भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

पृष्ठ 199, कुल 680 में से

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पृष्ठ 199

प्रथम उद्योतः १३९ लोचनम् यः संयोगवियोगाभ्यां करणैरुपजन्यते । स स्फोटः शब्दजाश्शब्दा ध्वनयोऽन्यैरुदाहृताः ॥ इति । एवं घण्टादिनिह्रादस्थानीयोऽनुरणनात्मोपलक्षितो व्यङ्ग्योऽप्यर्थो ध्वनि- रिति व्यवहृतः । तथा श्रूयमाणा ये वर्णा नादशब्दवाच्या अन्त्यबुद्धिनिर्ग्राह्य- स्फोटाभिव्यञ्जकास्ते ध्वनिशब्देनोक्ताः । यथाह भगवान् स एव— ‘करणों अर्थात् जिह्वादि स्थानों के साथ संयोग और वियोग के कारण जो उत्पन्न होता है वह ‘स्फोट’ है और (श्रूयमाण) शब्दों से उत्पन्न शब्दों को अन्यों (उत्पत्ति वादियों) ने ‘ध्वनि’ कहा है ।’ इस प्रकार घण्टा आदि की आवाज के समान अनुरणनरूपोपलक्षित व्यंग्य अर्थ ‘ध्वनि’ के नाम से व्यवहृत है । तथा श्रूयमाण जो ‘नाद’ शब्दवाच्य एवं अन्तिम बुद्धि से नितरां ग्राह्य स्फोट को व्यञ्जित करनेवाले जो वर्ण हैं वे ‘ध्वनि’ शब्द से कहे गए हैं । जैसा कि उन्हीं भगवान् भर्तृहरि ने कहा है— सा घेरा पैदा हो जाता है, वही एक से दूसरी तरंग को उत्पन्न करते हुए समस्त सरोवर में व्याप्त हो जाता है । इसी प्रकार शब्द से उत्पन्न शब्द घण्टानुरणन रूप होने के कारण ‘ध्वनि’ कहलाते हैं । भर्तृहरि की यह कारिका इसी अभिप्राय को व्यक्त करती है— यः संयोगवियोगाभ्यां करणैरुपजन्यते । स स्फोटः शब्दजाः शब्दा ध्वनयोऽन्यैरुदाहृताः ॥ यह भी कल्पना है कि ‘स्फोट’ एक नित्य शब्द के रूप में हमारे मन में विद्यमान रहता है । हम जिस अनित्य शब्द को सुनते हैं उससे उस नित्य ‘स्फोट’ रूप शब्द का उद्बोध होता है और उसके द्वारा हम अर्थ का ज्ञान करते हैं । वर्णस्फोट, पदस्फोट, वाक्यस्फोट आदि भेद भी हैं । घण्टा के एक बार बज जाने के बाद उसमें जिस प्रकार ध्वनि रूप अनुरणन होता है उसी प्रकार अनुरणन रूप से उपलक्षित व्यङ्ग्य अर्थ भी अलङ्कार-शास्त्र में ‘ध्वनि’ कहा गया है । इस प्रकार वैयाकरणों के ‘ध्वनि’ को अनुरणनरूपता के आधार पर आलङ्कारिकों ने अपने अनुरूप बना लिया । केवल व्यङ्ग्य अर्थ ही ‘ध्वनि’ नहीं बल्कि ‘व्यञ्जक’ भी ‘ध्वनि’ कहा जाता है । इस प्रकार व्यञ्जक होने के कारण वाचक शब्द और वाच्य अर्थ भी ‘ध्वनि’ पद से वाच्य होते हैं । इस मन्तव्य को सिद्ध करने के लिए वैयाकरणों के ‘नाद’ को लिया है । ‘नाद’ श्रूयमाण वर्णों को कहते हैं । जिस क्रम से वर्ण श्रूयमाण होते हैं उसी क्रम से ‘स्फोट’ रूप नित्य शब्द की अभिव्यक्ति होती है । जैसे हमने ‘घट’ शब्द को सुना तो ‘घ्’ के पश्चात् ‘अ’ तब ‘ट्’ और तब ‘अ’ की हमें प्रतीति होती है । पूर्व वर्ण उत्पन्न होकर अपना संस्कार उत्पन्न करके अग्रिम वर्ण के उत्पन्न होते ही नष्ट हो जाता है । नैयायिक लोग इसे वर्णों का नाश मानते हैं, किन्तु वैयाकरण लोग इसे ‘तिरोभाव’ कहते हैं । इस प्रकार ‘स्फोट’ को पूर्व-पूर्व वर्ण के अनुभव से उत्पन्न संस्कार के सहयोग से, जो हमें अन्त्य वर्ण की बुद्धि होती है उसके द्वारा ग्रहण करते हैं । इस प्रकार ‘स्फोट’ रूप नित्य शब्द के ये वर्ण अभिव्यञ्जक होने के कारण ‘ध्वनि’ कहे जाते हैं । भर्तृहरि ने इसे इन शब्दों में कहा है— प्रत्ययैरनुपाख्येयैर्ग्रहणानुगुणैस्तथा । ध्वनिप्रकाशिते शब्दे स्वरूपमवधार्यते ॥

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