ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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१४८ सलोचन-ध्वन्यालोकः
ध्वन्यालोकः
यदप्युक्तं भक्तिर्ध्वनिरिति, तत्प्रतिसमाधीयते—
जो कि 'भक्ति ध्वनि है' यह कहा है उसका प्रतिसमाधान करते हैं—
लोचनम्
द्यभावे मध्यमकक्ष्यायां लक्षणायास्तृतीयाया अभावात्। यदि वाऽऽकस्मिक-
विशिष्टप्रश्नार्थानुपपत्तेर्मुख्यार्थबाधायां सादृश्याल्लक्षणा भवतु मध्ये। तस्यास्तु
प्रयोजनं ध्वन्यमानमेव, तत्तूर्यकक्ष्यानिवेशि, केवलं पूर्वत्र लक्षणैव प्रधानं
ध्वननव्यापारे सहकारि। इह त्वभिधातात्पर्यशक्ती। वाक्यार्थसौन्दर्यादेव
व्यङ्ग्यप्रतिपत्तेः केवलं लेशेन लक्षणाव्यापारोपयोगोऽप्यस्तीत्युक्तम्। असंलक्ष्य-
क्रमव्यङ्ग्ये तु लक्षणासमुन्मेषमात्रमपि नास्ति, असंलक्ष्यत्वादेव क्रमस्येति
वक्ष्यामः। तेन द्वितीयेऽपि भेदे चत्वार एव व्यापाराः ॥ १३ ॥
अत एवोभयोदाहरणपृष्ठ एव भाक्तमाहुरित्यनुभाष्य दूषयति। अयं भावः-
भक्तिश्च ध्वनिश्चेति किं पर्यायवत्ताद्रूप्यम् ? अथ पृथिवीत्वमिव पृथिव्या अन्यतो
व्यावर्तकधर्मरूपतया लक्षणम् ? उत काक इव देवदत्तगृहस्य सम्भवमात्रादुप-
लक्षणम् ? तत्र प्रथमं पक्षं निराकरोति—
अभाव होने से बीच की कक्ष्या में तीसरी लक्षणा वृत्ति यहाँ नहीं है। अथवा
आकस्मिक (असम्भावित) एवं विशिष्ट (शुक द्वारा तप करने के स्थान को लेकर)
प्रश्नार्थ की उपपत्ति न बनने के कारण मुख्यार्थबाध के हो जाने पर सादृश्य से बीच
में लक्षणा हो सकती है। उस (लक्षणा का) प्रयोजन ध्वन्यमान ही है, वह (ध्वन्यमान
प्रयोजन) चौथी कक्ष्या में रहने वाला है। (अगर दोनों उदाहरणों में भेद करें तो)
पहले उदाहरण में केवल लक्षणा ही प्रधान होकर ध्वनन व्यापार में सहकारिणी है,
और यहाँ अभिधा या तात्पर्य ये दोनों शक्तियाँ (ध्वनन व्यापार में) सहकारिणी हैं।
क्योंकि वाक्यार्थ के सौन्दर्य से ही व्यंग्य की जब प्रतीति हो जाती है, ऐसी स्थिति में
केवल लेशरूप से यहाँ लक्षणा व्यापार का उपयोग भी है ऐसा कहा गया। 'असंलक्ष्य-
क्रमव्यंग्य' (जहाँ व्यंग्य के बोध का क्रम संलक्षित नहीं होता) में लक्षणा का समुन्मेष
मात्र भी, क्रम के संलक्ष्य न होने के कारण ही, नहीं है, यह कहेंगे। इस प्रकार दूसरे
भी भेद में चार ही व्यापार हैं ॥ १३ ॥
इसीलिए दोनों के उदाहरणों के बाद ही 'भाक्तमाहुः' इसका अनुवाद करके दोष
देते हैं। भाव यह है— 'भक्ति' और 'ध्वनि' इस प्रकार क्या (इन्द्र, शक्र आदि) पर्याय
की भाँति दोनों का ऐक्य या अभेद है ? अथवा पृथिवी के 'पृथिवीत्व' की भाँति
अतिरिक्त के व्यावर्तक धर्मरूप होने के कारण, लक्षण है ? या कौए की भाँति देवदत्त
के गृह का सम्भवमात्र से, उपलक्षण है ? उनमें प्रथम पक्ष का निराकरण करते हैं—
१. 'भक्ति' और 'ध्वनि' को तीन प्रकार से अभिन्न कह सकते हैं—पर्याय, लक्षण और उपलक्षण। अर्थात् भाक्तवादी क्या ध्वनि और भक्ति को पर्याय मानते हैं, जैसे घट और कलश शब्द एक ही अर्थ के बोधक हैं, अथवा 'भक्ति' ध्वनि का लक्षण है, जैसे पृथिवीत्व पृथिवी का