भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

पृष्ठ 218, कुल 680 में से

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पृष्ठ 218

१५८ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः तत्र हि चारुत्वातिशयविशिष्टार्थप्रकाशनलक्षणे प्रयोजने कर्तव्ये यदि शब्दस्यामुख्यता तदा तस्य प्रयोगे दुष्टतैव स्यात् । न चैवम्; तस्मात्- क्योंकि वहाँ चारुत्वातिशय से विशिष्ट अर्थ के प्रकाशन रूप प्रयोजन के कर्त्तव्य होने पर यदि शब्द की अमुख्यता ही रह गई तो उसके प्रयोग में दुष्टता ही होगी । परन्तु ऐसा नहीं है इस कारण- लोचनम् तावद् द्वितीयो व्यापारः । न चासौ लक्षणैव; यतः स्खलन्ती बाधकव्यापारेण विधुरीक्रियमाणा गतिरवबोधनशक्तिर्यस्य शब्दस्य तदीयो व्यापारो लक्षणा । न च प्रयोजनमवगमयतः शब्दस्य बाधकयोगः । तथाभावे तत्रापि निमित्ता- न्तरस्य प्रयोजनान्तरस्य चान्वेषणोनानवस्थानात् । तेनायं लक्षणलक्षणाया न विषय इति भावः । दर्शनमिति ण्यन्तो निर्देशः । कर्तव्य इति । अवगमयि- तव्य इत्यर्थः । अमुख्यतेति । बाधकेन विधुरीकृततेत्यर्थः । तस्येति शब्दस्य । दुष्टतैवेति । प्रयोजनावगमस्य सुखसम्पत्तये हि स शब्दः प्रयुज्यते तस्मिन्न- मुख्यार्थे । यदि च 'सिंहो वटुः' इति शौर्यातिशयेऽप्यवगमयितव्ये स्खलद्गतित्वं शब्दस्य तर्हि तत्प्रतीतिं नैव कुर्यादिति किमर्थं तस्य प्रयोगः । उपचारेण करि- ष्यतीति चेत्तत्रापि प्रयोजनान्तरमन्वेष्यं तत्राप्युपचार इत्यनवस्था । अथ न तत्र स्खलद्गतित्वं, तर्हि प्रयोजनेऽवगमयितव्ये न लक्षणाख्यो व्यापारः तत्सा- है, उस प्रयोजन में दूसरा व्यापार है। वह लक्षणा ही नहीं है, क्योंकि स्खलित होती हुई अर्थात् बाधक व्यापार से कुंठित हो रही गति अर्थात् अवबोधनशक्ति जिस शब्द की है, उसका व्यापार लक्षणा है। परन्तु जो शब्द प्रयोजन का बोध कर रहा है, उसका बाधक के साथ योग नहीं है। वैसा होने पर (अर्थात् यदि बाधक को स्वीकार करते हैं तो) वहाँ भी दूसरे निमित्त या दूसरे प्रयोजन का अन्वेषण किया जायगा, ऐसी स्थिति में अनवस्था होगी। तब (जब कि बाधकयोग नहीं है) यह लक्षणलक्षणा का विषय नहीं है, यह तात्पर्य है। 'दर्शन' यह ण्यन्त निर्देश है (अर्थात् दिखाना या बोधन करना)। कर्तव्य अर्थात् अवगमयितव्य। अमुख्यता-। अर्थात् बाधक से विधुर (कुंठित) हो जाना। उस शब्द के। दुष्टता ही-। सुखपूर्वक प्रयोजन का अवगम हो इसलिए वह शब्द अमुख्य अर्थ में प्रयुक्त होता है। और यदि 'सिंहो वटुः' यहाँ बोधनीय शौर्यातिशय में भी शब्द का स्खलद्गतित्व (बाधकयोग) है, तब तो (लक्षक शब्द) उस शौर्यातिशय की प्रतीति को नहीं उत्पन्न करेगा, ऐसी स्थिति में उसका प्रयोग ही क्योंकर होगा? यदि कहिए कि 'उपचार' से करेगा, तब तो वहाँ भी दूसरा प्रयोजन ढूँढ़ना चाहिए, फिर वहाँ भी उपचार होगा, इस प्रकार अनवस्था होगी। जब स्खलद्गतित्व (बाधकयोग) नहीं है, तब तो प्रयोजन के बोधन में 'लक्षणा' नाम का