ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथम उद्योतः १३७ ध्वन्यालोकः प्रसिद्धः । अपृथग्भावे तु तदङ्गत्त्वं तस्य । न तु तत्त्वमेव । यत्रापि वा तत्त्वं तत्रापि ध्वनेर्महाविषयत्वान्न तन्निष्ठत्वमेव । 'सूरिभिः कथित' अङ्ग होना है, न कि अङ्गी ही होना। जहाँ कहीं भी अङ्गी होना है वहाँ भी ध्वनि के महाविषय होने के कारण उन ( अलङ्कार आदि ) में अन्तर्भाव नहीं है । 'सूरियों ने लोचनम् मध्यनिपतितस्तर्ह्यस्तु तथेत्याशङ्कयाह—अपृथग्भावे त्विति । तदापि न स एक एव समुदायः, अन्येषामपि समुदायिनां तत्र भावात्; तत्समुदायिमध्ये च प्रतीयमानमप्यस्ति, न च तदलङ्काररूपं, प्रधानत्वादेव । तत्त्वलङ्काररूपं तदप्रधानत्वान्न ध्वनिः । तदाह—न तु तत्त्वमेवेति । नन्वलङ्कार एव कश्चित्त्वया प्रधानताभिषेकं दत्त्वा ध्वनिरित्यात्मेति चोक्त इत्याशङ्कयाह—यत्रापि वेति । न हि समासोक्त्यादीनामन्यतम एवासौ तथास्माभिः कृतः, तद्विविक्तत्वेऽपि तस्य भावात्, समासोक्त्याद्यलङ्कारस्वरूपस्य समस्तस्याभावेऽपि तस्य दर्शितत्वात् 'अत्ता एत्थ' इति 'कस्स वा ण' इत्यादि; तदाह-न तन्निष्ठत्वमेवेति । बीच रहे, यह आशङ्का करके कहते हैं—पृथग्भाव न होने पर— । तब भी वह एक ही समुदाय नहीं है, अन्य समुदायियों का भी वहाँ अस्तित्व है । और समुदायियों के बीच में प्रतीयमान भी है, न कि वह अलङ्कार रूप है, क्योंकि वह प्रधान है । जो कि अलङ्कार रूप है वह अप्रधान होने के कारण ध्वनि नहीं है । इस लिए कहा— न कि अङ्गी ही होना— । किसी अलङ्कार ही को तुमने प्रधानता का अभिषेक देकर ‘ध्वनि’ और ‘आत्मा’ कहा है, यह आशङ्का करके कहते हैं—जहाँ कहीं भी— । न कि यह ध्वनि समासोक्ति आदि अलङ्कार में कोई अन्यतम है जिसे उस प्रकार हमने किया है, क्योंकि समासोक्ति आदि के अभाव में भी उस ( ध्वनि ) का अस्तित्व है । समासोक्ति आदि अलङ्कार के स्वरूप के समान स्वरूप वाले अलङ्कार के अभाव में भी उसे ( ध्वनि को ) दिखाया है, 'अत्ता एत्थ०', 'कस्स वा ण०' इत्यादि । इस लिए अवयव के अतिरिक्त जब कि कोई अवयवी नहीं प्राप्त होता तो क्यों नहीं यह स्वीकार किया जाय कि अवयवरूप अलङ्कार भी अवयवी ध्वनि हैं ? इसका निराकरण करते हैं कि पृथक्-पृथक् रूप से अवयव किसी प्रकार अवयवी नहीं बन सकता, अर्थात् एक-एक अवयव को लेकर उसे अवयवी की संज्ञा नहीं दी जा सकती । इस पर पुनः शङ्का होती है कि क्यों नहीं तब समुदायमध्यपतित अवयव को ही अवयवी कहते हैं ? इसके निराकरण में लोचनकार का स्पष्टीकरण यह है कि समुदाय किसी प्रकार एक को नहीं कहते हैं, क्योंकि समुदायी में अनेक और भी समुदायियों का अस्तित्व होता है जैसे कि प्रस्तुत में ही प्रतीयमान भी एक समुदायी है, वह अपनी प्रधानता की स्थिति में ‘ध्वनि’ हो जाता है । वह अलङ्काररूप अप्रधान होने के कारण होता है । इस प्रकार न तो पृथक्-पृथक् रूप से अवयव को अवयवी कह सकते हैं और न समुदायरूप से । तात्पर्य यह कि ‘ध्वनि’ सर्वथा अङ्गी एवं प्रधान तत्त्व है और अलङ्कार आदि अङ्ग या अप्रधान हैं । इसी अंश में अलङ्कार आदि ध्वनि के अङ्ग हैं कि वह काव्यविशेष है और अलङ्कार आदि उसमें रहा करते हैं, न कि वह ध्वनि स्वयं अलङ्कार आदि में अन्तर्भुक्त हो सकता है ।