भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

पृष्ठ 215, कुल 680 में से

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पृष्ठ 215

प्रथम उद्योतः १५५ ध्वन्यालोकः यतः— उक्त्यन्तरेणाशक्यं यत्तच्चारुत्वं प्रकाशयन् । शब्दो व्यञ्जकतां बिभ्रद् ध्वन्युक्तेर्विषयीभवेत् ॥ १५ ॥ अत्र चोदाहृते विषये नोक्त्यन्तराशक्यचारुत्वव्यञ्जिहेतुः शब्दः। किञ्च— क्योंकि— जो चारुत्व दूसरी उक्ति ( उक्त्यन्तर ) से प्रकाशित नहीं किया जा सकता उसे प्रकाशित करने वाला एवं व्यञ्जकता ( व्यञ्जना व्यापार ) को धारण करने वाला शब्द 'ध्वनि' इस उक्ति का विषय होता है ॥ १५ ॥ और यहाँ उदाहृत विषय में शब्द दूसरी शक्ति से अशक्य चारुत्व की व्यञ्जना का हेतु नहीं है। और भी, लोचनम् यत उक्त्यन्तरेणेति । उक्त्यन्तरेण ध्वन्यतिरिक्तेन स्फुटेन शब्दार्थव्यापार- विशेषेणेत्यर्थः । शब्द इति पञ्चस्वर्थेषु योज्यम् । ध्वन्युक्तेर्विषयीभवेदिति—ध्वनि- शब्देनोच्यत इत्यर्थः । उदाहृत इति । वदतीत्यादौ ॥ १५ ॥ एवं यत्र प्रयोजनं सदपि नादरास्पदं तत्र को ध्वननव्यापार इत्युक्तवा यत्र मूलत एव प्रयोजनं नास्ति, भवति चोपचारस्तत्रापि को ध्वननव्यापार इत्याह—किञ्चेति । लावण्याद्या ये शब्दाः स्वविषयाल्लवणरसयुक्तत्वादेः स्वार्था- दन्यत्र हृद्यत्वादौ रूढाः, रूढत्वादेव त्रितयसन्निध्यपेक्षक्षणव्यवधानशून्याः । यदाह— ‘निरूढा लक्षणाः काश्चित्सामर्थ्यादभिधानवत् ।’ इति । ते तस्मिन् स्वविषयादन्यत्र प्रयुक्ता अपि न ध्वनेः पदं भवन्ति; न क्योंकि—दूसरी उक्ति से—। दूसरी उक्ति से अर्थात् ध्वनि से अतिरिक्त स्फुट शब्द और अर्थ के व्यापार-विशेष से । 'शब्द' को पाँचो अर्थों में लगाना चाहिए 'ध्वनि' इस उक्ति का विषय होता है—। अर्थात् 'ध्वनि' शब्द से कहा जाता है । उदाहृत—। 'वदति' इत्यादि में। इस प्रकार जहाँ प्रयोजन रहता हुआ भी आदरास्पद नहीं है वहाँ ध्वनन-व्यापार क्या ? यहाँ कहकर जहाँ मूलतः ही प्रयोजन नहीं है किन्तु उपचार है, वहाँ भी ध्वननव्यापार क्या ? यह कहते हैं—और भी—। 'लावण्य' आदि जो शब्द 'लवणरस से युक्तत्व' आदि अपने विषयरूप स्वार्थ से अन्यत्र हृद्यत्व अर्थ आदि में रूढ़ हैं, रूढ़ होने के कारण ही त्रितय ( अर्थात् मुख्यार्थबाध, मुख्यार्थयोग और प्रयोजन ) के सन्निधान की अपेक्षारूप व्यवधान से रहित हैं। क्योंकि कहा है— 'कुछ निरूढ लक्षणाएँ प्रयोग की सामर्थ्य से अभिधान के सदृश ही होती हैं ।' वे ( 'लावण्य' आदि प्रयुक्त शब्द ) अपने विषय से अन्यत्र प्रयुक्त होकर भी 'ध्वनि' के