भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

पृष्ठ 207, कुल 680 में से

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पृष्ठ 207

प्रथम उद्योतः १४७ लोचनम् कत्वेन पञ्चाग्निप्रभृत्यपि तपः श्रुतम्। तवेति भिन्नं पदम्। समासेन विगलिततया प्रतीयेत, तव दशतीत्यभिप्रायेण । तेन यदाहुः—‘वृत्तानुरोधात्त्वदधरपाटल- मिति न कृतम्’ इति, तदसदेव; दशतीत्यास्वादयति अविच्छिन्नप्रबन्धतया, न त्वौदरिकवत्परं भुङ्क्ते; अपि तु रसज्ञोऽत्रेति तत्प्राप्तिवदेव रसज्ञताप्यस्य तपः- प्रभावादेवेति । शुकशावक इति तारुण्याद्युचितकाललाभोऽपि तपस एवेति । अनुरागिणश्च प्रच्छन्नस्वाभिप्रायख्यापनवैदग्ध्यचाटुविरचनात्मकविभावोद्दीपनं व्यङ्ग्यम् । अत्र च त्रय एव व्यापाराः—अभिधा तात्पर्यं ध्वननं चेति । मुख्यार्थबाधा- उत्तम फल के जनक के रूप में पञ्चाग्नि प्रभृति तप को भी नहीं सुना है । 'तुम्हारा' यह पद भिन्न १ ( असमस्त ) है। समास से विगलित ( साधारण ) रूप में प्रतीत होगा, अतः 'तुम्हारा दशन करता है ( काटता है )' इस अभिप्राय से ( युष्मदर्थ को असमस्त या भिन्न करके रखा ) । अतः, जो कि कहते हैं—'छन्द के अनुरोध से 'त्वदधरपाटलम्' ऐसा नहीं किया है, वह तो ठीक ही नहीं; दशन करता है ( काटता है ) अर्थात् अविच्छिन्न रूप से आस्वादन कर रहा है, न कि पेटू आदमी की तरह पूरा खा जाता है अपि तु रसज्ञ है, जिस प्रकार उस ( अधर ) की प्राप्ति तपस्या के प्रभाव से हुई उसी प्रकार उसकी रसज्ञता भी तपःप्रभाव से ही है । 'शुकशावक' की ही स्थिति में उचित काल का लाभ भी तप के कारण ही है । यहाँ अनुरागी का अपने प्रच्छन्न अभिप्राय के ख्यापन के वैदग्ध्य से चाटुरचना द्वारा विभाव ( तरुणी रूप आलम्बन विभाव ) का उद्दीपन व्यङ्ग्य है । यहाँ तीन व्यापार हैं—अभिधा, तात्पर्य और ध्वनन। क्योंकि मुख्यार्थबाध आदिका यहीं से हुआ था । प्राचीन साहित्य में इस पर्वत के सम्बन्ध में यह धारणा थी कि वहाँ पर जाकर तप करने से अलौकिक सिद्धियाँ सहज ही प्राप्त हो जाती हैं । १. प्रस्तुत पद्य में 'तव अधरपाटलं दशति' पर ही विशेष रूप से विचार किया गया है। यहाँ लोचनकार ने 'तव' के प्रयोग को विशेष अर्थ का व्यञ्जक माना है। जिस नायिका से यह बात कही जा रही है उसके सम्बन्ध को 'अधर' पदार्थ के साथ बोधन वक्ता का अभीष्ट है । इसी कारण 'तव' को 'अधरपाटलम्' से यह भिन्न या समासरहित रखा है । समास कर देने पर नायिका के सम्बन्ध का बोध नहीं होता, बल्कि साधारणरूप से उसके अधरपाटल को शुकशावक काटता है यह अर्थ प्रतीत होता । इस प्रकार अविमृष्टविधेयांश दोष का यहाँ अभाव है । 'तव' इस असमस्त पद से नायिका के सम्बन्ध के प्रतीत होने से श्लोक के अर्थ में एक अद्भुत विशेषता झलकने लगती है तब मतलब यह हो जाता है कि तेरा अधर तेरे कारण और भी स्वादु हो गया है अतः उसके समान यह बिम्बफल शुकशावक और भी मस्ती से काट रहा है । ऐसा नहीं कि पेटू आदमी की तरह रसास्वादन का मजा लिए बिना काट-काट कर खाये जा रहा है । इससे शुक-शावक की रसज्ञता भी व्यञ्जित हो रही है। किसी ने 'त्वदधरपाटलम्' इस समस्तरूप से न कहने का कारण द्रुतविलम्बित छन्द का अनुरोध बताया था, पर यह पक्ष ठीक नहीं। इस पद्य से किसी कामुक नायक का नायिका के प्रति अभिलाष व्यङ्ग्य हो रहा है, मैं भी तेरे अधर को दशन करता ।