ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथम उद्योतः १५९ ध्वन्यालोकः वाचकत्वाश्रयेणैव गुणवृत्तिर्व्यवस्थिता । व्यञ्जकत्वैकमूलस्य ध्वनेः स्याल्लक्षणं कथम् ॥ १८ ॥ तस्मादन्यो ध्वनिरन्या च गुणवृत्तिः । अव्याप्तिरप्यस्य लक्षणस्य । 'वाचकत्व (अर्थात् अभिधा व्यापार) के आश्रय से ही गुणवृत्ति (या लक्षणा) व्यवस्थित है, फिर व्यञ्जकत्व (व्यञ्जना व्यापार) जिसका एकमात्र मूल है, उस ध्वनि का वह लक्षण कैसे हो सकती है ? इस कारण ध्वनि भिन्न है और गुणवृत्ति भिन्न है। इस लक्षण की अव्याप्ति लोचनम् मग्र्यभावात् । न च नास्ति व्यापारः। न चासावभिधा, समयस्य तत्राभावात् । यद्व्यापारान्तरमभिधालक्षणातिरिक्तं स ध्वननव्यापारः। न चैवमिति । न च प्रयोगे दुष्टता काचित्, प्रयोजनस्याविघ्नेनैव प्रतीतेः। तेनाभिधैव मुख्येऽर्थे बाधकेन प्रविवित्सुर्निरुध्यमाना सती अचरितार्थत्वादन्यत्र प्रसरति । अत एव अमुख्योऽस्यायमर्थ इति व्यवहारः । तथैव चामुख्यतया संकेतग्रहणमपि तत्रा- स्तीत्यभिधापुच्छभूतैव लक्षणा ॥ १७ ॥ उपसंहरति—तस्मादिति । यतोऽभिधापुच्छभूतैव लक्षणा, ततो हेतोर्वाच- कत्वमभिधाव्यापारमाश्रिता तद्बाधनेनोत्थानात्तत्पुच्छभूतत्वाच्च गुणवृत्तिः गौणलाक्षणिकप्रकार इत्यर्थः । सा कथं ध्वनेर्व्यञ्जनात्मनो लक्षणं स्यात् ? भिन्नविषयत्वादिति । एतदुपसंहरति—तस्मादिति । यतोऽतिव्याप्तिरुक्ता तत्प्रसङ्गेन च भिन्नविषयत्वं तस्मादित्यर्थः । एवम् व्यापार नहीं है, क्योंकि उसकी सामग्री वहाँ नहीं है । ऐसा नहीं कह सकते कि (वहाँ) व्यापार ही नहीं । फिर वह व्यापार अभिधा नहीं, क्योंकि 'समय' (सङ्केत) का वहाँ अभाव है । जो अभिधा और लक्षणा से अतिरिक्त व्यापार है, वह ध्वनन व्यापार है। परन्तु ऐसा नहीं—। न कि प्रयोग में कोई दोष है, क्योंकि प्रयोजन की बिना किसी विघ्न के, प्रतीति हो जाती है । इसलिए अभिधा ही मुख्य अर्थ में बाधक के कारण बोध की इच्छा रखनेवालों द्वारा रोक दी गई होकर अचरितार्थ होने के कारण अन्यत्र (दूसरे अर्थ में) फैलती है । इसलिए 'यह इसका मुख्य अर्थ है' यह व्यवहार चलता है । उसी प्रकार अमुख्यरूप से संकेत ग्रहण भी वहाँ है, इस प्रकार लक्षणा अभिधा की पुच्छभूत ही है । उपसंहार करते हैं—इस कारण से—। जिस कारण लक्षणा अभिधा की पुच्छभूत ही है, उस कारण वाचकत्वरूप अभिधाव्यापार पर आश्रित, उसके (अभिधा को) पुच्छभूत होने के कारण गुणवृत्ति अर्थात् गौण-लाक्षणिक प्रकार है। वह (गुणवृत्ति) व्यञ्जनारूप 'ध्वनि' का लक्षण कैसे हो सकती है ? क्योंकि (उसका) विषय भिन्न है। इसका उपसंहार करते हैं—उस कारण—। अर्थात् जिस कारण अतिव्याप्ति कही गई