ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१६० सलोचन-ध्वन्यालोकः लोचनम् ‘अतिव्याप्तेरथाव्याप्तेर्न चासौ लक्ष्यते तया’ इति कारिकागतामतिव्याप्तिं व्याख्यायाव्याप्तिं व्याचष्टे—अव्याप्तिरप्यस्येति । अस्य गुणवृत्तिरूपस्येत्यर्थः । यत्र यत्र ध्वनिस्तत्र तत्र यदि भक्तिर्भवेन्न स्यादव्याप्तिः । न चैवम्; अविवक्षितवाच्येऽस्ति भक्तिः 'सुवर्णपुष्पाम्' इत्यादौ । 'शिखरिणि' इत्यादौ तु सा कथम् । ननु लक्षणा तावद्द्रौणमपि व्याप्नोति । केवलं शब्दस्तमर्थं लक्षयित्वा तेनैव सह सामानाधिकरण्यं भजते-'सिंहो बटुः' इति । अर्थो वाऽर्थान्तरं लक्षयित्वा स्ववाचकेन तद्वाचकं समानाधिकरणं करोति । शब्दार्थौ वा युगपत्तं लक्षयित्वा अन्याभ्यामेव शब्दार्थाभ्यां मिश्रीभवत इत्येवं लाक्षणिकाद् गौणस्य भेदः । यदाह—‘गौणे शब्दप्रयोगः, न लक्षणायाम्' इति, तत्रापि लक्षणास्त्येवेति सर्वत्र सैव व्यापिका । सा च पञ्चविधा । तद्यथा—अभिधेयेन संयोगात्; द्विरेफशब्दस्य हि योऽभिधेयो भ्रमरशब्दः द्वौ रेफौ यस्येति कृत्वा तेन भ्रमरशब्देन यस्य संयोगः सम्बन्धः षट्पदलक्षणस्यार्थस्य सोऽर्थो द्विरेफशब्देन लक्ष्यते, अभिधेयसम्बन्धं व्याख्या- तरूपं निमित्तीकृत्य । सामीप्यात् 'गङ्गायां घोषः' समवायादिति सम्बन्धा- और उसके प्रसंग से (गुणवृत्ति और ध्वनि का) भिन्न-विषयत्व है उस कारण । इस प्रकार 'अतिव्याप्ति' और अव्याप्ति के कारण वह ध्वनि उस (भक्ति) से लक्षित नहीं हो सकता (अर्थात् 'भक्ति' ध्वनि का लक्षण नहीं हो सकती)' इस 'कारिका' में आई हुई अतिव्याप्ति का व्याख्यान करके अव्याप्ति (लक्ष्य में लक्षण की अप्राप्ति) का व्याख्यान करते हैं—अव्याप्ति भी इसका—। इसका अर्थात् गुणवृत्तिरूप (लक्षण) का जहाँ-जहाँ 'ध्वनि' है वहाँ-वहाँ 'भक्ति' हो तो अव्याप्ति न हो। पर ऐसा नहीं है; अविवक्षितवाच्य में 'भक्ति' है; जैसे 'सुवर्णपुष्पाम्०' इत्यादि में। 'शिखरिणि०' इत्यादि में वह कैसे है ? शङ्का है कि लक्षणा गौण स्थल को भी व्याप्त करती है। केवल ('सिंह') आदि शब्द उस ('बटु' आदि) अर्थ को लक्षित करके उसी ('बटु' आदि शब्द) के साथ सामानाधिकरण्य को प्राप्त करता है। अथवा, ('सिंह' आदि) अर्थ ('बटु' आदि) अर्थान्तर को लक्षित करके अपने वाचक से उसके वाचक को समाना- धिकरण कर देता है। अथवा शब्द और अर्थ दोनों एक ही काल में उस 'बटु' आदि अर्थ को लक्षित करके दूसरे शब्द और अर्थ के साथ मिल जाते हैं। इस प्रकार लाक्षणिक से गौण का भेद है। जैसा कि कहते हैं—'गौण में शब्दप्रयोग होता है, लक्षणा में नहीं।' उस (गौण स्थल) में भी लक्षणा है ही, इस प्रकार वही सर्वत्र व्याप्त रहनेवाली है। वह पाँच प्रकार की है, वह जैसे कि, अभिधेय के साथ संयोग होने से; 'द्विरेफ' शब्द का जो अभिधेय 'भ्रमर' शब्द है ('दो रेफ हैं जिसके' इसके अनुसार) उस 'भ्रमर' शब्द के साथ जिसका संयोग अर्थात् सम्बन्ध (वाच्यवाचकभावरूप सम्बन्ध) 'षट्पद' रूप अर्थ का है, वह अर्थ व्याख्यात अभिधेय सम्बन्ध को निमित्त करके द्विरेफ' शब्द द्वारा लक्षित होता है। सामीप्य से; जैसे 'गङ्गा में घोष है'। समवाय