ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१५४ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः तथा— परार्थे यः पीडामनुभवति भङ्गेऽपि मधुरो यदीयः सर्वेषामिह खलु विकारोऽप्यभिमतः । न सम्प्राप्तो वृद्धिं यदि स भृशमक्षेत्रपतितः किमैक्षोर्दोषोऽसौ न पुनरगुणाया मरुभुवः ॥ इत्यत्रैक्षुपक्षेऽनुभवतिशब्दः । न चैवंविधः कदाचिदपि ध्वनेर्विषयः । उसी प्रकार— जो दूसरों के लिए पीड़ा ( कष्ट या पीड़न अर्थात् रस निकालने के लिए यन्त्र में पीड़ित होने ) का अनुभव करता है, टूट जाने पर भी मधुर ( मीठा ) बना रहता है, सबों को जिसका विकार ( रस अथवा दोष ) भी अच्छा लगता है वह ईख यदि ऊसर जमीन में पड़कर नहीं बढ़ा तो क्या यह ईख का दोष ( अपराध ) है, गुणहीन मरुभूमि का नहीं ? यहाँ ईख के पक्ष में 'अनुभव करता है' यह शब्द ( उपचरित है ), इस प्रकार का शब्द कभी ध्वनि का विषय नहीं होता ॥ १४ ॥ लोचनम् तथा—परार्थेति । यद्यपि प्रस्तुतमहापुरुषापेक्षयानुभवतिशब्दो मुख्य एव, तथाप्यप्रस्तुते इक्षौ प्रशस्यमाने पीडाया अनुभवेनेनासम्भवता पीडावत्त्वं लक्ष्यते; तच्च पीड्यमानत्वे पर्यवस्यति । नन्वस्त्यत्र प्रयोजनं तत्किमिति न ध्वन्यत इत्याशङ्क्याह—न चैवं- विध इति ॥ १४ ॥ उसी प्रकार—दूसरों के लिए—। प्रस्तुत महापुरुष की अपेक्षा यद्यपि 'अनुभव करता है' शब्द मुख्य ही है, तथापि अप्रस्तुत इक्षु की प्रशंसा की जाने पर नहीं सम्भव होते हुए पीड़ा के अनुभव से पीड़ावान् होना लक्षित होता है, और वह पीड्यमान होने में पर्यवसित होता है ।¹ शङ्का करते हैं कि यदि प्रयोजन यहाँ है तो क्यों नहीं ध्वनित होता है ? यह आशङ्का करके कहते हैं—इस प्रकार का—। ॥ १४ ॥ १. यद्यपि प्रकृत 'महापुरुष' के पक्ष में 'अनुभवति' शब्द उपपन्न है, तथापि अप्रकृत 'इक्षु' के पक्ष में असम्भव होता हुआ ( क्योंकि जड़ पदार्थ इक्षु अनुभव करने की सामर्थ्य नहीं रखता ) पीडावत्त्व को लक्षित करता है । यहाँ भी व्यङ्ग्य के अप्राधान्य में ध्वनि का अभाव है । इन पाँचो उदाहरणों का यही अभिप्राय है कि अतिव्याप्त होने के कारण 'भक्ति' ध्वनि का लक्षण नहीं हो सकती ।