भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

पृष्ठ 216, कुल 680 में से

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पृष्ठ 216

१५६ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः रूढा ये विषयेऽन्यत्र शब्दाः स्वविषयादपि । लावण्याद्याः प्रयुक्तास्ते न भवन्ति पदं ध्वनेः ॥ १६ ॥ तेषु चोपचरितशब्दवृत्तिरस्तीति । तथाविधे च विषये क्वचि- त्सम्भवन्नपि ध्वनिव्यवहारः प्रकारान्तरेण प्रवर्तते । न तथाविध- शब्दमुखेन । अपने विषय से भी अन्यत्र विषय में शब्द दूसरी उक्ति से अशक्य चारुत्व की व्यञ्जना का हेतु नहीं है । और भी, अपने विषय से भी अन्यत्र विषय में जो शब्द रूढ हो जाते हैं, जैसे कि 'लावण्य' आदि प्रयुक्त शब्द, वे ध्वनि के विषय नहीं होते ॥ १६ ॥ उनमें उपचरित शब्दवृत्ति है । उस प्रकार के विषय में कहीं पर सम्भव होता हुआ भी ध्वनि का व्यवहार प्रकारान्तर से होता है, उस प्रकार के शब्द के द्वारा नहीं । • लोचनम् तत्र ध्वनिव्यवहारः । उपचरिता शब्दस्य वृत्तिर्गौणी; लाक्षणिकी चेत्यर्थः । आदिग्रहणेनानुलोम्यं प्रातिकूल्यं सब्रह्मचारीत्येवमादयः शब्दा लाक्षणिका गृह्यन्ते । लोम्नामनुगतमनुलोमं मर्दनम् । कूलस्य प्रतिपक्षतया स्थितं स्रोतः प्रतिकूलम् । तुल्यगुरुः सब्रह्मचारी इति मुख्यो विषयः । अन्यः पुनरुपचरित एव । न चात्र प्रयोजनं किञ्चिदुद्दिश्य लक्षणा प्रवृत्तेति न तद्विषयो ध्वननव्यवहारः । ननु 'देवडिति लुणाहि पलुअम्मिगमज्ज्वलवगुज्वलं गुमरिफेल्लपरण्य' (?) इत्यादौ लावण्यादिशब्दसन्निधानेऽस्ति प्रतीयमानाभिव्यक्तिः, सत्यम्, सा तु न लावण्यशब्दात् । अपि तु समग्रवाक्यार्थप्रतीत्यनन्तरं ध्वननव्यापारादेव । अत्र हि प्रियतमामुखस्यैव समस्ताशाप्रकाशकत्वं ध्वन्यत इत्यलं बहुना । विषय नहीं होते हैं, 'ध्वनि' व्यवहार उनमें नहीं होता । उपचारिता शब्द-वृत्ति गौणी है अर्थात् लाक्षणिकी । 'आदि' ग्रहण से 'आनुलोम्य, प्रातिकूल्य, सब्रह्मचारी' इत्यादि प्रकार के लाक्षणिक शब्द गृहीत होते हैं । लोकों का अनुगत अनुलोम है अर्थात् मर्दन । कूल के प्रतिपक्ष होकर स्थित स्रोत प्रतिकूल होता है । तुल्यगुरु सब्रह्मचारी । इस प्रकार मुख्य विषय है । दूसरा फिर तो उपचरित ही है । यहाँ कोई प्रयोजन को उद्देश्य करके लक्षणा प्रवृत्त नहीं है, अतः तद्विषयक ध्वननव्यापार नहीं है । शङ्का करते हैं कि 'देवडिति' (?) इत्यादि में 'लावण्य' आदि शब्द के सन्निधान में प्रतीयमान की अभिव्यक्ति है ? ठीक है, परन्तु वह (अभिव्यक्ति) 'लावण्य' शब्द से नहीं है, अपितु समग्र वाक्यार्थ की प्रतीति के अनन्तर ध्वननव्यापार से ही है । यहाँ प्रियतमा के मुख का ही समस्त आशा का प्रकाशकत्व ध्वनित होता है, इस प्रकार