भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

पृष्ठ 198, कुल 680 में से

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पृष्ठ 198

१३८ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः इति विद्वदुपज्ञेयमुक्तिः, न तु यथाकथञ्चित्प्रवृत्तेति प्रतिपाद्यते । प्रथमे हि विद्वांसो वैयाकरणाः, व्याकरणमूलत्वात्सर्वविद्यानाम् । ते च श्रूयमाणेषु वर्णेषु ध्वनिरिति व्यवहरन्ति । कहा है' अर्थात् यह उक्ति विद्वानों के मतानुसार (विद्वदुपज्ञा) है, न कि जिस किसी प्रकार चल पड़ी है, कि इसे प्रतिपादन कर रहे हैं। मुख्य विद्वान् वैयाकरण हैं, क्योंकि समस्त विद्याओं का मूल व्याकरण है। वे (वैयाकरण विद्वान्) श्रूयमाण वर्णों में 'ध्वनि' यह व्यवहार करते हैं। लोचनम् विद्वदुपज्ञेति । विद्वांस उपज्ञा प्रथम उपक्रमो यस्या उक्तेरिति बहुव्रीहिः। तेन 'उपज्ञोपक्रमम्' इति तत्पुरुषाश्रयं नपुंसकत्वं निरवकाशम् । श्रूयमाणेष्विति । श्रोत्रशष्कुलीं सन्तानेनागता अन्त्याः शब्दाः श्रूयन्त इति प्रक्रियायां शब्दजाः शब्दाः श्रूयमाणा इत्युक्तम् । तेषां घण्टानुरणनरूपत्वं तावदस्ति; ते च ध्वनि- शब्देनोक्ताः । यथाह भगवान् भर्तृहरिः— कहा—उसमें अन्तर्भाव नहीं है—। विद्वदुपज्ञा—। विद्वानों से उपज्ञा अर्थात् सबसे पहले उपक्रम (आरम्भ) है जिस उक्ति का—यह बहुव्रीहि है। इस लिए 'उपज्ञोपक्रमं तदाद्याचिख्यासायाम्' (पा. सू. २. ४. २१) इसके अनुसार तत्पुरुष में होने वाले नपुंसकत्व का कोई अवसर नहीं। श्रूयमाण¹—। शष्कुली सदृश श्रोत्रदेश के आकाश में सन्तानक्रम से (वीचीतरङ्ग की भाँति) आकर अन्त वाले शब्द सुने जाते हैं, इस प्रक्रिया में शब्द से उत्पन्न शब्द 'श्रूयमाण' होते हैं, यह कहा गया है। उन (श्रूयमाण अन्त्य शब्दज शब्दों) का घण्टानुरणन का सादृश्य है। वे 'ध्वनि' शब्द से कहे गये हैं। जैसा कि भगवान् भर्तृहरि ने कहा है— १. प्रस्तुत में विषय के स्पष्टीकरण के लिए संक्षेप में 'स्फोट' के स्वरूप को जान लेना आवश्यक है। स्फोटवाद भारतीय वैयाकरणों की निजी कल्पना है। अलङ्कारशास्त्र में 'ध्वनि' की कल्पना का आधार व्याकरणों का स्फोट-सिद्धान्त ही है। 'स्फोट' का अर्थ है जिससे अर्थ का स्फुटन होता हो (स्फुटत्यस्मादर्थ इति स्फोटः)। इस 'स्फोट' को भी समझने के पूर्व हमें शब्द-श्रवण की प्रक्रिया से परिचित होना चाहिए। शब्द की उत्पत्ति तीन प्रकार से होती है—संयोग से, वियोग से एवं शब्द से। इस प्रकार उत्पत्ति के अनुसार शब्द तीन प्रकार के हैं—संयोगज, वियोगज (या विभागज) और शब्दज। किसी वस्तु का किसी वस्तु के साथ जोर से संयोग होने पर भी शब्द उत्पन्न होता है और कागज या किसी वस्तु के विभाग में भी शब्द उत्पन्न होता है। इसी प्रकार जिह्वा आदि के संयोग-वियोग द्वारा भी शब्द की उत्पत्ति होती है। मूलतः उत्पन्न शब्द 'स्फोट' कहलाता है। किन्तु जो शब्द उत्पन्न होता है वही श्रोता को नहीं सुन पड़ता है। जैसे कुछ दूरी पर बैठ कर जो कोई बोलता है वही शब्द श्रोता को सुनाई नहीं देता बल्कि वह उत्पन्न होकर नष्ट हो जाता है और अपने नष्ट होने के पूर्व दूसरे शब्द को उत्पन्न कर देता है, इसी प्रकार दूसरा शब्द तीसरे शब्द को, तीसरा चौथे को एवं चौथा पांचवे को आदि। इसको 'वीचीसन्तान- न्याय' कहते हैं। अर्थात् जैसे सरोवर के स्थिर जल में ठिकरा डालने पर एक वर्तुलाकार छोटा