ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथम उद्योतः १४३ ध्वन्यालोकः तुल्यमिति तद्भावितचेतसां युक्त एव संरम्भः । न च तेषु कथञ्चि- दीर्ष्यया कलुषितशेमुषीकत्वमाविष्करणीयम् । तदेवं ध्वनेस्तावदभाव- वादिनः प्रत्युक्ताः । अस्ति ध्वनिः । स चासावविवक्षितवाच्यो विवक्षितान्यपरवाच्य- श्चेति द्विविधः सामान्येन । है, ऐसी स्थिति में उस (ध्वनि) के प्रति भावित चित्त वालों का संरम्भ ठीक ही है। उन लोगों के प्रति ईर्ष्या से अपनी बुद्धि का कालुष्य आविष्कृत करना नहीं चाहिये । इस प्रकार ध्वनि के अभाववादियों का निराकरण किया । ध्वनि है । वह विवक्षितवाच्य और विवक्षितान्यपरवाच्य भेद से सामान्यतः दो प्रकार का है । लोचनम् चमत्काररूपेण भावितमधिवासितमत एव मुकुलितलोचनत्वादिविकारकारणं चेतो येषामिति । अभाववादिन इति । अवान्तरप्रकारत्रयभिन्ना अपीत्यर्थः । तेषां प्रत्युक्तौ फलमाह—अस्तीति । उदाहरणपृष्ठे भाक्तत्वं सुशङ्कं सुपरिहरं च भवतीत्यभिप्रायेणोदाहरणदानावकाशार्थं भाक्तत्वालक्षणीयत्वे प्रथमं परि- हरणयोग्ये अप्यप्रतिसमाधाय भविष्यदुद्योतानुवादानुसारेण वृत्तिकृदेव प्रभेद- निरूपणं करोति—स चेति । पञ्चधापि ध्वनिशब्दार्थे येन यत्र यतो यस्य यस्मै इति बहुव्रीह्यर्थाश्रयेण यथोचितं सामानाधिकरण्यं सुयोज्यम् । वाच्येऽर्थे अथवा उस चमत्काररूप से भावित अर्थात् अधिवासित चित्त है जिनका, अतएव मुकुलित-लोचन होना आदि विकारों का कारण चित्त है जिनका । अभाववादी—! अर्थात् अवान्तर तीन प्रकारों से भिन्न भी । उनके निराकरण का फल कहते हैं—ध्वनि है—। उदाहरण देने पर भाक्तत्व की शङ्का और परिहार भी सुकर हो जायगा, इस अभिप्राय से उदाहरण देने के अवसर के लिए 'भाक्तत्व' और अलक्षणीयत्व के पहले परिहरण योग्य होने पर भी उनका प्रतिसमाधान न करके आगे के 'उद्योत' में अनुवाद (द्विरुक्ति) के अनुसार वृत्तिकार ही प्रभेदों¹ का निरूपण करते हैं—वह—। 'ध्वनि' शब्द से पञ्चविध अर्थ में 'जिससे', १. ध्वनि के अभाववादियों का निराकरण करके आचार्य ने 'ध्वनि है' यह कहकर ध्वनि के अस्तित्व को सिद्ध कर दिया तब भाक्तत्ववादियों और अलक्षणीयतावादियों के निराकरण का प्रसंग क्रमप्राप्त है । किन्तु वृत्तिग्रन्थ में यहाँ ध्वनि के दो प्रभेदों की चर्चा करते हैं तथा उनके उदाहरण भी देते हैं, इसका क्या अभिप्राय है ? इस प्रश्न के समाधान में लोचनकार कहते हैं कि 'भाक्तवाद' का आधार 'लक्षणा व्यापार' है और ध्वनि के अविवक्षितवाच्यरूप प्रभेद में लक्षणा का परिचय जब प्राप्त हो जायगा तब आगे ध्वनि के भाक्तत्व की शङ्का भी सुविधा से बन जायगी और उसका परिहार भी सुविधा से हो जायगा । दूसरे यह भी कि आगे द्वितीय उद्योत में कारिका ग्रन्थ में ध्वनि के