ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथम उद्योतः १३५ ध्वन्यालोकः व्यङ्ग्यस्य यत्राप्राधान्यं वाच्यमात्रानुयायिनः । समासोक्त्यादयस्तत्र वाच्यालङ्कृतयः स्फुटाः ॥ व्यङ्ग्यस्य प्रतिभामात्रे वाच्यार्थानुगमेऽपि वा । न ध्वनिर्यत्र वा तस्य प्राधान्यं न प्रतीयते ॥ वाच्य मात्र का अनुगमन करने वाले व्यङ्ग्य का जहाँ अप्राधान्य है, वहाँ समासोक्ति आदि अलङ्कार स्पष्ट हैं । व्यङ्ग्य की सिर्फ प्रतिभा (आभास) हो अथवा वह वाच्य अर्थ का अनुगम करे अथवा जहाँ व्यङ्ग्य का प्राधान्य प्रतीत नहीं होता लोचनम् कं याचसे तदिह वासमियं वराकी श्वश्रूर्ममान्धबधिरा ननु मूढ पान्थ ॥ अत्र व्यङ्ग्यमेकैकत्र पदार्थे उपस्कारकारीति वाच्यं प्रधानम् । व्यङ्ग्यप्रा- धान्ये तु न काचिदलङ्कारतेति निरूपितमित्यलं बहुना ॥ यत्रेति काव्ये । अलङ्कृतय इति । अलङ्कृतित्वादेव च वाच्योपस्कारक- त्वम् । प्रतिभामात्र इति । यत्रोपमादौ म्लिष्टार्थप्रतीतिः । वाच्यार्थानुगम इति । वाच्येनार्थेनानुगमः समं प्राधान्यमप्रस्तुतप्रशंसायामिवेत्यर्थः । न प्रतीयत इति । स्फुटतया प्राधान्यं न चकास्ति, अपि तु बलात्कल्प्यते, तथापि हृदये नानुप्रविशति । यथा—'देआ पसिअणिआतासु' इत्यत्रान्यकृतासु व्याख्यासु । तेन चतुर्षु प्रकारेषु न ध्वनिव्यवहारः सद्भावेऽपि व्यङ्ग्यस्य अप्राधान्ये म्लिष्ट- हे मूढ़ पथिक ! किससे रहने के लिए स्थान मांगते हो, यह मेरी सास अन्धी भी है और बहरी भी ।' यहाँ व्यङ्ग्य एक-एक पदार्थ में उपस्कारकारी है, अतः वाच्य प्रधान है, व्यङ्ग्य के प्रधान होने पर भी कोई अलङ्कारता नहीं, यह निरूपण कर चुके हैं, बहुत कहना व्यर्थ है ! जहाँ— । काव्य में । अलङ्कार— । अलङ्कार होने से ही वाच्य का उपस्कारकत्व है । प्रतिभामात्र— । जहाँ उपमा आदि में मलिन (अस्पष्ट) अर्थ की प्रतीति है । वाच्य अर्थ का अनुगम— । अर्थात् वाच्य अर्थ के साथ अनुगम; बराबर प्राधान्य, अप्र- स्तुतप्रशंसा की भाँति । प्रतीत नहीं होता है— । स्फुट रूप से प्राधान्य भासित नहीं होता है, अपितु बलात् कल्पित किया जाता है, तथापि हृदय में अनुप्रविष्ट नहीं होता । जैसे 'प्रार्थये तावत् प्रसीद ०' इस गाथा में दूसरों द्वारा की गई व्याख्याओं में । अतः चार प्रकारों में व्यङ्ग्य के रहते हुए भी 'ध्वनि' का व्यवहार नहीं होता है, (१) व्यङ्ग्य के अप्राधान्य में, (२) व्यङ्ग्य की मलिन या अस्पष्ट प्रतीति होने पर, (३) वाच्य के साथ बराबर प्राधान्य होने पर और (४) अस्फुट प्राधान्य के