भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

पृष्ठ 210, कुल 680 में से

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पृष्ठ 210

१५० सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः मा चैतत्तस्याङ्गक्तिर्लक्षणं ध्वनेरित्याह— अतिव्याप्तेरथाव्याप्तेर्न चासौ लक्ष्यते तया ॥ १४ ॥ नैव भक्त्या ध्वनिर्लक्ष्यते । कथम् ? अतिव्याप्तेरव्याप्तेश्च । तत्रातिव्याप्तिर्ध्वनिव्यतिरिक्तेऽपि विषये भक्तेः सम्भवात् । यत्र हि व्यङ्ग्यकृतं महत्सौष्ठवं नास्ति तत्राप्युपचरितशब्दवृत्त्या प्रसिद्धयनुरोध- प्रवर्तितव्यवहाराः कवयो दृश्यन्ते । यथा— 'भक्ति' ध्वनि का लक्षण है, यह भी नहीं हो सकता, यह कहते हैं— 'अतिव्याप्ति और अव्याप्ति के कारण यह ( ध्वनि ) उस ( भक्ति ) से लक्षित नहीं हो सकता ।' ॥ १४ ॥ भक्ति से ध्वनि नहीं ही लक्षित होता है । कैसे ? अतिव्याप्ति और अव्याप्ति के कारण ! वहाँ, ध्वनि से भिन्न स्थल में भी भक्ति का सम्भव है, यह अतिव्याप्ति है । जहाँ व्यंग्यकृत अधिक ( महत् ) सौष्ठव नहीं है वहाँ भी कविजन प्रसिद्धिवश उपचरित शब्द-व्यापार ( गौणी वृत्ति ) से व्यवहार करते देखे जाते हैं । जैसे— लोचनम् मात्रशब्देनेदमाह— यत्र लक्षणाव्यापारात्तृतीयादन्यश्चतुर्थः प्रयोजनद्योतनात्मा व्यापारो वस्तुस्थित्या सम्भवन्नप्यनुपयुज्यमानत्वेनानाद्रियमाणत्वादसत्कल्पः । 'यमर्थमधिकृत्य' इति हि प्रयोजनलक्षणम् । तत्रापि लक्षणास्तीति कथं ध्वननं लक्षणा चेत्येकं तत्त्वं स्यात् । द्वितीयं पक्षं दूषयति—अतिव्याप्तेरिति । असाविति ध्वनिः । तयेति भक्त्या । ननु ध्वननमवश्यम्भावीति कथं तद्व्यतिरिक्तोऽस्ति विषय इत्याह—महत्सौष्ठवमिति । अत एव प्रयोजनस्यानादरणीयत्वाद् व्यञ्ज- कत्वेन न कृत्यं किञ्चिदिति भावः । महद्ग्रहणेन गुणमात्रं तद्भवति । यथोक्तम्— अर्थात् गुणवृत्ति, लक्षणा । 'उपचरण' अर्थात् अतिशयित व्यवहार । 'मात्र' शब्द से यह कह सकते हैं—जहाँ तीसरे लक्षणा व्यापार से अतिरिक्त प्रयोजन-द्योतनरूप चौथा व्यापार वस्तुस्थिति के साथ सम्भव होता हुआ भी उपयुज्यमान न होने के कारण आदर का पात्र न होकर नहीं के बराबर है । 'प्रयोजन' का लक्षण यह है—'जिस वस्तु को लेकर कोई प्रवृत्त होता है वह प्रयोजन है' ( यमर्थमधिकृत्य प्रवर्तते तत् प्रयोजनम् ) । वहाँ भी लक्षणा है । इस प्रकार कैसे ध्वनन और लक्षणा एक तत्त्व हो सकते हैं ? दूसरे पक्ष में दोष देते हैं—अतिव्याप्ति होने के कारण—। 'यह' अर्थात् ध्वनि । उससे अर्थात् भक्ति से । शङ्का है कि ( लक्षणा में ) ध्वनन अवश्यम्भावी है, ऐसी स्थिति में कैसे उस ( ध्वनि ) से भिन्न-विषय है ? इस पर कहते हैं—अधिक सौष्ठव ( या शब्द का व्यवहार ही अतिशयित व्यवहार है । यद्यपि इस उपचार रूप गुणवृत्ति या लक्षणा में 'प्रयोजन' भी होता है, किन्तु वहां उपयोगी न होने के कारण न होने के समान ( असत्कल्प ) ही माना जाता है । इसलिए वृत्तिग्रन्थ में 'उपचार' के साथ 'मात्र' का प्रयोग है ।