भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

पृष्ठ 217, कुल 680 में से

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पृष्ठ 217

प्रथम उद्योतः १५७ ध्वन्यालोकः अपि च— मुख्यां वृत्तिं परित्यज्य गुणवृत्त्याऽर्थदर्शनम् । यदुद्दिश्य फलं तत्र शब्दो नैव स्खलद्गतिः ॥ १७ ॥ और भी, जिस फल को उद्देश्य करके मुख्य वृत्ति को छोड़ कर गुणवृत्ति से अर्थ का ज्ञान कराया जाता है वहाँ ( उस फल के बोधन में ) शब्द स्खलद्गति अर्थात् वाधि- तार्थ नहीं है । लोचनम् तदाह—प्रकारान्तरेणेति । व्यञ्जकत्वेनैव । न तूपचरितलावण्यादिशब्दप्रयोगा- दित्यर्थः ॥ १६ ॥ एवं यत्र यत्र भक्तिस्तत्र तत्र ध्वनिरिति तावन्नास्ति । तेन यदि ध्वनेर्भक्ति- र्लक्षणं तदा भक्तिसन्निधौ सर्वत्र ध्वनिव्यवहारः स्यादित्यतिव्याप्तिः । अभ्युप- गम्यापि ब्रूमः—भवतु यत्र यत्र भक्तिस्तत्र तत्र ध्वनिः । तथापि यद्विषयो लक्षणाव्यापारो न तद्विषयो ध्वननव्यापारः । न च भिन्नविषययोर्धर्मधर्मिभावः, धर्म एव च लक्षणमित्युच्यते । तत्र लक्षणा तावदमुख्यार्थविषयो व्यापारः । ध्वननं च प्रयोजनविषयम् । न च तद्विषयोऽपि द्वितीयो लक्षणाव्यापारो युक्तः, लक्षणासामग्र्यभावादित्यभिप्रायेणाह—अपि चेत्यादि । मुख्यां वृत्तिमभिधा- व्यापारं परित्यज्य परिसमाप्य गुणवृत्त्या लक्षणारूपयार्थस्यामुख्यस्य दर्शनं प्रत्यायना, सा यत्फलं कर्मभूतं प्रयोजनरूपमुद्दिश्य क्रियते, तत्र प्रयोजने अधिक कहना व्यर्थ है । अतः कहते हैं—प्रकारान्तर से—। व्यञ्जनाव्यापार से ही । अर्थात् न कि उपचरित लावण्य आदि शब्द के प्रयोग से ( ध्वनित होता है ) । इस प्रकार जहाँ-जहाँ भक्ति है वहाँ-वहाँ ध्वनि है, ऐसा नहीं । इसलिए ध्वनि का यदि 'भक्ति' लक्षण है तब तो 'भक्ति' के समीप सर्वत्र 'ध्वनि' काव्यव्यवहार होना चाहिए ( पर नहीं होता ) अतः अतिव्याप्ति ( अलक्ष्य में लक्षण का संक्रमण ) है । अभ्युगम करके ( मान करके ) भी कहते हैं—जहाँ-जहाँ 'भक्ति' है वहाँ-वहाँ 'ध्वनि' हो, तथापि लक्षणाव्यापार जिस विषय का है उस विषय का ध्वननव्यापार नहीं है । भिन्न विषय वालों का धर्मधर्मिभाव नहीं होता । और धर्म ही 'लक्षण' भी कहा जाता है । लक्षणा अमुख्यार्थविषयक व्यापार है और ध्वनन प्रयोजनविषयक व्यापार । लक्षणाव्यापार को प्रयोजनविषयक मानना ठीक नहीं' क्योंकि लक्षणा की ( मुख्यार्थबाध आदि ) सामग्री का अभाव है, इस अभिप्राय से कहते हैं—और भी—। मुख्य वृत्ति अर्थात् अभिधा व्यापार को छोड़कर अर्थात् परिसमाप्त कर, लक्षणारूप गुणवृत्ति से अमुख्य अर्थ की प्रत्यायना ( बोधन ) है, वह जिस फल या कर्मभूत प्रयोजन को उद्देश्य करके की जाती