ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथम उद्योतः १५३ ध्वन्यालोकः तथा— अज्जाएँ पहारो णवलदाए दिण्णो पिएण थणवट्टे । मिउओ वि दूसहो विअ जाओ हिअए सवत्तीणम् ॥ ( भार्यायाः प्रहारो नवलतया दत्तः प्रियेण स्तनपृष्ठे । मृदुकोऽपि दुःसह इव जातो हृदये सपत्नीनाम् ॥ इति च्छाया ) उसी प्रकार— 'प्रिय ने नवलता से जब भार्या के स्तन पर प्रहार दिया तब वह ( प्रहार ) मृदु होकर भी सौतों के हृदय में दुःसह हो गया।' लोचनम् अत्र ग्रहणेनोपादेयता लक्ष्यते । हरणेन तत्परतन्त्रतापत्तिः । तथा-अज्जेति । कनिष्ठभार्यायाः स्तनपृष्ठे नवलतया कान्तेनोचितक्रीडा- योगेन मृदुकोऽपि प्रहारो दत्तः सपत्नीनां सौभाग्यसूचकं तत्क्रीडासंविभागम- प्राप्तानां हृदये दुःसहो जातः, मृदुकत्वादेव । अन्यस्य दत्तो मृदुः प्रहारोऽन्यस्य च सम्पद्यते । दुस्ससहश्च मृदुरपीति चित्रम् । दानेनात्र फलवत्त्वं लक्ष्यते । यहाँ 'ग्रहण'¹ से उपादेयता लक्षित होती है और 'हरण' से उसके परतन्त्र हो जाने की स्थिति ( लक्षित होती है ) । 'उसी प्रकार' भार्या—। छोटी भार्या के स्तन पर नवलता से प्रिय द्वारा उचित क्रीड़ा के सम्बन्ध से दिया हुआ मृदु भी प्रहार सौभाग्य के सूचक उस क्रीड़ा-संविभाग को नहीं पाई हुई सौतों के हृदय में दुःसह हो गया, मृदु होने के कारण ही। दूसरे को दिया हुआ मृदु प्रहार दूसरे को प्राप्त होता है। मृदु होकर भी दुःसह है यह आश्चर्य है। यहाँ ( प्रहार के ) 'दान'² या दिए जाने से फलवत्त्व ( सफल होना ) लक्षित होता है। १. 'गृहीताः' में ग्रहण से स्वैरिणी महिलाओं ( मनचली औरतों ) की उपादेयता लक्षित होती है और 'हरन्ति' में हरण से परतन्त्रता लक्षित होती है, हर लेती है अर्थात् अपने वश में कर लेती हैं। यहां भी व्यङ्ग्य अर्थ के प्राधान्य के अभाव में ध्वनि नहीं है। २. 'दत्तः में 'दान' तो किसी पदार्थ का होता है, यह 'दान' का मुख्य अर्थ प्रस्तुत में 'प्रहार के दान' में बाधित होने के कारण फलवत्त्व लक्षित होता है। पूर्ववत् यह भी ध्वनि का विषय नहीं।