ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१३६ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः तत्पराववेव शब्दार्थौ यत्र व्यङ्ग्यं प्रति स्थितौ । ध्वनेः स एव विषयो मन्तव्यः सङ्करोज्झितः ॥ तस्मान्न ध्वनेरन्यत्रान्तर्भावः । इतश्च नान्तर्भावः; यतः काव्य- विशेषोऽङ्गी ध्वनिरिति कथितः । तस्य पुनरङ्गानि-अलङ्कारा गुणा वृत्तयश्चेति प्रतिपादयिष्यन्ते । न चावयव एव पृथग्भूतोऽवयवीति है, (वहाँ) ध्वनि नहीं है। जहाँ शब्द और अर्थ व्यङ्ग्य के प्रति तत्पर होकर ही स्थित हों उसी को संकर रहित ध्वनि का विषय मानना चाहिये । इसलिये ध्वनि का अन्यत्र अन्तर्भाव नहीं है। और इस कारण भी अन्तर्भाव नहीं है, क्योंकि ध्वनि को काव्य विशेष रूप अङ्गी कहा है। उसके अङ्ग-अलङ्कार, गुण और वृत्तियाँ-प्रतिपादन किये जायेंगे । न कि अवयव ही पृथग्भूत होकर अवयवी के रूप में प्रसिद्ध है। पृथग्भाव न होने पर भी उस (अलङ्कारादि) का उस (ध्वनि) का लोचनम् प्रतीतौ वाच्येन समप्राधान्येऽस्फुटे प्राधान्ये च । क तर्ह्यसावित्याह-तत्परा- वेवेति । सङ्करेणालङ्कारानुपवेशसम्भावनया उज्झित इत्यर्थः । सङ्करालङ्कारेणेति त्वसत्, अन्यालङ्कारोपलक्षणत्वे हि क्लिष्टं स्यात् । इतश्चेति । न केवलमन्योन्य- विरुद्धवाच्यवाचकभावव्यङ्ग्यव्यञ्जकभावसमाश्रयत्वान्न तादात्म्यमलङ्काराणां ध्वनेश्च यावत्स्वामिभृत्यवदङ्गिरूपाङ्गरूपयोर्विरोधादित्यर्थः । अवयव इति । एकैक इत्यर्थः । तदाह-पृथग्भूत इति । अथ पृथग्भूतस्तथा मा भूत्, समुदाय- होने पर । तब वह कहाँ होता है ? इस प्रश्न पर कहते हैं-तत्पर होकर ही- । सङ्कर से अर्थात् (समासोक्ति आदि) अलङ्कार के अनुप्रवेश की सम्भावना से रहित । 'सङ्करालङ्कार' से यह व्याख्यान असत् है, क्योंकि दूसरे अलङ्कारों को उपलक्षण मानने पर व्याख्यान क्लिष्ट हो जायगा । और इस कारण भी- । अर्थात् न केवल अलङ्कारों का और ध्वनि का परस्पर विरुद्ध वाच्यवाचकभाव और व्यङ्ग्यव्यञ्जकभाव के कारण तादात्म्य¹ (एकरूपता) नहीं, बल्कि स्वामी और भृत्य की भाँति अङ्गीरूप और अङ्गरूप के विरोध के कारण भी (तादात्म्य) नहीं है। अवयव- । अर्थात् एक- एक । इस लिए कहते हैं-पृथग्भूत²-। अगर उस प्रकार पृथग्भूत मत हो, समुदाय के १. 'ध्वनि' सर्वथा अलङ्कारों से अतिरिक्त है। दोनों का तादात्म्य या एकरूपता किसा प्रकार सम्भव नहीं । इसीलिए वृत्तिग्रन्थ के परिकर श्लोक में ध्वनि के विषय को 'सङ्करोज्झित' कहा है । अर्थात् समासोक्ति आदि उक्त अलङ्कारों में ध्वनि के सङ्कर अर्थात् अनुप्रवेश की सम्भावना नहीं है । अलङ्कार वाच्यवाचकभाव पर आश्रित होते हैं और ध्वनि व्यंग्य-व्यञ्जकभाव पर आश्रित है, केवल यही कारण नहीं कि दोनों का तादात्म्य सम्भव नहीं, बल्कि स्वामी और भृत्य की तरह अङ्गिरूप और अङ्गरूप होने के कारण भी विरोध है अतः उन दोनों में तादात्म्य नहीं है । ध्वनि काव्यविशेष होने के कारण अङ्गी है और अलङ्कार, गुग तथा वृत्तियाँ उसके अङ्ग हैं। २. यहाँ अलङ्कार आदि को ध्वनि के अङ्ग या अवयव कहने पर यह-शङ्का उठ खड़ी हुई कि