भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

पृष्ठ 221, कुल 680 में से

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पृष्ठ 221

प्रथम उद्योतः १६१ ध्वन्यालोकः न हि ध्वनिप्रभेदो विवक्षितान्यपरवाच्यलक्षणः। अन्ये च बहवः प्रकारा भक्त्या व्याप्यन्तः तस्माद्भक्तिरलक्षणम् ॥ १८ ॥ (अपने लक्ष्य में न संगत होना) भी है, क्योंकि विवक्षितान्यपरवाच्य रूप (अभि- धामूल) ध्वनि का प्रभेद और अन्य बहुत से (ध्वनि के) प्रकार भक्ति (लक्षणा) से व्याप्त नहीं हैं, अतः भक्ति ध्वनि का लक्षण नहीं है ॥ १८ ॥ लोचनम् दित्यर्थः, 'यष्टीः प्रवेशय' इति यथा। वैपरीत्यात् यथा-शत्रुमुद्दिश्य कश्चिद् ब्रवीति-'किमिवापकृतं न तेन मम' इति। क्रियायोगादिति कार्यकारणभावा- दित्यर्थः। यथा-अन्नापहारिणि व्यवहारः प्राणानयं हरति इति। एवमनया लक्षणया पञ्चविधया विश्वमेव व्याप्तम्। तथाहि-'शिखरिणि' इत्यत्राकस्मि- कप्रश्नविशेषादिबाधकानुप्रवेशे सादृश्याल्लक्षणास्त्येव। नन्वत्राङ्गीकृतैव मध्ये लक्षणा, कथं तर्ह्युक्तं विवक्षितान्यपरेति ? तद्भेदोऽत्र मुख्योऽसंलक्ष्यक्रमआत्मा विवक्षितः। तद्भेदशब्देन च रसभावतदाभासतत्प्रशमभेदास्तदवान्तरभेदाश्च, न च तेषु लक्षणाया उपपत्तिः। तथाहि-विभावानुभावप्रतिपादके काव्ये मुख्येऽर्थे तावद्बाधकानुप्रवेशोऽप्यसम्भाव्य इति को लक्षणावकाशः ? ननु किं बाधया, इयदेव लक्षणास्वरूपम्-'अभिधेयाविनाभूतप्रतीतिर्लक्ष- णोच्यते !' इति। इह चाभिधेयानां विभावानुभावादीनामविनाभूता रसादय इति लक्ष्यन्ते, विभावानुभावयोः कार्यकारणरूपत्वात्, व्यभिचारिणां च तत्सह- अर्थात् सम्बन्ध से, जैसे 'लाठियों को प्रवेश करो।' वैपरीत्य से, जैसे-शत्रु को उद्देश्य करके कोई कहता है 'क्या नहीं उसने मेरा उपकार किया है !' क्रियायोग से अर्थात् कार्यकारणभाव से; जैसे-अन्न को चुरानेवाले के प्रति यह व्यवहार करते हैं कि 'यह प्राणहरण करता है'। इस प्रकार इस पंचविध लक्षणा से सारा विश्व ही व्याप्त हो जाता है। जैसा कि 'शिखरिणि०' इस स्थल में आकस्मिक प्रश्न-विशेष आदि बाधक का योग करने पर (भी) सादृश्य से लक्षणा है ही। (इस पर पूछते हैं कि) अगर यहाँ मध्य में लक्षणा मान भी लिया तो यह कहिए कैसे फिर 'विवक्षितान्यपर' ऐसा कहा है (क्योंकि लक्षणा के होने पर वाच्य का विवक्षित होना सम्भव नहीं)। उस विवक्षि- तान्यपरवाच्य का मुख्य भेद असंलक्ष्यक्रमरूप विवक्षित है। 'तद्भेद' शब्द से रस, भाव, रसाभास, भावाभास, भावप्रशम आदि उसके अवान्तरभेद भी हैं, उनमें लक्षणा की उपपत्ति नहीं है। इस प्रकार-विभावानुभाव का प्रतिपादन करनेवाले काव्य में मुख्य अर्थ में बाधक का योग भी सम्भावनीय नहीं, ऐसी स्थिति में लक्षणा का अवसर ही क्या है ? शङ्का है कि बाधा की क्या जरूरत ? लक्षणा का इतना ही स्वरूप है-'अभिधेय के साथ अविनाभूत की (अर्थात् किसी भी सम्बन्ध से सम्बद्ध की) प्रतीति (या प्रतीति का हेतु) लक्षणा है।' और यहाँ रसादि विभाव-अनुभाव आदि अभिधेयों के अविनाभूत ११ ध्व०