ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथम उद्योतः १४९ ध्वन्यालोकः भक्त्या बिभर्ति नैकत्वं रूपभेदादयं ध्वनिः अयमुक्तप्रकारो ध्वनिर्भक्त्या नैकत्वं बिभर्ति भिन्नरूपत्वात् । वाच्यव्यतिरिक्तस्यार्थस्य वाच्यवाचकाभ्यां तात्पर्येण प्रकाशनं यत्र व्यङ्ग्यप्राधान्ये स ध्वनिः । उपचारमात्रं तु भक्तिः । 'यह ध्वनि रूप भेद के कारण 'भक्ति' के साथ एकत्व ( अभेद ) को धारण नहीं करता ।' यह उक्त प्रकार का ध्वनि भिन्न रूप होने के कारण भक्ति से एकत्व ( अर्थात् अभेद ) प्राप्त नहीं करता । वाच्य से व्यतिरिक्त अर्थ का वाच्य और वाचक द्वारा तात्पर्य रूप से प्रकाशन जहाँ व्यङ्ग्य के प्राधान्य में हो वह 'ध्वनि' है । 'भक्ति' तो उपचार मात्र है । लोचनम् भक्त्या बिभर्तीति । उक्तप्रकार इति पञ्चस्वर्थेषु योज्यम्—शब्देऽर्थे व्यापारे व्यङ्ग्ये समुदाये च । रूपभेदं दर्शयितुं ध्वनेस्तावद्रूपमाह—वाच्येति । तात्पर्येण विश्रान्तिधामतया प्रयोजनत्वेनेति यावत् । प्रकाशनं द्योतनमित्यर्थः । उपचारमा- त्रमिति । उपचारो गुणवृत्तिर्लक्षणा उपचरणमतिशयितो व्यवहार इत्यर्थः । यह ध्वनि—। 'उक्त प्रकार' को पाँचो अर्थों में लगाना चाहिए—शब्द में, अर्थ में, व्यापार में; व्यंग्य में और समुदाय ( रूप काव्य ) में । रूपभेद को दिखाने के लिए ध्वनि का स्वरूप कहते हैं—वाच्य से—। 'तात्पर्यरूप से' अर्थात् विश्राम लेने का स्थान होने के कारण प्रयोजनरूप होने से । 'प्रकाशन' अर्थात् द्योतन । उपचारमात्र—१ उपचार व्यावर्तक धर्म रूप लक्षण है । अथवा 'उपलक्षण' अर्थात् सूचक मात्र है, जैसे 'काकवद् देवदत्तस्य गृहम्' अर्थात् देवदत्त का घर कौवे वाला है, यह उसी समय बात कही गई है जब देवदत्त के घर पर कौआ बैठा है, इस प्रकार 'काकवत्त्व' देवदत्त के घर का सूचक मात्र होने से 'उपलक्षण' है । इन तीनों विकल्पों में 'भक्ति' ध्वनि का क्या है ? यह प्रश्न भाक्तवादी से स्वयं उद्भावित करते हैं । समाधान में, आचार्य ने तीनों विकल्पों का निराकरण कर दिया । प्रथम विकल्प 'पर्याय' के सम्बन्ध में आचार्य कहते हैं कि भक्ति और ध्वनि किसी प्रकार एक दूसरे के पर्याय नहीं हो सकते हैं, क्योंकि दोनों में रूपभेद है अर्थात् ध्वनि का स्वरूप भिन्न है और भक्ति का स्वरूप भिन्न । फिर प्रस्तुत कारिका के उत्तरार्ध में आचार्य ने भक्ति को ध्वनि का 'लक्षण' भी अमान्य ठहराया है, क्योंकि 'लक्षण' वही होता है जिसमें अतिव्याप्ति और अव्याप्ति आदि दोष नहीं होते । किन्तु 'भक्ति' को ध्वनि का लक्षण बनाने पर अतिव्याप्ति और अव्याप्ति दोनों दोष उत्पन्न होंगे । इसे आगे स्वयं स्पष्ट करेंगे। फिर तीसरे विकल्प 'उपलक्षण' को आचार्य ने १९ वीं कारिका के पूर्वार्ध में स्वीकार करते हुए यह स्पष्ट कह दिया है कि इससे यह नहीं कह सकते हैं कि गुणवृत्ति या भक्ति से ही ध्वनि लक्षित होता है । यह विषय आगे के पृष्ठों में स्पष्ट होगा । १. 'उपचार' का अर्थ लोचनकार ने 'अतिशयित व्यवहार' करके यह व्यक्त किया है कि जिस शब्द का जिस अर्थ में संकेततः व्यवहार प्रसिद्ध है उसे छोड़ कर उससे सम्बद्ध अर्थ में