भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

पृष्ठ 201, कुल 680 में से

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प्रथम उद्योतः १४१ 〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰 ध्वन्यालोकः तथैवान्यैस्तन्मतानुसारिभिः सूरिभिः काव्यतत्त्वार्थदर्शिभिर्वाच्य- उसी प्रकार उनके मत का अनुसरण करने वाले, काव्य-तत्त्व के द्रष्टा सूरियों ने लोचनम् अस्माभिरपि प्रसिद्धेभ्यः शब्दव्यापारेभ्योऽभिधातात्पर्यलक्षणारूपेभ्योऽति- रिक्तो व्यापारो ध्वनिरित्युक्तः । एवं चतुष्कमपि ध्वनिः । तद्योगाच्च समस्तमपि काव्यं ध्वनिः । तेन व्यतिरेकाव्यतिरेकव्यपदेशोऽपि न न युक्तः । वाच्यवाचक- संमिश्र इति । वाच्यवाचकसहितः संमिश्र इति मध्यमपदलोपी समासः । 'गामश्वं पुरुषं पशुम्' इतिवत्समुच्चयोऽत्र चकारेण विनापि । तेन वाच्योऽपि ध्वनिः, वाचकोऽपि शब्दो ध्वनिः, द्वयोरपि व्यञ्जकत्वं ध्वनतीति कृत्वा । संमि- हमने भी प्रसिद्ध अभिधा, तात्पर्य, लक्षणारूप शब्दव्यापारों से अतिरिक्त व्यापार को 'ध्वनि' कहा है। इस प्रकार (व्यंग्यादि) चारों ध्वनि हैं। और उनके योग से समस्त काव्य भी 'ध्वनि' है। इस कारण भेदव्यपदेश और अभेदव्यपदेश भी अयुक्त नहीं है।१ वाच्यवाचकसम्मिश्र—।२ 'वाच्य-वाचक सहित सम्मिश्र' यह मध्यमपदलोपी समास है। 'गो, अश्व, पुरुष, पशु' की भाँति यहाँ 'चकार' (अर्थात् 'और') का प्रयोग न होने पर भी समुच्चय (सङ्कलन) है। इसलिए वाच्य अर्थ भी ध्वनि है और वाचक शब्द भी ध्वनि है, दोनों का व्यञ्जकत्व 'ध्वनन करता है' ('ध्वनती'ति) इस व्युत्पत्ति के ───────────────────────────────────────────── श्रूयमाण वर्णों के उच्चारण रूप प्रसिद्ध व्यापार के अतिरिक्त द्रुत, विलम्बित आदि वृत्तिभेद रूप अधिक व्यापार करना पड़ता है। इस अतिरिक्त व्यापार की भी वैयाकरणों ने 'ध्वनि' माना है। इसी आधार पर आलंङ्कारिकों ने भी प्रसिद्ध अभिधा, तात्पर्य और लक्षणा रूप शब्द व्यापारों के अतिरिक्त व्यञ्जकत्व व्यापार को भी 'ध्वनि' कहा है। इस प्रकार वैयाकरणों के अनुसार व्यङ्ग्य अर्थ, व्यञ्जक शब्द, व्यञ्जक अर्थ और व्यञ्जकत्व व्यापार, इन चारों को 'ध्वनि' कहने के साथ ही आलङ्कारिकों ने इन चारों के समुदाय-रूप अर्थात् व्यङ्ग्य-वाच्य-वाचक-व्यापार समुदाय रूप काव्य को भी 'ध्वनि' की संज्ञा दी है। १. प्रायः ध्वन्यालोक के सामान्य अध्येता को कहीं पर 'ध्वनि काव्य का आत्मा है' (काव्य- स्यात्मा ध्वनिः) इस प्रकार के ध्वनि के साथ काव्य के भेद या व्यतिरेक के व्यपदेश को और कहीं पर 'वह काव्य-विशेष ध्वनि है' इस प्रकार के अभेद या अव्यतिरेक के व्यपदेश को देख कर भ्रम हो जाता है। कभी ध्वनि काव्य की आत्मा है तो कभी स्वयं काव्य ही है ? लोचनकार के उपर्युक्त पञ्चविध ध्वनि को देखकर इस प्रकार का ग्रन्थ में अभेद और भेद का व्यवहार ठीक लग जाता है। जहाँ पर ध्वनि को काव्य का आत्मा कहा गया है वहाँ समझना चाहिए कि 'ध्वनि' से 'व्यङ्ग्य' अर्थ अभिप्रेत है और जहाँ स्वयं ध्वनि को काव्य कहा गया है वहाँ समझना चाहिए कि यहाँ वाच्य, वाचक, व्यञ्जना और व्यङ्ग्य के समुदाय रूप काव्य यहाँ 'ध्वनि' से अभिप्रेत है। २. ऊपर निर्दिष्ट पाँच प्रकार के ध्वनि को संक्षेप में वृत्तिकार ने 'वाच्यवाचकसम्मिश्रः शब्दात्मा काव्यमिति व्यपदेश्यः' इन शब्दों से निर्देश किया है। 'ध्वनि' शब्द की विभिन्न व्युत्पत्ति से सभी को संगृहीत करके लोचनकार ने स्पष्टीकरण किया है। 'ध्वनतीति ध्वनिः' इससे वाच्य अर्थ और वाचक शब्द दोनों को संगृहीत किया है। 'ध्वन्यते इति ध्वनिः से व्यङ्ग्य अर्थ संगृहीत है एवं 'ध्वननं ध्वनिः' से व्यञ्जना रूप शब्द का व्यापार गृहीत है, जिसे वृत्तिकार ने यहाँ 'शब्दात्मा' कहा है।