भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

पृष्ठ 206, कुल 680 में से

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पृष्ठ 206

१४६ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः द्वितीयस्यापि— शिखरिणि क्व नु नाम कियच्चिरं किमभिधानमसावकरोत् तपः । तरुणि येन तवाधरपाटलं दशति बिम्बफलं शुकशावकः ॥१३॥ दूसरे का भी— हे तरुणि, यह सुग्गे का बच्चा किस पर्वत पर, कितने दिनों तक कौन सा तप किया है जो तेरे अधर के समान लाल वर्ण वाले बिम्बफल को काट रहा है ॥ १३ ॥ लोचनम् भाजनतां लक्षयति । तल्लक्षणाप्रयोजनं शूरकृतविद्यसेवकानां प्राशस्त्यमशब्द- वाच्यत्वेन गोप्यमानं सन्नायिकाकुचकलशयुगलमिव महार्घतामुपयद् ध्वन्यत इति । शब्दोऽत्र प्रधानतया व्यञ्जकः, अर्थस्तु तत्सहकारितयेति चत्वारो व्यापाराः । शिखरिणीति । न हि निर्विघ्नोत्तमसिद्धयोऽपि श्रीपर्वतादय इमां सिद्धिं विदध्युः । दिव्यकल्पसहस्रादिश्चात्र परिमितः कालः । न चैवंविधोत्तमफलजन- समृद्धि-सम्भार-भाजनता को लक्षणा द्वारा बोधन कराता है । उस लक्षणा का प्रयोजन शूर, कृतविद्य (विद्वान्) एवं सेवकों का जो प्राशस्त्य है, वह शब्द से वाच्य न होने के कारण गोप्यमान होकर नायिका के कुचकलशयुगल की भाँति चारुत्व (महार्घता) को, प्राप्त करता हुआ ध्वनित होता है । यहाँ शब्द प्रधान रूप से व्यञ्जक है और अर्थ शब्द के सहकारी होने के कारण व्यञ्जक है, इस प्रकार (अभिधा आदि) चारो व्यापार हो जाते हैं । पर्वत पर—। जहाँ बिना किसी विघ्न के उत्तम सिद्धियाँ प्राप्त हो जाती हैं ऐसे श्रीपर्वत आदि१ भी इस सिद्धि को नहीं दे सकेंगे । (इस प्रकार की सिद्धि प्राप्त करने के लिए) दिव्य कल्प-सहस्र आदि तो बहुत परिमित काल है । और इस काल के करनेवाली' किया है। 'दिव्याञ्जना' टिप्पणी में मेरे गुरुजी का कहना है कि यह केवल आचार्य ने अर्थ का प्रदर्शनमात्र किया है, विग्रह नहीं । अन्यथा यहाँ उनके व्याख्यान के आधार पर 'कर्मण्यण्' इस सूत्र से 'अण्' प्रत्यय तथा 'टिड्ढाणञ्' इत्यादि से ङीप् होकर 'सुवर्णपुष्पी' रूप सिद्ध होगा । इसलिए 'सुवर्णमेव पुष्पं यस्याः' यह विग्रह संगत होगा । अभिधा से पदार्थ-ज्ञान के पश्चात् तात्पर्य-शक्ति से अन्वय-बोध होता है । फिर भी यहाँ मुख्यार्थ के बाध को स्पष्ट करने के लिए लोचनकार का ही ढंग ठीक लगता है । 'पृथ्वी' कोई ऐसी लता नहीं है जो सुवर्णों के फूल खिलाती है' यह इस प्रकार मुख्यार्थ का बाध होता है तत्पश्चात् सादृश्य के बल से शूर, कृतविद्य और सेवक, ये तीनों की सुलभसमृद्धिसम्भारभाजनता लक्षित होती है, अर्थात् जो लोग शूर, कृतविद्य एवं सेवक होते हैं उन्हें महती समृद्धि सुलभ हो जाती है यह लक्ष्यार्थ है और लक्षणा के प्रयोजन के रूप में तीनों का प्राशस्त्य प्रतीत होता है । १. 'श्रीपर्वत' यह दक्षिण देश का प्रसिद्ध पर्वत है । प्राचीन काल में, विशेषकर जब भारत में तान्त्रिक साधना का प्रचार था, यह पर्वत उसका महान् केन्द्र था। बौद्धों के वज्रयान का प्रचलन