशेषत्व होगा । नाम-निर्देश में जो 'आदि' ग्रहण किया है, समासोक्ति० के द्वन्द्व समास में उस कारण व्याजस्तुति प्रभृति अलङ्कार-वर्ग में भी सम्भाव्यमान व्यङ्ग्य का अनुवेश है । वहाँ, सबका साधारण उत्तर देने का उपक्रम करते हैं—तो यह यहाँ— । भाव यह कि अथवा कितना पद-पद पर लिखें ! वहाँ, व्याजस्तुति, जैसे— ' 'दूसरे आदमी के घर की बातों की चर्चा से क्या फायदा, फिर भी मैं चुपचाप बैठने में असमर्थ हूँ, क्योंकि बड़बड़ाना दाक्षिणात्यों का स्वभाव है । हन्त ! हे राजन् आपकी प्रिया कीर्ति घर-घर में, बाजारों में तथा मुहल्लों में, पानगोष्ठी में, पागल—जैसी घूमती रहती है !' अप्रस्तुत अभिधीयमान हैं । इससे किसी महापुरुष का लोकोत्तर चरित प्रस्तुतरूप में प्रतीत हो रहा है । जैसे कोई वीतराग महापुरुष अपने विवेक के प्रकाश से अज्ञान के तिमिर को नष्ट कर देता है, फिर भी अपनी महानता को छिपाए रहता है । देखकर उसे लोग 'मूर्ख' कहा करते हैं और उसकी अवज्ञा करते हैं । यहाँ यह प्रस्तुत व्यंग्य अर्थ अप्रस्तुत वाच्य से निश्चय ही चमत्कारकारी है । क्योंकि अप्रस्तुत वाच्य अचेतन 'भावव्रात' को लेकर कहे जाने के कारण