भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

पृष्ठ 205, कुल 680 में से

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पृष्ठ 205

प्रथम उद्योतः १४५ ध्वन्यालोकः तत्राद्यस्योदाहरणम्— सुवर्णपुष्पां पृथिवीं चिन्वन्ति पुरुषास्त्रयः । शूरश्च कृतविद्यश्च यश्च जानाति सेवितुम् ॥ उनमें प्रथम का उदाहरण— तीन प्रकार के लोग सुवर्णपुष्पा पृथ्वी को चयन करते हैं, एक तो शूर, दूसरा विद्वान् और तीसरा जो सेवा करना जानता है । लोचनम् सङ्गृहीत इति भावः । ननु तन्नामपृष्ठे एतन्नामनिवेशनस्य किं फलम् ? उच्यते—अनेन हि नामद्वयेन ध्वननात्मनि व्यापारे पूर्वप्रसिद्धाभिधातात्पर्य- लक्षणात्मकव्यापारत्रितयावगतार्थप्रतीतेः प्रतिपत्तृगतायाः प्रयोक्त्रभिप्राय- रूपायाश्च विवक्षायाः सहकारित्वमुक्तमिति ध्वनिस्वरूपमेव नामभ्यामेव प्रोज्जीवितम् । सुवर्णपुष्पामिति । सुवर्णानि पुष्यतीति सुवर्णपुष्पा, एतच्च वाक्यमेवा- सम्भवत्स्वार्थमिति कृत्वाऽविवक्षितवाच्यम् । तत एव पदार्थमभिधायान्वयं च तात्पर्यशक्त्यावगमय्यैव बाधकवशेन तमुपहृत्य सादृश्यात्सुलभसमृद्धिसम्भार- रूप से तीन भेदों वाला भी यह ध्वनि इन्हीं दोनों से संगृहीत हो जाता है । शङ्का है कि 'ध्वनि' नाम के पश्चात् इस नाम के रखने का लाभ क्या है ? कहते हैं—इन दोनों नामों से ध्वननारूप व्यापार में पूर्वप्रसिद्ध अभिधा, तात्पर्य, लक्षणारूप तीनों व्यापारों से अवगत अर्थ की प्रतीति का और प्रतिपत्ता या ज्ञाता में रहनेवाली प्रयोक्ता के अभिप्रायरूप विवक्षा का सहकारित्व कहा है, इस प्रकार दोनों नामों से ध्वनि का स्वरूप ही प्रोज्जीवित¹ है । सुवर्णपुष्पा—। 'सुवर्णों को पुष्पित करती है, अतः 'सुवर्णपुष्पा'² यह वाक्य ही ऐसा है जिसका स्वार्थ सम्भव नहीं हो रहा है, इस कारण ( यह वाक्य ) 'अविवक्षित- वाच्य' है । उसी से पदार्थ का अभिधान करके और तात्पर्य-शक्ति से अन्वय को ज्ञात कराके बाधक के कारण उस अन्वय का उपहनन करके सादृश्य के बल से सुलभ १. अविवक्षितवाच्य और विवक्षितान्यपरवाच्य इन दोनों नामों के निर्देश का अभिप्राय यह है कि केवल व्यञ्जना व्यापार से 'ध्वनि' की पूर्णता सिद्ध नहीं होती है बल्कि सहायक या सहकारी रूप से प्रतिपत्ता को अभिधा, तात्पर्य और लक्षणा के अर्थों की एवं प्रयोक्ता के विवक्षा की भी आवश्यकता होती है । इसीलिए दोनों नाम आचार्य ने रखे हैं । अविवक्षितवाच्य ध्वनि लक्षणामूल होता है, अतः लक्षणा की सहकारिता के लिए एवं विवक्षितान्यपरवाच्य में प्रयोक्ता के विवक्षा की सहकारिता को व्यक्त किया है । क्योंकि इनके बिना केवल व्यञ्जना व्यापार से प्रतिपत्ता प्रतिपिपादिषित अर्थ का ज्ञान नहीं कर सकता । इसी उद्देश्य से लोचनकार लिखते हैं कि वस्तुतः यहाँ इन नामों से ध्वनि का स्वरूप प्रोज्जीवित हो गया है । २. लोचनकार ने 'सुवर्णपुष्पा' का अर्थ 'सुवर्णानि पुष्यति' के अनुसार 'सुवर्णों को पुष्पित १० ध्व०