भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

पृष्ठ 204, कुल 680 में से

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पृष्ठ 204

१४४ सलोचन-ध्वन्यालोकः लोचनम् तु ध्वनौ वाच्यशब्देन स्वात्मा तेनाविवक्षितोऽप्रधानीकृतः स्वात्मा येनेत्यविव- क्षितवाच्यो व्यञ्जकोऽर्थः । एवं विवक्षितान्यपरवाच्येऽपि । यदि वा कर्मधार- येणार्थपक्षे अविवक्षितश्चासौ वाच्यश्चेति । विवक्षितान्यपरश्चासौ वाच्यश्चेति । तत्रार्थः कदाचिदनुपपद्यमानत्वादिनिमित्तेनाविवक्षितो भवति । कदाचि- दुपपद्यमान इति कृत्वा विवक्षित एव, व्यङ्ग्यपर्यन्तां तु प्रतीतिं स्वसौभाग्य- महिम्ना करोति । अत एवार्थोऽत्र प्राधान्येन व्यञ्जकः, पूर्वत्र शब्दः । ननु च विवक्षा चान्यपरत्वं चेति विरुद्धम् । अन्यपरत्वेनैव विवक्षणात्को विरोधः ? सामान्येनेति । वस्त्वलङ्काररसात्मना हि त्रिभेदोऽपि ध्वनिरूभाभ्यामेवाभ्यां 'जहाँ', 'जिससे', जिसका', 'जिसमें' इस प्रकार बहुव्रीहि समास के अर्थ के आधार से जहाँ जो उचित लगे उसका सामानाधिकरण्य¹ बना लेना चाहिए । वाच्य अर्थ में ध्वनि का प्रयोग होगा तब 'वाच्य' शब्द से 'स्वात्मा' (कहा जायगा), इस प्रकार अविवक्षित या अप्रधानीकृत है स्वात्मा जिससे, इस प्रकार अविवक्षितवाच्य व्यञ्जक अर्थ है । इसी प्रकार विवक्षितान्यपरवाच्य में भी । अथवा कर्मधारय-समास से अर्थ के पक्ष में 'अविवक्षितश्चासौ वाच्यश्च' यह होगा। और 'विवक्षितान्यपरश्चासौ वाच्यश्च' होगा । वहाँ अर्थ कभी अनुपपद्यमानत्व आदि निमित्त से अविवक्षित होता है, कभी उपपद्यमान करके विवक्षित होता है, किन्तु व्यंग्य-पर्यन्त प्रतीति को अपने सौभाग्य की महिमा से उत्पन्न करता है। अतएव यहाँ अर्थ प्राधान्यतः व्यञ्जक है, और पहले में शब्द । शङ्का होती है कि 'विवक्षा' और 'अन्यपर' ये दोनों परस्पर विरुद्ध हैं । तब प्रश्न यह होगा कि 'अन्यपर' रूप से ही विवक्षा करने पर कौन-सा विरोध होगा ? (वस्तुतः कोई-कोई विरोध नहीं) । सामान्यरूप से-। भाव यह कि वस्तु, अलङ्कार और रस इन दो भेदों का प्रतिपादन न करके उनका अवान्तर भेद आरम्भ कर दिया है । ऐसा करने से कारिकाकार का तात्पर्य यही प्रतीत होता है कि पहले जो ध्वनि के अविवक्षितवाच्य और विवक्षितान्यपरवाच्य भेद कर चुके हैं उनके अब अवान्तर प्रभेद के प्रतिपादनार्थ कहते हैं । इस प्रकार द्वितीयोद्योत का अनुवाद उपपन्न करने के उद्देश्य से भी यहाँ स्वयं वृत्तिकार कारिकाकार की जगह पर स्थित होकर ध्वनि के भेदों का पहले ही प्रतिपादन कर देते हैं । १. पीछे 'ध्वनि' शब्द के पाँच अर्थों का निर्देश कर चुके हैं । प्रस्तुत में 'अविवक्षितवाच्य' आदि के द्वारा 'ध्वनि' शब्द के किस अर्थ को लेकर कहा गया है इसके समाधान में लोचनकार 'बहुव्रीहिसमास' के आश्रयण का उपाय निर्देश करते हैं । इस प्रकार 'ध्वनि' शब्द के जिस अर्थ के साथ सामानाधिकरण्य बैठ जाय उससे बना लेना चाहिए। उदाहरण के लिए, 'अविवक्षितः वाच्यो यस्य' इस बहुव्रीहि समास के द्वारा 'ध्वनि' के 'शब्द' रूप अर्थ के अनुसार यह भेद बन जाता है । इसी प्रकार अन्य अर्थों में समझ लेना चाहिए। 'बहुव्रीहि' में अन्य पदार्थ प्रधान होता है, ऐसी स्थिति में ध्वनि के अर्थ व्यङ्ग्य, व्यञ्जन और काव्य में तो बहुव्रीहि बन जाती है किन्तु, 'वाच्य' रूप अर्थ में नहीं बनती है क्योंकि यह अन्य पदार्थ नहीं बल्कि समास की कुक्षि में स्थित है । उसके समाधान में लोचनकार ने 'वाच्य' का अर्थ 'स्वात्मा' किया है, और समास किया है अविवक्षितः स्वात्मा येन (वाच्येन) ऐसा समास किया है।