ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१५२ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः तथा— चुम्बिज्जइ असहुत्तं अवरुन्धिज्जइ सहस्सहुत्तम्वि । विरमिअ पुणो रमिज्जइ पिओ जणो णत्थि पुनरुत्तम् ॥ ( शतकृत्वोऽवरुध्यते सहस्रकृत्वश्चुम्ब्यते । विरम्य पुना रम्यते प्रियो जनो नास्ति पुनरुक्तम् ॥ इति च्छाया ) तथा— कुविआओ पसन्नाओ ओरण्णमुहीओ विहसमाणाओ । जह गहिओ तह हिअअं हरन्ति उच्छिन्तमहिलाओ ॥ उसी प्रकार— प्रिय को सौ बार चुम्बन करते हैं; हजार बार अवरोधन ( आलिङ्गन ) करते हैं, विराम करके रमण करते हैं, फिर भी पुनरुक्त नहीं होता ! उसी प्रकार— खिसियानी, खुश, रुआंसी या हँसती, चाहे जिस रूप में ग्रहण करो मनचली औरतें दिल हर लेती हैं। लोचनम् यत उक्त्यन्तरेणाशक्यं यदिति । अवरुन्धिज्जइ आलिङ्ग्यते । पुनरुक्तमित्यनुपा- देयता लक्ष्यते, उक्तार्थस्यासम्भवात् । कुपिताः प्रसन्ना अवरुदितवदना विहसन्त्यः । यथा गृहीतास्तथा हृदयं हरन्ति स्वैरिण्यो महिलाः ।। अचारुत्व हो जाता है ? अथवा गूढ या अप्रकटरूप से वर्णन करने पर क्या चारुत्व अधिक हो जाता है ? इसी आशय से कहेंगे—'क्योंकि 'दूसरी उक्ति से जो अशक्य है—' इत्यादि । अवरोधन करता है अर्थात् आलिङ्गन करता है । 'पुनरुक्त' इससे अनुपादेयता लक्षित होती है, क्योंकि वचनरूप उक्त अर्थ का ( प्रियजन के अर्थ में ) सम्भव नहीं । १. पुनरुक्त और पुनर्वचन, किसी बात को दुबारा कहना । प्रिय तो कोई वचन नहीं है जो पुनरुक्त होता है, इस प्रकार यहाँ मुख्यार्थ का बाध होकर लक्षणा होती है और उससे लक्षित होती है अनुपादेयता, अर्थात् प्रिय की तब भी किसी प्रकार अनुपादेयता नहीं होती, बल्कि उसकी उपादेयता सब प्रकार से बनी रहती है । यहाँ पर अधिकफलशालित्व रूप प्रयोजन प्रतीत होता है किन्तु चमत्कारी न होने के कारण आदरणीय नहीं है । इसलिए पूर्ववत् यह भी ध्वनि का विषय नहीं है ।