भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

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प्रथम उद्योतः १५१ ध्वन्यालोकः परिम्लानं पीनस्तनजघनसंङ्गादुभयत- स्तनोर्मध्यस्यान्तः परिमिलनमप्राप्य हरितम् । इदं व्यस्तन्यासं श्लथभुजलताक्षेपवलनैः कृशाङ्ग्याः सन्तापं वदति बिसिनीपत्रशयनम् ॥ दोनों ओर मोटे स्तन और जघन के सम्पर्क से अधिक मुरझाया हुआ, मध्यभाग ( कटि ) के बीच सम्पर्क प्राप्त न करके हरा ही बना हुआ एवं शिथिल भुजलता के फेंकने और मोड़ने की क्रियाओं से इधर-उधर अस्तव्यस्त, कमलिनी के पत्तों का यह शयन कृश अङ्गोंवाली का विरहसन्ताप कह रहा है । लोचनम् 'समाधिरन्यधर्मस्य' काप्यारोपो विवक्षित' इति दर्शयति । ननु प्रयोजनाभावे कथं तथा व्यवहार इत्याह—प्रसिद्धद्यनुरोधेति । परम्परया तथैव प्रयोगात् । वयं तु ब्रूमः—प्रसिद्धिर्या प्रयोजनस्यानिगूढतेत्यर्थः । उत्तानेनापि रूपेण तत्प्रयोजनं चकासन्निगूढतां निधानवदपेक्षत इति भावः । वदतीत्युपचारे हि स्फुटीकरणप्रतिपत्तिः प्रयोजनम् । यद्यगूढं स्वशब्देनोच्येत, किमचारुत्वं स्यात् ? गूढतया वर्णने वा किं चारुत्वमधिकं जातम् ? अनेनैवाशयेन वक्ष्यति— सौन्दर्य )—। अतएव भाव यह कि प्रयोजन के आदरणीय न होने के कारण व्यञ्जक होने से ( व्यञ्जना व्यापार से ) कुछ नहीं होता जाता । 'अधिक' ( महत् ) ग्रहण से ( यह ज्ञात होता है कि वह ( व्यञ्जकत्व या व्यञ्जना व्यापार ), कोई गुणमात्र ( अप्रधान ) होता है । जैसा कि कहा है—'दूसरे के ( अप्रस्तुत के ) धर्म का कहीं पर जब आरोप विवक्षित हो तब 'समाधि' ( नाम का गुण ) कहते हैं' इसे दिखाते हैं । शङ्का है कि प्रयोजन के अभाव में कैसे उस प्रकार व्यवहार होगा ? इस प्रकार कहते हैं—प्रसिद्धिवश—। क्योंकि परम्परा से उसी प्रकार प्रयोग है । हम तो कहते हैं—प्रसिद्धि वह है जो प्रयोजन की अनिगूढता ( प्रकटरूपता ) है । भाव यह कि उत्तानरूप से प्रकाशित होता हुआ प्रयोजन खजाने की भाँति निगूढता की अपेक्षा करता है । 'वदति'१ ( 'कह रहा है' ) इस 'उपचार' में स्फुटीकरण की प्रतीति प्रयोजन है । यदि अनिगूढ या प्रकटरूप से शब्दतः उक्त कर दिया जाए तो क्या १. 'वदति' अर्थात् 'प्रकटयति' । 'वदति' का प्रयोजन है प्रकटन का ज्ञान । यदि कवि ने 'प्रकटयति' ही लिख दिया होता तब भी कोई अचारुत्व नहीं होता और 'वदति' इस उपचरित व्यवहार या गूढरूप से वर्णन से कोई अधिक चारुत्व भी सिद्ध नहीं होता । यह कभी भी ध्वनि का विषय नहीं हो सकता, किन्तु भक्ति का विषय तथापि माना जा सकता है । इस प्रकार अतिव्याप्ति के कारण भक्ति को ध्वनि का लक्षण नहीं कहा जा सकता ।