भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

पृष्ठ 194, कुल 680 में से

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पृष्ठ 194

१३४ सलोचन-ध्वन्यालोकः लोचनम् अत्र व्यङ्ग्यं स्तुत्यात्मकं यत्तेन वाच्यमेवोपस्क्रियते । यत्तूदाहृतं केनचित्— आसीन्नाथ पितामही तव मही जाता ततोऽनन्तरं माता सम्प्रति साम्बुराशिरशना जाया कुलोद्भूतये । पूर्णे वर्षशते भविष्यति पुनः सैवानवद्या स्नुषा युक्तं नाम समग्रनीतिविदुषां किं भूपतीनां कुले ॥ इति, तदस्माकं ग्राम्यं प्रतिभात्यत्यन्तासभ्यस्मृतिहेतुत्वात् । का चानेन स्तुतिः कृता ? त्वं वंशक्रमेण राजेति हि कियदिदम् ? इत्येवंप्राया व्याजस्तुतिः सहृदयगोष्ठीषु निन्दितेत्युपेक्ष्यैव । यस्य विकारः प्रभवन्नप्रतिबन्धस्तु हेतुना येन । गमयति तमभिप्रायं तत्प्रतिबन्धं च भावोऽसौ ॥ इति । अत्रापि वाच्यप्राधान्ये भावालङ्कारता । यस्य चित्तवृत्तिविशेषस्य सम्बन्धी वाग्व्यापारादिर्विकारोऽप्रतिबन्धो नियतः प्रभवंस्तं चित्तवृत्तिविशेषरूपमभिप्रायं येन हेतुना गमयति स हेतुर्यथेष्टोपभोग्यत्वादिलक्षणोऽर्थो भावालङ्कारः । यथा— एकाकिनी यदबला तरुणी तथाहमस्मिन्गृहे गृहपतिश्च गतो विदेशम् । यहाँ जो स्तुति रूप व्यङ्ग्य है उससे वाच्य ही उपस्कृत होता है । जो कि किसी ने उदाहरण दिया है— 'हे राजन, पहले पृथ्वी तुम्हारी पितामही हुई, इसके बाद तुम्हारी माता हुई, इस समय समुद्र की रशना वाली यह कुलोत्पत्ति के लिए तुम्हारी पत्नी है और जब सौ वर्ष पूरे हो जायेंगे तब यह तुम्हारी अनिन्द्य पुत्रवधू ( पतोहू ) हो जायगी । क्या समग्र नीतियों के जानकार कुल में यह ठीक कहा जा सकता है ?' यह (उदाहरण) हमें ग्राम्य लगता है, क्योंकि यह अत्यन्त असभ्य स्मृति को उत्पन्न करता है । और भी, इससे स्तुति ही क्या की ? 'तुम खान्दानी राजा हो' यह कितनी स्तुति है ! इस प्रकार की व्याजस्तुति सहृदय जनों की गोष्ठियों में निन्दित होने के कारण उपेक्षणीय ही है । 'जिसका विकार अप्रतिबन्ध (नियत) होता हुआ जिस हेतु से उस अभिप्राय को तथा उसके प्रतिबन्ध को व्यञ्जित करता है वह 'भाव' है ।' यहाँ भी वाच्य का प्राधान्य होने पर भावालङ्कारता है । जिस चित्तवृत्ति विशेष का सम्बन्धी वाग्व्यापार आदि विकार अप्रतिबन्ध अर्थात् नियत होता हुआ उस चित्तवृत्ति विशेष रूप अभिप्राय को जिस हेतु से व्यञ्जित करता है वह हेतु अर्थात् यथेष्ट उपभोग्यत्वादि रूप अर्थ (मैं तुम्हारे यथेष्ट उपभोग के योग्य हूँ, कोई प्रतिबन्धक नहीं है, इस प्रकार का नायिका के मनोगत आदि अर्थ) 'भावालङ्कार' है । जैसे— 'इस घर में जो कि मैं अकेली अबला तथा तरुणी हूँ, घर के मालिक परदेस गये हैं । गुणीभूत हो जाता है । इस प्रकार वाच्य के गुणीभाव और व्यंग्य के प्राधान्यतः प्रतीत होने के कारण यहाँ वस्तुध्वनि है, न कि अप्रस्तुतप्रशंसा अलङ्कार है ।