भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

पृष्ठ 202, कुल 680 में से

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पृष्ठ 202

१४२ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः वाचकसम्मिश्रः शब्दात्मा काव्यमिति व्यपदेश्यो व्यञ्जकत्वसाम्याद् ध्वनिरित्युक्तः । न चैवंविधस्य ध्वनेर्वक्ष्यमाणप्रभेदतद्भेदसंकलनया महाविषयस्य यत्प्रकाशनं तदप्रसिद्धालंकारविशेषमात्रप्रतिपादनेन वाच्य, वाचक, सम्मिश्र (अर्थात् व्यङ्ग्यार्थ) शब्द रूप (व्यञ्जना व्यापार) और 'काव्य' कहे जाने वाले को (अर्थात् काव्य को) व्यञ्जकत्व की समानता के कारण 'ध्वनि' कहा है। वक्ष्यमाण भेद-प्रभेद के सङ्कलन से महाविषय (व्यापक) ध्वनि का जो प्रकाशन है वह अप्रसिद्ध किसी अलङ्कार मात्र के सदृश नहीं लोचनम् श्रूयते विभावानुभावसंवलनयेति व्यङ्ग्योऽपि ध्वनिः, ध्वन्यत इति कृत्वा। शब्दनं शब्दः शब्दव्यापारः, न चासावभिधादिरूपः, अपि त्वात्मभूतः, सोऽपि ध्वननं ध्वनिः। काव्यमिति व्यपदेश्यश्च योऽर्थः सोऽपि ध्वनिः, उक्तप्रकारध्व- निचतुष्टयमयत्वात् । अतएव साधारणहेतुमाह—व्यञ्जकत्वसाम्यादिति । व्यङ्ग्य- व्यञ्जकभावः सर्वेषु पक्षेषु सामान्यरूपः साधारण इत्यर्थः । यत्पुनरेतदुक्तं 'वाग्विकल्पानामानन्त्यात्' इत्यादि, तत्परिहरति—न चैवं विधस्येति । वक्ष्य- माणः प्रभेदो यथा-मुख्ये द्वे रूपे । तद्भेदा यथा-अर्थान्तरसंक्रमितवाच्यः, अत्यन्ततिरस्कृतवाच्य इत्यविवक्षितवाच्यस्य, असंलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्यः संलक्ष्य- क्रमव्यङ्ग्य इति विवक्षितान्यपरवाच्यस्येति । तत्राप्यवान्तरभेदाः । महाविषय- स्येति—अशेषलक्ष्यव्यापिन इत्यर्थः । विशेषग्रहणेनाव्यापकत्वमाह । मात्रशब्दे- नाङ्गित्वाभावम् । तत्र ध्वनिस্বরূপे भावितं प्रणिहितं चेतो येषां तेन वा अनुसार है। विभावानुभाव के संवलन से जो सम्मिश्रित होता है, वह व्यंग्य भी 'ध्वनि' है। शब्दन शब्द, अर्थात् शब्द का व्यापार, वह अभिधादिरूप नहीं, बल्कि आत्मभूत है, वह भी 'ध्वननं' (व्युत्पत्ति के अनुसार) 'ध्वनि' है। और 'काव्य' शब्द से व्यपदेश्य जो अर्थ है वह भी 'ध्वनि' है, क्योंकि वह कथित प्रकार चार प्रकार के ध्वनियों से युक्त है। अतएव साधारण हेतु कहते हैं—व्यञ्जकत्व की समानता के कारण—। अर्थात् व्यंग्यव्यञ्जकभाव सब पक्षों में सामान्यरूप या साधारण है। जो कि यह कहा है—'वाणी के विकल्पों (भेदों) के आनन्त्य के कारण'—इत्यादि, उसका परिहार करते हैं—इस प्रकार के—। वक्ष्यमाण प्रभेद, जैसे—मुख्य दो रूप। उनके भेद, जैसे—'अविवक्षितवाच्य' के अर्थान्तरसंक्रमितवाच्य और अत्यन्ततिरस्कृतवाच्य; 'विवक्षितान्यपरवाच्य' के असंलक्ष्यक्रमव्यंग्य और संलक्ष्यक्रमव्यंग्य । उनके भी अवान्तर भेद। महाविषय—। अर्थात् पूरे लक्ष्यों में व्याप्त रहनेवाला । 'विशेष' ('किसी' अलङ्कार) इस कथन से (उसका) अव्यापकत्व कहा है । 'मात्र' शब्द से अङ्गित्व का अभाव कहा है। उस ध्वनि-स्वरूप में भावित अर्थात् प्रणिहित चित्त है जिनका,