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ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

१५८ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः तत्र हि चारुत्वातिशयविशिष्टार्थप्रकाशनलक्षणे प्रयोजने कर्तव्ये यदि शब्दस्यामुख्यता तदा तस्य प्रयोगे दुष्टतैव स्यात् । न चैवम्; तस्मात्- क्योंकि वहाँ चारुत्वातिशय से विशिष्ट अर्थ के प्रकाशन रूप प्रयोजन के कर्त्तव्य होने पर यदि शब्द की अमुख्यता ही रह गई तो उसके प्रयोग में दुष्टता ही होगी । परन्तु ऐसा नहीं है इस कारण- लोचनम् तावद् द्वितीयो व्यापारः । न चासौ लक्षणैव; यतः स्खलन्ती बाधकव्यापारेण विधुरीक्रियमाणा गतिरवबोधनशक्तिर्यस्य शब्दस्य तदीयो व्यापारो लक्षणा । न च प्रयोजनमवगमयतः शब्दस्य बाधकयोगः । तथाभावे तत्रापि निमित्ता- न्तरस्य प्रयोजनान्तरस्य चान्वेषणोनानवस्थानात् । तेनायं लक्षणलक्षणाया न विषय इति भावः । दर्शनमिति ण्यन्तो निर्देशः । कर्तव्य इति । अवगमयि- तव्य इत्यर्थः । अमुख्यतेति । बाधकेन विधुरीकृततेत्यर्थः । तस्येति शब्दस्य । दुष्टतैवेति । प्रयोजनावगमस्य सुखसम्पत्तये हि स शब्दः प्रयुज्यते तस्मिन्न- मुख्यार्थे । यदि च 'सिंहो वटुः' इति शौर्यातिशयेऽप्यवगमयितव्ये स्खलद्गतित्वं शब्दस्य तर्हि तत्प्रतीतिं नैव कुर्यादिति किमर्थं तस्य प्रयोगः । उपचारेण करि- ष्यतीति चेत्तत्रापि प्रयोजनान्तरमन्वेष्यं तत्राप्युपचार इत्यनवस्था । अथ न तत्र स्खलद्गतित्वं, तर्हि प्रयोजनेऽवगमयितव्ये न लक्षणाख्यो व्यापारः तत्सा- है, उस प्रयोजन में दूसरा व्यापार है। वह लक्षणा ही नहीं है, क्योंकि स्खलित होती हुई अर्थात् बाधक व्यापार से कुंठित हो रही गति अर्थात् अवबोधनशक्ति जिस शब्द की है, उसका व्यापार लक्षणा है। परन्तु जो शब्द प्रयोजन का बोध कर रहा है, उसका बाधक के साथ योग नहीं है। वैसा होने पर (अर्थात् यदि बाधक को स्वीकार करते हैं तो) वहाँ भी दूसरे निमित्त या दूसरे प्रयोजन का अन्वेषण किया जायगा, ऐसी स्थिति में अनवस्था होगी। तब (जब कि बाधकयोग नहीं है) यह लक्षणलक्षणा का विषय नहीं है, यह तात्पर्य है। 'दर्शन' यह ण्यन्त निर्देश है (अर्थात् दिखाना या बोधन करना)। कर्तव्य अर्थात् अवगमयितव्य। अमुख्यता-। अर्थात् बाधक से विधुर (कुंठित) हो जाना। उस शब्द के। दुष्टता ही-। सुखपूर्वक प्रयोजन का अवगम हो इसलिए वह शब्द अमुख्य अर्थ में प्रयुक्त होता है। और यदि 'सिंहो वटुः' यहाँ बोधनीय शौर्यातिशय में भी शब्द का स्खलद्गतित्व (बाधकयोग) है, तब तो (लक्षक शब्द) उस शौर्यातिशय की प्रतीति को नहीं उत्पन्न करेगा, ऐसी स्थिति में उसका प्रयोग ही क्योंकर होगा? यदि कहिए कि 'उपचार' से करेगा, तब तो वहाँ भी दूसरा प्रयोजन ढूँढ़ना चाहिए, फिर वहाँ भी उपचार होगा, इस प्रकार अनवस्था होगी। जब स्खलद्गतित्व (बाधकयोग) नहीं है, तब तो प्रयोजन के बोधन में 'लक्षणा' नाम का

प्रथम उद्योतः १५९ ध्वन्यालोकः वाचकत्वाश्रयेणैव गुणवृत्तिर्व्यवस्थिता । व्यञ्जकत्वैकमूलस्य ध्वनेः स्याल्लक्षणं कथम् ॥ १८ ॥ तस्मादन्यो ध्वनिरन्या च गुणवृत्तिः । अव्याप्तिरप्यस्य लक्षणस्य । 'वाचकत्व (अर्थात् अभिधा व्यापार) के आश्रय से ही गुणवृत्ति (या लक्षणा) व्यवस्थित है, फिर व्यञ्जकत्व (व्यञ्जना व्यापार) जिसका एकमात्र मूल है, उस ध्वनि का वह लक्षण कैसे हो सकती है ? इस कारण ध्वनि भिन्न है और गुणवृत्ति भिन्न है। इस लक्षण की अव्याप्ति लोचनम् मग्र्यभावात् । न च नास्ति व्यापारः। न चासावभिधा, समयस्य तत्राभावात् । यद्व्यापारान्तरमभिधालक्षणातिरिक्तं स ध्वननव्यापारः। न चैवमिति । न च प्रयोगे दुष्टता काचित्, प्रयोजनस्याविघ्नेनैव प्रतीतेः। तेनाभिधैव मुख्येऽर्थे बाधकेन प्रविवित्सुर्निरुध्यमाना सती अचरितार्थत्वादन्यत्र प्रसरति । अत एव अमुख्योऽस्यायमर्थ इति व्यवहारः । तथैव चामुख्यतया संकेतग्रहणमपि तत्रा- स्तीत्यभिधापुच्छभूतैव लक्षणा ॥ १७ ॥ उपसंहरति—तस्मादिति । यतोऽभिधापुच्छभूतैव लक्षणा, ततो हेतोर्वाच- कत्वमभिधाव्यापारमाश्रिता तद्बाधनेनोत्थानात्तत्पुच्छभूतत्वाच्च गुणवृत्तिः गौणलाक्षणिकप्रकार इत्यर्थः । सा कथं ध्वनेर्व्यञ्जनात्मनो लक्षणं स्यात् ? भिन्नविषयत्वादिति । एतदुपसंहरति—तस्मादिति । यतोऽतिव्याप्तिरुक्ता तत्प्रसङ्गेन च भिन्नविषयत्वं तस्मादित्यर्थः । एवम् व्यापार नहीं है, क्योंकि उसकी सामग्री वहाँ नहीं है । ऐसा नहीं कह सकते कि (वहाँ) व्यापार ही नहीं । फिर वह व्यापार अभिधा नहीं, क्योंकि 'समय' (सङ्केत) का वहाँ अभाव है । जो अभिधा और लक्षणा से अतिरिक्त व्यापार है, वह ध्वनन व्यापार है। परन्तु ऐसा नहीं—। न कि प्रयोग में कोई दोष है, क्योंकि प्रयोजन की बिना किसी विघ्न के, प्रतीति हो जाती है । इसलिए अभिधा ही मुख्य अर्थ में बाधक के कारण बोध की इच्छा रखनेवालों द्वारा रोक दी गई होकर अचरितार्थ होने के कारण अन्यत्र (दूसरे अर्थ में) फैलती है । इसलिए 'यह इसका मुख्य अर्थ है' यह व्यवहार चलता है । उसी प्रकार अमुख्यरूप से संकेत ग्रहण भी वहाँ है, इस प्रकार लक्षणा अभिधा की पुच्छभूत ही है । उपसंहार करते हैं—इस कारण से—। जिस कारण लक्षणा अभिधा की पुच्छभूत ही है, उस कारण वाचकत्वरूप अभिधाव्यापार पर आश्रित, उसके (अभिधा को) पुच्छभूत होने के कारण गुणवृत्ति अर्थात् गौण-लाक्षणिक प्रकार है। वह (गुणवृत्ति) व्यञ्जनारूप 'ध्वनि' का लक्षण कैसे हो सकती है ? क्योंकि (उसका) विषय भिन्न है। इसका उपसंहार करते हैं—उस कारण—। अर्थात् जिस कारण अतिव्याप्ति कही गई

१६० सलोचन-ध्वन्यालोकः लोचनम् ‘अतिव्याप्तेरथाव्याप्तेर्न चासौ लक्ष्यते तया’ इति कारिकागतामतिव्याप्तिं व्याख्यायाव्याप्तिं व्याचष्टे—अव्याप्तिरप्यस्येति । अस्य गुणवृत्तिरूपस्येत्यर्थः । यत्र यत्र ध्वनिस्तत्र तत्र यदि भक्तिर्भवेन्न स्यादव्याप्तिः । न चैवम्; अविवक्षितवाच्येऽस्ति भक्तिः 'सुवर्णपुष्पाम्' इत्यादौ । 'शिखरिणि' इत्यादौ तु सा कथम् । ननु लक्षणा तावद्द्रौणमपि व्याप्नोति । केवलं शब्दस्तमर्थं लक्षयित्वा तेनैव सह सामानाधिकरण्यं भजते-'सिंहो बटुः' इति । अर्थो वाऽर्थान्तरं लक्षयित्वा स्ववाचकेन तद्वाचकं समानाधिकरणं करोति । शब्दार्थौ वा युगपत्तं लक्षयित्वा अन्याभ्यामेव शब्दार्थाभ्यां मिश्रीभवत इत्येवं लाक्षणिकाद् गौणस्य भेदः । यदाह—‘गौणे शब्दप्रयोगः, न लक्षणायाम्' इति, तत्रापि लक्षणास्त्येवेति सर्वत्र सैव व्यापिका । सा च पञ्चविधा । तद्यथा—अभिधेयेन संयोगात्; द्विरेफशब्दस्य हि योऽभिधेयो भ्रमरशब्दः द्वौ रेफौ यस्येति कृत्वा तेन भ्रमरशब्देन यस्य संयोगः सम्बन्धः षट्पदलक्षणस्यार्थस्य सोऽर्थो द्विरेफशब्देन लक्ष्यते, अभिधेयसम्बन्धं व्याख्या- तरूपं निमित्तीकृत्य । सामीप्यात् 'गङ्गायां घोषः' समवायादिति सम्बन्धा- और उसके प्रसंग से (गुणवृत्ति और ध्वनि का) भिन्न-विषयत्व है उस कारण । इस प्रकार 'अतिव्याप्ति' और अव्याप्ति के कारण वह ध्वनि उस (भक्ति) से लक्षित नहीं हो सकता (अर्थात् 'भक्ति' ध्वनि का लक्षण नहीं हो सकती)' इस 'कारिका' में आई हुई अतिव्याप्ति का व्याख्यान करके अव्याप्ति (लक्ष्य में लक्षण की अप्राप्ति) का व्याख्यान करते हैं—अव्याप्ति भी इसका—। इसका अर्थात् गुणवृत्तिरूप (लक्षण) का जहाँ-जहाँ 'ध्वनि' है वहाँ-वहाँ 'भक्ति' हो तो अव्याप्ति न हो। पर ऐसा नहीं है; अविवक्षितवाच्य में 'भक्ति' है; जैसे 'सुवर्णपुष्पाम्०' इत्यादि में। 'शिखरिणि०' इत्यादि में वह कैसे है ? शङ्का है कि लक्षणा गौण स्थल को भी व्याप्त करती है। केवल ('सिंह') आदि शब्द उस ('बटु' आदि) अर्थ को लक्षित करके उसी ('बटु' आदि शब्द) के साथ सामानाधिकरण्य को प्राप्त करता है। अथवा, ('सिंह' आदि) अर्थ ('बटु' आदि) अर्थान्तर को लक्षित करके अपने वाचक से उसके वाचक को समाना- धिकरण कर देता है। अथवा शब्द और अर्थ दोनों एक ही काल में उस 'बटु' आदि अर्थ को लक्षित करके दूसरे शब्द और अर्थ के साथ मिल जाते हैं। इस प्रकार लाक्षणिक से गौण का भेद है। जैसा कि कहते हैं—'गौण में शब्दप्रयोग होता है, लक्षणा में नहीं।' उस (गौण स्थल) में भी लक्षणा है ही, इस प्रकार वही सर्वत्र व्याप्त रहनेवाली है। वह पाँच प्रकार की है, वह जैसे कि, अभिधेय के साथ संयोग होने से; 'द्विरेफ' शब्द का जो अभिधेय 'भ्रमर' शब्द है ('दो रेफ हैं जिसके' इसके अनुसार) उस 'भ्रमर' शब्द के साथ जिसका संयोग अर्थात् सम्बन्ध (वाच्यवाचकभावरूप सम्बन्ध) 'षट्पद' रूप अर्थ का है, वह अर्थ व्याख्यात अभिधेय सम्बन्ध को निमित्त करके द्विरेफ' शब्द द्वारा लक्षित होता है। सामीप्य से; जैसे 'गङ्गा में घोष है'। समवाय

प्रथम उद्योतः १६१ ध्वन्यालोकः न हि ध्वनिप्रभेदो विवक्षितान्यपरवाच्यलक्षणः। अन्ये च बहवः प्रकारा भक्त्या व्याप्यन्तः तस्माद्भक्तिरलक्षणम् ॥ १८ ॥ (अपने लक्ष्य में न संगत होना) भी है, क्योंकि विवक्षितान्यपरवाच्य रूप (अभि- धामूल) ध्वनि का प्रभेद और अन्य बहुत से (ध्वनि के) प्रकार भक्ति (लक्षणा) से व्याप्त नहीं हैं, अतः भक्ति ध्वनि का लक्षण नहीं है ॥ १८ ॥ लोचनम् दित्यर्थः, 'यष्टीः प्रवेशय' इति यथा। वैपरीत्यात् यथा-शत्रुमुद्दिश्य कश्चिद् ब्रवीति-'किमिवापकृतं न तेन मम' इति। क्रियायोगादिति कार्यकारणभावा- दित्यर्थः। यथा-अन्नापहारिणि व्यवहारः प्राणानयं हरति इति। एवमनया लक्षणया पञ्चविधया विश्वमेव व्याप्तम्। तथाहि-'शिखरिणि' इत्यत्राकस्मि- कप्रश्नविशेषादिबाधकानुप्रवेशे सादृश्याल्लक्षणास्त्येव। नन्वत्राङ्गीकृतैव मध्ये लक्षणा, कथं तर्ह्युक्तं विवक्षितान्यपरेति ? तद्भेदोऽत्र मुख्योऽसंलक्ष्यक्रमआत्मा विवक्षितः। तद्भेदशब्देन च रसभावतदाभासतत्प्रशमभेदास्तदवान्तरभेदाश्च, न च तेषु लक्षणाया उपपत्तिः। तथाहि-विभावानुभावप्रतिपादके काव्ये मुख्येऽर्थे तावद्बाधकानुप्रवेशोऽप्यसम्भाव्य इति को लक्षणावकाशः ? ननु किं बाधया, इयदेव लक्षणास्वरूपम्-'अभिधेयाविनाभूतप्रतीतिर्लक्ष- णोच्यते !' इति। इह चाभिधेयानां विभावानुभावादीनामविनाभूता रसादय इति लक्ष्यन्ते, विभावानुभावयोः कार्यकारणरूपत्वात्, व्यभिचारिणां च तत्सह- अर्थात् सम्बन्ध से, जैसे 'लाठियों को प्रवेश करो।' वैपरीत्य से, जैसे-शत्रु को उद्देश्य करके कोई कहता है 'क्या नहीं उसने मेरा उपकार किया है !' क्रियायोग से अर्थात् कार्यकारणभाव से; जैसे-अन्न को चुरानेवाले के प्रति यह व्यवहार करते हैं कि 'यह प्राणहरण करता है'। इस प्रकार इस पंचविध लक्षणा से सारा विश्व ही व्याप्त हो जाता है। जैसा कि 'शिखरिणि०' इस स्थल में आकस्मिक प्रश्न-विशेष आदि बाधक का योग करने पर (भी) सादृश्य से लक्षणा है ही। (इस पर पूछते हैं कि) अगर यहाँ मध्य में लक्षणा मान भी लिया तो यह कहिए कैसे फिर 'विवक्षितान्यपर' ऐसा कहा है (क्योंकि लक्षणा के होने पर वाच्य का विवक्षित होना सम्भव नहीं)। उस विवक्षि- तान्यपरवाच्य का मुख्य भेद असंलक्ष्यक्रमरूप विवक्षित है। 'तद्भेद' शब्द से रस, भाव, रसाभास, भावाभास, भावप्रशम आदि उसके अवान्तरभेद भी हैं, उनमें लक्षणा की उपपत्ति नहीं है। इस प्रकार-विभावानुभाव का प्रतिपादन करनेवाले काव्य में मुख्य अर्थ में बाधक का योग भी सम्भावनीय नहीं, ऐसी स्थिति में लक्षणा का अवसर ही क्या है ? शङ्का है कि बाधा की क्या जरूरत ? लक्षणा का इतना ही स्वरूप है-'अभिधेय के साथ अविनाभूत की (अर्थात् किसी भी सम्बन्ध से सम्बद्ध की) प्रतीति (या प्रतीति का हेतु) लक्षणा है।' और यहाँ रसादि विभाव-अनुभाव आदि अभिधेयों के अविनाभूत ११ ध्व०

१६२ सलोचन-ध्वन्यालोकः लोचनम् कारित्वादिति चेत्—मैवम् ; धूमशब्दाद् धूमे प्रतिपन्ने ह्यग्निस्मृतिरपि लक्षणा- कृतैव स्यात्, ततोऽग्नेः शीतापनोदस्मृतिरित्यादिरपर्यवसितः शब्दार्थः स्यात् । धूमशब्दस्य स्वार्थविश्रान्तत्वान्न तावति व्यापार इति चेत्, आयातं तर्हि मुख्यार्थबाधो लक्षणाया जीवितमिति, सति तस्मिन्स्वार्थविश्रान्त्यभावात् । न च विभावादिप्रतिपादने बाधकं किञ्चिदस्ति । नन्वेवं धूमावगमनानन्तराग्निस्र्मरणवद्विभावादिप्रतिपत्त्यनन्तरं रत्यादिचित्त- वृत्तिप्रतिपत्तिरिति शब्दव्यापार एवात्र नास्ति । इदं तावदयं प्रतीतिस्वरूपज्ञो मीमांसकः प्रष्टव्यः—किमत्र परचित्तवृत्तिमात्रे प्रतिपत्तिरेव रसप्रतिपत्तिरभि- मता भवतः ? न चैवं भ्रमितव्यम्; एवं हि लोकगतचित्तवृत्त्यनुमानमात्रमिति का रसता ? यस्त्वलौकिकचमत्कारात्मा रसास्वादः काव्यगतविभावादिचर्वणा- प्राणो नासौ स्मरणानुमानादिसाम्येन खिलीकारपात्रीकर्तव्यः । किं तु लौकि- केन कार्यकारणानुमानादिना संस्कृतहृदयो विभावादिकं प्रतिपद्यमान एव न तटस्थ्येन प्रतिपद्यते, अपि तु हृदयसंवादापरपर्यायसहृदयत्वपरवशीकृततया हैं अतः लक्षित होते हैं, क्योंकि रसादि के विभाव और अनुभाव क्रमशः कारण एवं कार्य हैं, और व्यभिचारी भाव उस रसादि के सहकारी हैं। (इस पूर्वपक्ष का समाधान करते हैं—) इस प्रकार नहीं, क्योंकि ऐसी स्थिति में 'धूम' शब्द से धूम के ज्ञात होने पर अग्नि की स्मृति भी लक्षणाकृत होने लगेगी, तब अग्नि के द्वारा शीतापनोद की स्मृति होने लगेगी, इस प्रकार ('धूम') शब्द का अर्थ पर्यवसित (विश्रान्त) नहीं होगा। यदि कहिए कि 'धूम' शब्द के अपने अर्थ (धूमत्व या धूमविशिष्ट अर्थ) में विश्रान्त होने के कारण अग्नि आदि के अर्थ में व्यापार नहीं है, तब तो मुख्यार्थबाध लक्षणा का जीवित है, यह बात आ गई, उस (मुख्यार्थबाध) के रहते अपने अर्थ में विश्रान्ति नहीं हो सकती। और विभाव आदि के प्रतिपादन में कोई बाधक नहीं है। शङ्का है कि जिस प्रकार धूम के ज्ञान के पश्चात् अग्नि का स्मरण होता है उसी प्रकार विभाव आदि की प्रतीति के पश्चात् रत्यादि चित्तवृत्ति की प्रतीति होती है, इस प्रकार यहाँ शब्द का व्यापार ही नहीं है। (इस शंका पर) प्रतीति के इस स्वरूप को जानने वाले मीमांसक (विचारक) से यह पूछना चाहिये—क्या यहाँ आपको दूसरे की चित्तवृत्ति मात्र (के सम्बन्ध) में जो प्रतीति होती है वही इसकी प्रतीति के रूप में आपको अभिमत है? परन्तु इस प्रकार आपको भ्रम में नहीं पड़ना चाहिये, क्योंकि ऐसी स्थिति में लोकगत चित्तवृत्ति का (यह) अनुमानमात्र है, रसता कैसी ? जो कि अलौकिक चमत्कार रूप रसास्वाद, जिसका प्राण विभाव आदि की चर्वणा है, वह स्मरणजनित अनुमान के समान खिलीकार (असम्मान) का पात्र करना नहीं चाहिये। किन्तु लौकिक कार्य और कारण के अनुमान आदि से संस्कृत हृदय वाला व्यक्ति विभावादि को (काव्य या नाट्य से) अवगत करता हुआ तटस्थभाव से (अर्थात् ये दूसरे के हैं मेरे नहीं, इस भाव से) अवगम नहीं करता। अपितु हृदय-संवाद नामक

प्रथम उद्योतः १६३ लोचनम् पूर्णीभविष्यद्रसास्वादाङ्कुरीभावेनानुमानस्मरणादिसरणिमनारूढैव तन्मयीभ- वनोचितचर्वणाप्राणतया । न चासौ चर्वणा प्रमाणान्तरतो जाता पूर्वं, येने- दानीं स्मृतिः स्यात् । न चाधुना कुतश्चित्प्रमाणान्तरादुत्पन्ना, अलौकिके प्रत्यक्षाद्यव्यापारात् । अत एवालौकिक एव विभावादिव्यवहारः । यदाह— ‘विभावो विज्ञानार्थः लोके कारणमेवाभिधीयते न विभावः । अनुभावोऽप्य- लौकिक एव । ‘यदयमनुभावयति वागङ्गसत्त्वकृतोऽभिनयस्तस्मादनुभाव’ इति । तच्चित्तवृत्तितन्मयीभवनमेव ह्यनुभवनम् । लोके तु कार्यमेवोच्यते नानुभावः । अत एव परकीया न चित्तवृत्तिर्गम्यत इत्यभिप्रायेण ‘विभावानु- भावव्यभिचारिसंयोगाद्रसनिष्पत्तिः’ इति सूत्रे स्थायिग्रहणं न कृतम् । तत्प्र- त्युत शल्यभूतं स्यात् । स्थायिनस्तु रसीभाव औचित्यादुच्यते, तद्विभावानु- भावोचितचित्तवृत्तिसंस्कारसुन्दरचर्वणोदयात् । हृदयसंवादोपयोगिलोकचित्त- वृत्तिपरिज्ञानावस्थायामुद्यानपुलकादिभिः स्थायीभूतरत्याद्यवगमाच्च । व्यभि- चारी तु चित्तवृत्त्यात्मत्वेऽपि मुख्यचित्तवृत्तिपरवश एव चर्व्यत इति विभावा- नुभावमध्ये गणितः । अत एव रस्यमानताया एषैव निष्पत्तिः, यत्प्रबन्धप्रवृत्त- सहृदयत्व के परवश होने के कारण पूर्णता को प्राप्त करने वाले रसास्वाद के अंकुरी- भाव से, अनुमान और स्मरण आदि की सरणि पर आरूढ़ हुये बिना ही, तन्मय होने के उचित चर्वणा के उपयोग से (विभावादि को अवगत करता है)। पहले वह ‘चर्वणा’ प्रमाणान्तर से उत्पन्न नहीं हो चुकी होती है, जिससे इस समय उसे ‘स्मृति’ कहते, और न कि इस समय प्रमाणान्तर से उत्पन्न हो रही है, क्योंकि अलौकिक वस्तु में प्रत्यक्ष आदि प्रमाणों का व्यवहार नहीं होता। जैसा कि कहा है—विभाव विशेष ज्ञान की वस्तु है—वह लोक में ‘कारण’ ही कहा जाता है, विभाव नहीं । अनुभाव भी अलौकिक ही होता है। जो कि यह वाणी, अङ्ग और सत्त्व से किया हुआ अभिनय अनुभवन कराता है, उस कारण अनुभाव है।’ उन चित्तवृत्तियों से तन्मय हो जाना ही अनुभवन है। उसे लोक में कार्य ही कहते हैं, न कि अनुभाव। इसीलिये परकीय चित्तवृत्ति को (सामाजिक लोग) नहीं अनुभव करते, इस अभिप्राय से ‘विभाव’ अनुभाव और व्यभिचारी के संयोग से रस की निष्पत्ति होती है’ इस सूत्र में स्थायी का ग्रहण नहीं किया। उसका ग्रहण प्रत्युत शल्यभूत (विरुद्ध) हो जाता । स्थायी भाव का रसीभाव (रस के रूप में परिणत होना) औचित्य के कारण कहा जाता है, क्योंकि वह (औचित्य) विभाव, अनुभाव और उचित चित्तवृत्ति के संस्कार से सुन्दर चर्वणा के उदय से होता है। और हृदय-संवाद की उपयोगिनी लोक-चित्तवृत्ति के परिज्ञान की अवस्था में उद्यान और पुलक आदि द्वारा स्थायीभूत रति आदि के अवगम से (औचित्य) होता है। चित्तवृत्ति रूप होने पर भी व्यभिचारी मुख्य चित्तवृत्ति के परवश ही होकर चर्वित होता है, अतः उसकी गणना विभाव-अनुभाव के बीच ही की गई है। अतएव रस्यमानता की यही निष्पत्ति है कि जो समय से प्रवृत्त बन्धु-समागम आदि कारण से

लोचनम् बन्धुसमागमादिकारणोदितहर्षादिलौकिकचित्तवृत्तिन्यग्भावेन चर्वणारूप- त्वम्। अतश्चर्वणात्राभिव्यञ्जनमेव, न तु ज्ञापनम्, प्रमाणव्यापारवत्। नाप्यु- त्पादनम्, हेतुव्यापारवत्। ननु यदि नेयं ज्ञप्तिर्न वा निष्पत्तिः, तर्हि किमेतत् ? न न्वयमसावलौकिको रसः। ननु विभावादिरत्र किं ज्ञापको हेतुः, उत कारकः ? न ज्ञापको न कारकः, अपि तु चर्वणोपयोगी। ननु क्वैतद् दृष्टमन्यत्र। यत एव न दृष्टं तत एवालौकि- कमित्युक्तम्। नन्वेवं रसोऽप्रमाणं स्यात्; अस्तु, किं ततः ? तच्चर्वणात एव प्रीतिव्युत्पत्तिसिद्धेः किमन्यदर्थनीयम्। नन्वप्रमाणकमेतत्; न, स्वसंवेदन- सिद्धत्वात्। ज्ञानविशेषस्यैव चर्वणात्मकत्वात् इत्यलं बहुना। अतश्च रसोऽयम- लौकिकः। येन ललितपरुषानुप्रासस्यार्थाभिधानानुपयोगिनोऽपि रसं प्रति व्यञ्जकत्वम्; का तत्र लक्षणायाः शङ्कापि ? काव्यात्मकशब्दनिष्पीडनेनैव तच्चर्वणा दृश्यते। दृश्यते हि तदेव काव्यं पुनः पुनः पठंश्चर्व्यमाणश्च सहृदयो लोकः, न तु काव्यस्य; तत्र ‘उपादायापि ये हेया' इति न्यायेन कृतप्रतीतिक- स्यानुपयोग एवेति शब्दस्यापीह ध्वननव्यापारः। अत एवालक्ष्यक्रमता। उत्पन्न हर्ष आदि लौकिक चित्तवृत्ति के न्यग्भाव से चर्वणा की स्थिति है। इसलिये चर्वणा यहाँ अभिव्यंजन ही है न कि ज्ञापन, (इन्द्रिय आदि) प्रमाणों के व्यापार की भाँति, और (चर्वणा) उत्पादन रूप (व्यापार) भी नहीं है, (दण्ड, चक्र आदि) हेतु के व्यापार की भांति। शङ्का है कि यदि यह (रसचर्वणा) न ज्ञप्ति है और न तो निष्पत्ति है, तो फिर है क्या ? (उत्तर में कहते हैं कि) रस तो अलौकिक है। तब जब प्रश्न उठता है कि विभावादि यहाँ ज्ञापक हेतु है अथवा कारक हेतु ? (इसका उत्तर यह है कि) वह न तो ज्ञापक हेतु है और न तो कारक, बल्कि वह चर्वणा का उपयोगी है। (तब प्रश्न है कि) यह कहाँ देखा है ? (इसका उत्तर यह है कि) जिस कारण नहीं देखा उसी कारण ‘अलौकिक' कहा। तब तो इस प्रकार रस अप्रमाण होगा ! (उत्तर है कि) हो, उससे क्या ? जब उसकी चर्वणा से ही प्रीति और व्युत्पत्ति सिद्ध हो जाती हैं तो और क्या चाहिये ? (शङ्का है कि) इस कथन का कोई प्रमाण नहीं, (समाधान है) कि नहीं, यह बात अपने संवेदन से सिद्ध है, क्योंकि चर्वणा ज्ञानविशेष रूप ही है। अब बहुत कहना व्यर्थ है। इसलिये यह रस अलौकिक है। जिस कारण अर्थ के अभिधान के उपयोगी न होने वाले ललित एवं परुष अनुप्रास का भी रस के प्रति व्यंजकत्व है फिर लक्षणा की शंका भी कैसे सम्भव है। काव्यात्मक शब्द के निष्पीडन से ही रस की चर्वणा देखी जाती है। क्योंकि सहृदय को बार-बार काव्य पढ़ते हुये और चर्वणा करते हुये देखते हैं, न कि काव्य रूप शब्द का (चर्वण करते हुये देखते हैं); इस प्रकार वहाँ ‘उपादान करके भी जो त्याज्य हैं' इस न्याय के अनुसार जिसकी प्रतीति कर ली गई उसका उपयोग ही नहीं, इसलिये शब्द का भी ‘ध्वनन' व्यापार

प्रथम उद्योतः १६५ लोचनम् यत्तु वाक्यभेदः स्यादिति केनचिदुक्तम्, तदनभिज्ञतया। शास्त्रं हि सकृदुच्चा- रितं समयबलेनार्थं प्रतिपादयद्युगपद्विरुद्धानेकसमयस्मृत्ययोगात्कथमर्थद्वयं प्रत्याययेत्। अविरुद्धत्वे वा तावानेको वाक्यार्थः स्यात्। क्रमेणापि विरम्य- व्यापारायोगः। पुनरुच्चारितेऽपि वाक्ये स एव, समयप्रकरणादेस्तादवस्थ्यात्। प्रकरणसमयप्राप्यार्थतिरस्कारेणार्थान्तरप्रत्यायकत्वे नियमाभाव इति तेन 'अग्निहोत्रं जुहुयात्स्वर्गकामः' इति श्रुतौ 'खादेच्छ्वमांसमित्येष नार्थ इत्यत्र का प्रमे'ति प्रसज्यते। तत्रापि न काचिदियत्तेत्यनाश्वासता इत्येवं वाक्यभेदो दूषणम्। इह तु विभावाद्येव प्रतिपाद्यमानं चर्वणाविषयतोन्मुखमिति समया- द्युपयोगाभावः। न च नियुक्तोऽहमत्र करवाणि, कृतार्थोऽहमिति शास्त्रीयप्रती- तिसदृशमदः। तत्रोत्तरकर्तव्योन्मुख्येन लौकिकत्वात्। इह तु विभावादिचर्व- णाद्भूतपुष्पवत्तत्कालसारैवोदिता न तु पूर्वापरकालानुबन्धिनीति लौकिकादा- स्वादाद्योगिविषयाच्चान्य एवायं रसास्वादः। अत एव 'शिखरिणि' इत्यादावपि मुख्यार्थबाधादिक्रममनपेक्ष्यैव सहृदया वक्त्रभिप्रायं चाटुप्रीत्यात्मकं संवेदयन्ते। है। अतएव उसकी अलक्ष्यक्रमता है। जो कि वाक्यभेद होगा (अर्थात् एक ही काव्य- वाक्य के वाच्य और व्यंग्य दोनों अर्थों के बोधक होने के कारण वाक्यभेद होगा) यह किसी ने कहा है, वह अनभिज्ञता के कारण है, क्योंकि शास्त्र एक बार उच्चरित होकर समय (संकेत) के बल से अर्थ का प्रतिपादन करता हुआ एक ही काल में विरुद्ध अनेक संकेतों की स्मृति के न होने के कारण कैसे दो अर्थों का प्रत्यायन करेगा ! अविरुद्ध होने पर उतना एक ही वाक्यार्थ होगा। क्रम से भी, एक व्यापार के विरत हो जाने के पश्चात् व्यापार नहीं होता। यदि पुनः वाक्य का उच्चारण कीजिएगा तब भी वही समय (संकेत) और प्रकरण आदि उसी प्रकार बने रहेंगे। प्रकरण और समय (संकेत) से प्राप्त होनेवाले अर्थ को तिरस्कार करके दूसरे अर्थ के प्रत्यायक (बोधक) होने में कोई नियम नहीं है। इस कारण 'अग्निहोत्रं जुहुयात् स्वर्गकामः' इस वेदवाक्य में 'श्वमांस का भक्षण करे' यह अर्थ नहीं है, यहाँ कौन प्रमा है यह बात प्रसक्त होगी। वहाँ दूसरे अर्थ में भी कोई इयत्ता नहीं है, इस प्रकार (अनिश्चितार्थक होने के कारण वाक्य में बोधकता नहीं, इस प्रकार) वाक्यभेद दोष ठहरता है। यहाँ (काव्य में) विभावादि ही प्रतिपाद्यमान होकर चर्वणा के विषय होने के लिए उन्मुख हैं, ऐसी स्थिति में संकेत आदि का कोई उपयोग नहीं। 'मैं इसमें नियुक्त हूँ', 'मैं कर रहा हूँ', 'मैं कर चुका' इस प्रकार की शास्त्रीय प्रतीति के समान काव्यजन्य प्रतीति नहीं है, क्योंकि शास्त्रीय प्रतीति में उत्तरकाल में जो कर्त्तव्य है उसके प्रति उन्मुखता होने के कारण लौकिकता है। परन्तु यहाँ (काव्य में) ऐन्द्रजालिक पुष्प की भाँति विभावादि चर्वणा उसी समय ही पूर्णरूप से उदित होती है, न कि पूर्वापरकाल की अनुबन्धिनी है, इस प्रकार यह रसास्वाद लौकिक आस्वाद से और योगी के विषय से दूसरा ही है। इसीलिए 'शिखरिणि०' इत्यादि पद्य में भी मुख्यार्थ के बाध आदि की

१६६ सलोचन-ध्वन्यालोकः लोचनम् अत एव ग्रन्थकारः सामान्येन विवक्षितान्यपरवाच्ये ध्वनौ भक्तेरभावमभ्य- धात्। अस्माभिस्तु दुर्दुरूढं प्रत्याययितुमुक्तम्-भवत्वत्र लक्षणा, अलक्ष्यक्रमे तु कुपितोऽपि किं करिष्यसीति । यदि तु न कुप्यते 'सुवर्णपुष्पाम्' इत्यादावविव- क्षितवाच्येऽपि मुख्यार्थबाधादिलक्षणासामग्रीमनपेक्ष्यैव व्यङ्ग्यार्थविश्रान्तिरि- त्यलं बहुना । उपसंहरति—तस्माद्भक्तिरिति ॥ १८ ॥ अपेक्षा न करके ही सहृदय लोग चाटुप्रतीतिरूप वक्ता के अभिप्राय को समझते हैं। अतएव ग्रन्थकार ने सामान्यरूप से विवक्षितान्यपरवाच्य¹ ध्वनि में भक्ति का अभाव कहा है। हमने तो नास्तिकता की वाणी के ग्रह से ग्रस्त व्यक्ति को समझाने के लिए कहा है—'हो यहाँ लक्षणा, परन्तु अलक्ष्यक्रमध्वनि में कुपित होकर भी क्या करोगे ? यदि कुपित नहीं होते हो तो 'सुवर्णपुष्पाम्०' इत्यादि अविवक्षितवाच्य ध्वनि में भी मुख्यार्थबाध आदि लक्षणा की सामग्री की अपेक्षा न करके ही व्यङ्ग्य अर्थ की विश्रान्ति हो जाती है। बहुत कहना व्यर्थ है। उपसंहार करते हैं—इसलिए भक्ति—। १. विस्तृत 'लोचन' का कुछ स्पष्टीकरण यह है कि लक्षणा का वही विषय हो सकता है जहाँ किसी प्रकार का बाधक उपस्थित होता है। जैसे 'गङ्गा में घोष' इस स्थल में गङ्गा और घोष में आधाराधेयभाव की अनुपपत्तिरूप बाधक का योग है अतः यहाँ लक्षणा व्यापार क्रियाशील होता है। अब यदि चतुर्थ व्यञ्जना व्यापार के विषय प्रयोजन को भी तृतीय लक्षणा व्यापार का विषय बनाने की चेष्टा करते हैं तो कहिए कि यहाँ बाधक का योग या स्खलद्गति क्या है ? स्वयं 'प्रयोजन' शब्द ही इस बात का सूचक है कि यहाँ कोई बाधा नहीं, क्यों कि जिस उद्देश्य को सूचित करने के लिए कोई बाधित बात कही जाय तो स्वयं उद्देश्य कैसे बाधक-योग से युक्त होगा ? किसी प्रकार यदि 'प्रयोजन' में भी लक्षणा को ही मानते हैं तब प्रयोजन के प्रयोजन की बात उपस्थित होती है, इस प्रकार अनवस्था होगी अतः 'प्रयोजन' को एक मात्र व्यञ्जना का ही विषय मानना होगा, न कि लक्षणा का। यह विषय 'काव्यप्रकाश' में भी निर्दिष्ट है। लक्षणा को अभिधा का 'पुच्छभूत' कहा है। क्योंकि जब अभिधा मुख्य अर्थ में बाधक से रोक दी जाती है तब स्वयं एक प्रकार से अचरितार्थ हो कर अन्य अर्थ की ओर चल पड़ती है। इस प्रकार लक्षणा उपस्थित होकर अमुख्य अर्थ को बोधित करती है। वहाँ भी अमुख्य रूप से संकेत ग्रहण होता है। ऐसी स्थिति में बिना अभिधा के लक्षणा का कोई अवसर ही नहीं, इस कारण लक्षणा अभिधापुच्छभूत कही जाती है। कहने का तात्पर्य यह कि जब लक्षणा अभिधा की पूंछ बन कर रहती है तब वह व्यञ्जन रूप ध्वनि का मुकाबला क्या कर सकती है? अतः लक्षणा (भक्ति) को ध्वनि का लक्षण नहीं माना जा सकता। ध्वनि का विषय भिन्न होता है और लक्षणा का भिन्न। इस प्रकार लक्ष्य से अतिरिक्त स्थल में भी लक्षण की प्राप्तिरूप अतिव्याप्ति दोष ध्वनि का लक्षण 'भक्ति' को मानने पर होगा। तथा ऐसा करने पर लक्ष्य में अप्राप्तिरूप अव्याप्ति भी होगी। जैसे विवक्षितान्यपरवाच्य रूप ध्वनि में लक्षणा का प्रसंग न होने के कारण ध्वनि का 'भक्ति' रूप लक्षण अव्याप्त होगा। पुनश्च, 'लोचन' में लक्षणा के इन पाँच रूपों का निर्देश आचार्य ने उदाहरण के साथ किया है—

प्रथम उद्योतः १६७ ध्वन्यालोकः कस्यचिद् ध्वनिभेदस्य सा तु स्यादुपलक्षणम् । वह ध्वनि के किसी भेद का उपलक्षण हो सकती है। लोचनम् ननु मा भूद् ध्वनिरिति भक्तिरिति चैकं रूपम्। मा च भूद्भक्तिर्ध्वनेर्लक्षणम्। उपलक्षणं तु भविष्यति; यत्र ध्वनिर्भवति, तत्र भक्तिरप्यस्तीति भक्त्युपलक्षितो ध्वनिः। न तावदेतत्सर्वत्रास्ति, इयता च किं परस्य सिद्धं ? किं वा नः त्रुटितम् ? शङ्का है कि ध्वनि और भक्ति दोनों एकरूप न हों और 'भक्ति' ध्वनि का लक्षण भी न हो, परन्तु उपलक्षण तो होगी ? जहाँ ध्वनि है वहाँ भक्ति भी है, इस प्रकार ध्वनि भक्ति से उपलक्षित है । ( इसका उत्तर देते हुए कहते हैं कि ) यह ( उपलक्षण ) अभिधेयेन सामीप्यात् संयोगात्समवायतः । वैपरीत्यात् क्रियायोगाल्लक्षणा पञ्चधा मता ॥ इस प्रकार 'शिखरिणि०' इस श्लोक में आकस्मिक प्रश्न-विशेष आदि रूप बाधक को लेकर सादृश्य से लक्षणा होगी, ऐसी स्थिति में लक्षणा या भक्ति को विवक्षितान्यपरवाच्य रूप में ध्वनि के स्थल में भी व्याप्त होने पर अव्याप्ति न होगी । इस पर 'लोचनकार' ने विशेष रूप से अन्त में यह कहा है कि यहाँ यद्यपि मुख्यार्थ का बाध सम्भव है किन्तु सहृदय को उसकी अपेक्षा ही नहीं होती, बल्कि वे लोग यहाँ वक्ता के—चाटु प्रीति रूप अभिप्राय को ही यहाँ विदित करते हैं। अतः यहाँ लक्षणा के प्रसंग की कल्पना अनावश्यक है। असल में ध्वनि के जिस स्थल में लक्षणा का कोई सम्पर्क सम्भावित नहीं, वह है असंलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्य, अर्थात् रसादि ध्वनि । काव्य द्वारा विभावानु- भाव का जो प्रतिपादन होता है वहाँ रंचमात्र भी बाधक का अनुप्रवेश नहीं। ऐसी स्थिति में 'भक्ति' रूप लक्षण अपने लक्ष्य में प्राप्त न होने से अव्याप्त होगा । तब मीमांसक-पक्ष से शङ्का करते हैं, कि हमें 'लक्षणा' पूर्वोक्त स्वरूप की मान्य नहीं, बल्कि, लक्षणा अभिधेय की अविनाभूतप्रतीति है। अर्थात् अभिधेय के साथ किसी न किसी सम्बन्ध से सम्बद्ध की प्रतीति ही लक्षणा है। इस प्रकार अभिधेय रूप विभाव-अनुभाव के अविनाभूत रसादि लक्षणा का विषय होंगे। फिर यह समस्या नहीं जाती है कि असंलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्य में लक्षणा की प्राप्ति नहीं है । उसके उत्तर में आचार्य ने पहले 'लक्षणा' के इस लक्षण का ही खण्डन किया । उनके अनुसार जब अभिधेय की अविनाभूतप्रतीति ही लक्षणा होगी तब तो 'धूम' शब्द से धूम के ज्ञान होने पर उससे अविनाभूत अग्निस्मृति को भी आप लक्षणा का कार्य ही स्वीकार करेंगे और तत्पश्चात् अग्नि से शीतापनोदन की स्मृति को भी 'धूम' का शब्दार्थ मानेंगे, इस प्रकार इतने शब्दार्थों की कल्पना करनी पड़ेगी कि जिसका कोई अन्त नहीं । अन्ततोगत्वा आपको मुख्यार्थ बाध को लक्षणा का बीज मानना ही पड़ेगा। इस प्रकार विभाव आदि में बाधक का अभाव होने से लक्षणा का सम्पर्क नहीं है, यह बात तदवस्थ रहती है ।

१६८ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः सा पुनर्भक्तिर्वक्ष्यमाणप्रभेदमध्यादन्यतमस्य भेदस्य यदि नामोप- लक्षणतया सम्भाव्येत; यदि च गुणवृत्त्यैव ध्वनिborderर्लक्ष्यत इत्युच्यते तदभिधाव्यापारेण तदितरोऽलङ्कारवर्गः समग्र एव लक्ष्यत इति प्रत्येक- मलङ्काराणां लक्षणकरणवैय्यर्थ्यप्रसङ्गः । किं च वह भक्ति वक्ष्यमाण प्रभेदों में से किसी एक भेद के यदि उपलक्षण रूप से सम्भावित हो सके; और यदि 'गुणवृत्ति से ही ध्वनि लक्षित होता है' यह कहते हैं तो अभिधा व्यापार से ही समग्र अलङ्कार वर्ग लक्षित हो सकता है, ऐसी स्थिति में अलग-अलग अलङ्कारों का लक्षण करना व्यर्थ होगा । और भी, लोचनम् इति तदाह—कस्यचिदित्यादि । ननु भक्तिस्तावच्चिरन्तनैरुक्ता, तदुपलक्षणमुखेन च ध्वनिमपि समग्रभेदं लक्षयिष्यन्ति ज्ञास्यन्ति च । किं तल्लक्षणेनेत्याश- ङ्कयाह—यदि चेति । अभिधानाभिधेयभावो ह्यलङ्काराणां व्यापकः; ततश्चाभि- सर्वत्र नहीं है, इतने से ( अर्थात् भक्ति के उपलक्षणमात्र हो जाने से ) भक्तिवादी का क्या मतलब सिद्ध हो गया ? और हमारा क्या बिगड़ गया ? इसी को कहते हैं—वह ध्वनि के इत्यादि । फिर शङ्का करते हैं कि भक्ति को प्राचीनों ने कहा है, उसके उपलक्षणरूप से समग्र भेदसहित ध्वनि को भी लक्षित करेंगे और ज्ञान करेंगे। अतः उस (ध्वनि) के लक्षण से क्या ? यह आशङ्का करके कहते हैं—और यदि—। अलङ्कारों का इस प्रकार अपनी बात के कट जाने से चिढ़ कर मीमांसक यह कह उठता है कि रत्यादि चित्तवृत्ति के ज्ञान में हम शब्द-व्यापार को ही नहीं मानते, बल्कि जिस प्रकार धूम के ज्ञान से अग्नि का स्मरण करते हैं उसी प्रकार विभावादि की प्रतीति के पश्चात् रसादि चित्तवृत्ति की प्रतीति होती है । इस पर लोचनकार का कहना है कि तब तो परचित्तवृत्तिज्ञान ही रस का ज्ञान आप स्वीकार करते हैं । किन्तु यह तो दूसरे की चित्तवृत्ति का अनुमान मात्र है इसमें रसत्व कैसा ? बल्कि काव्यगत विभावादि की चर्वणा के कारण जो अलौकिक चमत्काररूप रसास्वाद है उसे स्मरण और अनुमान आदि की कोटि में लाकर हीन बनाना ठीक नहीं । रस की अनुभूति के लिए अनुमान और स्मरण आदि की कोई कैद नहीं है । केवल दर्शक दृश्यमान के साथ हृदयसंवाद का अनुभव करता हुआ चर्वणा के बल से विल्कुल तन्मय हो जाता है और तब उसे पता नहीं रहता कि वह किसी भिन्न या तटस्थ व्यक्ति के सुख से सुखी या दुःख से दुःखी हो रहा है। यही रसभूमि की अलौकिकता है। यहाँ दुःख का भी आनन्द के रूप में ही अनुभव होता हैं। इस प्रकार आलङ्कारिक आचार्यों ने 'चर्वणा' को रस की अनुभूति के लिए अनिवार्य माना है, बल्कि यहाँ तक वे लोग कहते हैं कि चर्वणा और रसानुभूति में कोई अन्तर नहीं होता । अब यदि कोई कहे कि 'चर्वणा' किसी प्रभाव से उत्पन्न होती है तब यही उत्तर है कि वह अलौकिक है अतः वहाँ लौकिक प्रत्यक्ष

प्रथम उद्योतः १६९ ध्वन्यालोकः लक्षणेऽन्यैः कृते चास्य पक्षसंसिद्धिरैव नः ॥ १९ ॥ कृतेऽपि वा पूर्वमेवान्यैर्ध्वनिलक्षणे पक्षसंसिद्धिरैव नः; यस्माद्- ध्वनिरस्तीति नः पक्षः । स च प्रागेव संसिद्ध इत्ययत्नसम्पन्न- अगर दूसरे लोगों ने ध्वनि का लक्षण कर दिया है तो हमारे पक्ष की सिद्धि ही होती है ॥ १९ ॥ पहले ही दूसरों द्वारा ध्वनि के लक्षण कर दिए जाने पर हमारे पक्ष की सिद्धि ही है, क्योंकि 'ध्वनि है' यह हमारा पक्ष है, और वह पहले से ही सिद्ध हो चुका, इस लोचनम् धावृत्ते वैयाकरणमीमांसकैर्निरूपिते कुत्रेदानीमलङ्कारकाराणां व्यापारः । तथा हेतुबलात्कार्यं जायत इति तार्किकैरुक्ते किमिदानीमीश्वरप्रभृतीनां कर्तॄणां ज्ञातॄणां वा कृत्यमपूर्वं स्यादिति सर्वो निरारम्भः स्यात् । तदाह—लक्षणाकरण- वैय्यर्थ्यप्रसङ्ग इति । मा भूद्धाऽपूर्वोन्मीलनं पूर्वोन्मीलितमेवास्माभिः सम्यङ्नि- रूपितं, तथापि को दोष इत्यभिप्रायेणाह—किं चेत्यादि । प्रागेवेति । अस्मत्प्रय- अभिधानाभिधेयभाव व्यापक है, ऐसी स्थिति में वैयाकरण और मीमांसक आचार्यों द्वारा अभिधा व्यापार के निरूपण कर दिये जाने पर आलंकारिक आचार्यों का व्यापार क्या महत्त्व रखता है। उसी प्रकार हेतु के बल से कार्य होता है ऐसा तार्किकों के कह देने पर ईश्वर प्रभृति कर्त्ताओं और ज्ञाताओं का कार्य क्यों अपूर्व होगा ? इस प्रकार निरारम्भ होने लगेगा । उसे कहते हैं—लक्षण करना व्यर्थ होगा— । तब शङ्का करते हैं कि अपूर्व वस्तु का उन्मीलन न हो, जो पहले से उन्मीलित है उसे ही हमने सम्यक् प्रकार से निरूपण किया, तब भी क्या दोष है ? इस अभिप्राय से कहते हैं—और भी— । इत्यादि । पहले ही— । अर्थात् हमारे प्रयत्न से । इस प्रकार तीन प्रकार के अभाववाद को, और ध्वनि के भक्ति में अन्तर्भूतत्व का निराकरण आदि प्रमाणों का कोई उपयोग नहीं रह जाता । लोक में जो कारण और कार्य होते हैं वेही अलौकिक काव्य में विभाव और अनुभाव हो जाते हैं । चर्वणा स्थायी भाव को रस्यमान बनाती है, इसका यह अभिप्राय नहीं चर्वणा प्रमाण के व्यापार की भांति ज्ञापन अथवा हेतु के व्यापार की भांति उत्पादन रूप है, बल्कि वह अभिव्यञ्जन है । चर्वणा के माध्यम से विभावादि रस का हेतु अवश्य है कि अलौकिक है अतः उसे न तो ज्ञापक हेतु कह सकते और न तो कारक । रस जब कि स्वसंवेदनसिद्ध है तो उसकी सिद्धि के लिए किसी अतिरिक्त प्रमाणरहित कहने से कुछ भी बिगड़ता नहीं । अस्तु, जब कि आप लक्षणा से रस के बोध की बात करते हैं तो यह कहना है कि जहाँ अर्थाभिधान का अनुपयोगी अनुप्रास भी रस का व्यञ्जक है वहाँ तो अभिधा का भी प्रसंग नहीं फिर लक्षणा की शङ्का भी क्या हो सकती है ?

१७० सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः समीहितार्थाः संवृत्ताः स्मः । येऽपि सहृदयहृदयसंवेद्यमनाख्येयमेव ध्वनेरात्मानमाम्नासिषुस्तेऽपि न परीक्ष्य वादिनः । यत उक्तया नीत्या वक्ष्यमाणया च ध्वनेः सामान्यविशेषलक्षणे प्रतिपादितेऽपि यद्यनाख्ये- प्रकार बिना यत्न के हमारा अभीष्ट कार्य सिद्ध हो गया । जिन लोगों ने सहृदय जनों के हृदय द्वारा संवेद्य एवं अनिर्वचनीय ध्वनि के स्वरूप को आम्नात किया है वे भी परीक्षा करके कहने वाले नहीं हैं । क्योंकि कथित और वक्ष्यमाण नीति के अनुसार ध्वनि के सामान्य एवं विशेष लक्षण के प्रतिपादित होने पर भी यदि उसका अनि- लोचनम् तादिति शेषः । एवं त्रिप्रकारमभाववादं, भक्त्यन्तर्भूततां च निराकुर्वता अलक्ष- णीयत्वमेतन्मध्ये निराकृतमेव । अत एव मूलकारिका साक्षात्तन्निराकरणार्था न श्रूयते । वृत्तिकृत्तु निराकृतमपि प्रमेयशय्यापूरणाय कण्ठेन तत्पक्षमनूद्य निरा- करोति—येऽपीत्यादिना । उक्तया नीत्या 'यत्रार्थः शब्दो वा' इति सामान्यलक्षणं प्रतिपादितम् । वक्ष्यमाणया तु नीत्या विशेषलक्षणं भविष्यति 'अर्थान्तरे सङ्क्रमितम्' इत्यादिना । तत्र प्रथमोद्द्योते ध्वनेः सामान्यलक्षणमेव कारिका- कारेण कृतम् । द्वितीयोद्द्योते कारिकाकारोऽवान्तरविभागं विशेषलक्षणं च विदधदनुवादमुखेन मूलविभागं द्विविधं सूचितवान् । तदाशयानुसारेण तु करते हुए उसके अलक्षणीयत्व का भी इसमें निराकरण किया ही। अत एव मूलकारिका साक्षात् रूप से अलक्षणीयत्व के निराकरण के सम्बन्ध की नहीं श्रुत है, परन्तु वृत्तिकार स्वतः निराकृत उस पक्ष को प्रमेय के सन्निवेश विशेष की पूर्ति के लिए कण्ठतः अनुवाद करके निराकरण करते हैं—जिन लोगों ने— । इत्यादि द्वारा । उक्त नीति के अनुसार 'यत्रार्थः शब्दो वा०' यह सामान्य लक्षण प्रतिपादित है, वक्ष्यमाण नीति के अनुसार विशेष लक्षण होगा—'अर्थान्तरे सङ्क्रमितम्०' इत्यादि द्वारा । प्रथम 'उद्योत' में कारिकाकार ने ध्वनि का सामान्य लक्षण ही किया है । दूसरे 'उद्योत' में कारिका- कार ने अवान्तर विभाग और विशेष लक्षण को करते हुए अनुवाद द्वारा मूल का द्विविध विभाग सूचित किया है । उनके आशय के अनुसार वृत्तिकार ने इसी उद्योत में अन्त में, आचार्य ने किसी की यह शङ्का उद्भावित की है कि काव्य को वाच्य और व्यङ्ग्य दो अर्थों का बोधक मानते हैं, इस प्रकार हम 'वाक्यभेद' करेंगे । इसके उत्तर में आचार्य अभिनव गुप्त का कहना है कि वाक्यार्थ कभी दो नहीं हो सकता, क्योंकि एक काल में दो वाक्यार्थ का ज्ञान नहीं हो सकता । प्रकरण आदि की सहायता दूसरे वाक्य में भी लेनी ही पड़ेगी, क्योंकि ऐसा न करने से काम नहीं चलेगा । और भी यदि आप प्रकरण आदि को नियामक स्वीकार नहीं करेंगे तो 'अग्निहोत्रं जुहुयात् स्वर्गकामः' इस श्रुति वाक्य का अर्थ 'कुत्ते के मांस को खाना चाहिए' यह

प्रथम उद्योतः १७१ ध्वन्यालोकः यत्त्वं तत्सर्वेषामेव वस्तूनां तत्तत्सक्तम्। यदि पुनर्ध्वनेरतिशयोक्त्यानया काव्यान्तरातिशायि तैः स्वरूपमाख्यायते तत्तेऽपि युक्ताभिधायिन एव॥ वचनीयत्व है तब तो वह (अनिर्वचनीयत्व) समग्र वस्तुओं के सम्बन्ध में प्राप्त है। पुनः यदि वे लोग इस अतिशयोक्ति द्वारा ध्वनि का कोई दूसरे काव्यों से बढ़ कर स्वरूप कहते हैं तो वे भी ठीक ही कहते हैं। इति श्रीराजानकानन्दवर्धनाचार्यविरचिते ध्वन्यालोके प्रथम उद्योतः॥ लोचनम् वृत्तिकृदत्रैवोद्द्योते मूलविभागमवोचत्—‘स च द्विविधः’ इति। सर्वेषामिति। लौकिकानां शास्त्रीयाणां चेत्यर्थः। अतिशयोक्त्येति। यथा ‘तान्यक्षराणि हृदये किमपि स्फुरन्ति’ इतिवदतिशयोक्त्यानाख्येयतोक्ता साररूपतां प्रतिपादयितु- मिति दर्शितमिति शिवम्॥ १९॥ किं लोचनं विनालोको भाति चन्द्रिकयापि हि। तेनाभिनवगुप्तोऽत्र लोचनोन्मीलनं व्यधात्॥ मूल का विभाग कहा है—‘स च द्विविधः’ (‘और वह दो प्रकार का है’)। समग्र वस्तुओं का—। अर्थात् लौकिक एवं शास्त्रीय वस्तुओं का। अतिशयोक्ति द्वारा—। जैसे—‘तान्यक्षराणि हृदये किमपि स्फुरन्ति’ (‘वे अक्षर हृदय में कुछ स्फुरित हो रहे हैं) इसके समान अतिशयोक्ति द्वारा साररूपता के प्रतिपादनार्थ अनाख्येयता (अनिर्वचनीयत्व) कही गई है, यह दिखाया गया। (शिवम्) क्या लोचन के बिना लोक (संसार) चन्द्रिका से भी उद्भासित होता है? (व्यङ्ग्य यह कि क्या ‘लोचन’ व्याख्या के बिना आलोक—ध्वन्यालोक—‘चन्द्रिका’ व्याख्या से स्फुरित होता है?) उस कारण अभिनवगुप्त ने यहाँ ‘लोचन’ का उन्मीलन किया है। किया जाय तो आपके सामने क्या प्रमाण होगा? आपको विवश होकर प्रकरण को स्वीकार करके ही इसका अर्थ करना होगा। अतः ‘वाक्यभेद’ की बात दोषपूर्ण है। रसास्वाद की स्थिति में लौकिक स्थितियों की भाँति पूर्वापर-काल की चिन्ता नहीं होती, वह सर्वथा अलौकिक स्थिति है। जैसा कि वृत्तिकारने सामान्यतः ‘विवक्षितान्यपरवाच्य ध्वनि’ में भक्ति के अभाव का निर्देश किया है उस पर लोचनकार कहते हैं कि माना कि विवक्षितान्यपरवाच्य के संलक्ष्यक्रम रूप भेद में लक्षणा को हम किसी प्रकार स्वीकार कर भी लें, किन्तु रसादि रूप अलक्ष्यक्रम में क्या उपाय निकालैंगे और यदि अपना हठ छोड़ कर वादी आचार्य की बात सुने तो वह भी कहते हैं कि

१७२ सलोचन-ध्वन्यालोकः लोचनम् यदुन्मीलनशक्त्यैव विश्वमुन्मीलति क्षणात्। स्वात्मायतनविश्रान्तां तां वन्दे प्रतिभां शिवाम् ॥ इति श्रीमहामाहेश्वराचार्यवर्याभिनवगुप्तोन्मीलिते सहृदयालोकलोचने ध्वनिसङ्केते प्रथम उद्योतः ॥ जिसकी उन्मीलन-शक्ति से ही क्षण में विश्व उन्मीलित हो जाता है उस अपने आयतन में स्थित शिवा प्रतिभा की वन्दना करता हूँ।१ महामाहेश्वराचार्यवर्य अभिनवगुप्त द्वारा उन्मीलित सहृदयालोकलोचन रूप ध्वनिसङ्केत में प्रथम उद्योत समाप्त हुआ। विवक्षितान्यपरवाच्य ही क्या, अविवक्षितवाच्य ध्वनि, जो लक्षणामूल है, में भी मुख्यार्थ-बाध आदि लक्षणा की सामग्री की अपेक्षा न करके ही व्यङ्ग्य अर्थ में विश्रान्ति होती है। यह बात सिद्ध हुई कि 'भक्ति' किसी प्रकार ध्वनि का लक्षण नहीं हो सकती। १. आचार्य अभिनवगुप्त ने अपने शैव-दर्शन की कल्पनाओं के अनुसार यहाँ प्रतिभा रूप शिवाख्या परा शक्ति की वन्दना की है। शैव कल्पना के अनुसार परमशैव कूटस्थ तत्त्व हैं, किन्तु उन्हें आयतन बना कर विश्रान्त रहने वाली परा शक्ति ही अपनी उन्मीलन-शक्ति से विश्व का उन्मीलन क्षण भर में कर देती है। प्रस्तुत काव्य-पक्ष में इसका अर्थ यह व्यञ्जित होता है कि कवि की प्रतिभा या नवनवोन्मेषशालिनी प्रज्ञा है, उसे प्रणाम है; जो कि वह नित्य अपने आयतन कवि में विराजती है और अपनी शक्ति द्वारा एक अलग ही संसार का उन्मीलन करती रहती है। यह आकलनीय है कि आचार्य अभिनवगुप्त ने अपनी 'लोचन' टीका के प्रत्येक 'उद्योत' के अन्त में क्रमशः परा, पश्यन्ती, मध्यमा और वैखरी को नमन किया है।

द्वितीय उद्योतः ध्वन्यालोकः एवमविवक्षितवाच्यविवक्षितान्यपरवाच्यत्वेन ध्वनिद्विप्रकारः प्रका- शितः । तत्राविवक्षितवाच्यस्य प्रभेदप्रतिपादनायेदमुच्यते— इस प्रकार अविवक्षितवाच्य और विवक्षितान्यपरवाच्य के रूप से ध्वनि दो प्रकार से प्रकाशित है । उनमें अविवक्षितवाच्य के प्रभेद के प्रतिपादन के लिए यह कहते हैं— लोचनम् या स्मर्यमाणा श्रेयांसि सूते ध्वंसयते रुजः । तामभीष्टफलोदारकल्पवल्लीं स्तुवे शिवाम् ॥ वृत्तिकारः सङ्गतिमुद्द्योतस्य कुर्वाण उपक्रमते—एवमित्यादि । प्रकाशित इति । मया वृत्तिकारेण सतेति भावः । न चैतन्मयोत्सूत्रमुक्तम्, अपि तु कारि- काकाराभिपायेणोत्याह—तत्रेति । तत्र द्विप्रकारप्रकाशने वृत्तिकारकृते यन्निमित्तं बीजभूतमिति सम्बन्धः । यदि वा—तत्रेति पूर्वशेषः । तत्र प्रथमोद्द्योते वृत्तिका- रेण प्रकाशितः अविवक्षितवाच्यस्य यः प्रभेदोऽवान्तरप्रकारस्तत्प्रतिपादनाये- दमुच्यते । तदवान्तरभेदप्रतिपादनद्वारेणैव चानुवादद्वारेणाविवक्षितवाच्यस्य यः प्रभेदो विवक्षितान्यपरवाच्यात्प्रभिन्नत्वं तत्प्रतिपादनायेदमुच्यते । भवति जो शिवा (शिव की शक्ति) [लोगों द्वारा] स्मर्यमाण होकर कल्याणों को उत्पन्न करती है और आपदाओं को नष्ट करती है उस अभीष्ट फल की उदार कल्पलता को स्तवन करता हूँ । वृत्तिकार उद्योत की सङ्गति बैठाते हुए आरम्भ करते हैं—इस प्रकार— । इत्यादि । प्रकाशित— । भाव यह कि मैंने वृत्तिकार के रूप में (ध्वनि के दो प्रकारों को प्रकाशित किया है) । मैंने इस सूत्र (कारिका) की सीमा के बाहर होकर नहीं कहा है, बल्कि कारिकाकार के अभिप्राय से कहा है—वहाँ— । सम्बन्ध (पूर्वापर की संगति) यह है कि वृत्तिकार द्वारा ध्वनि के दो प्रकारों के प्रकाशन में जो निमित्त है या बीजभूत है (उसे कहते हैं) । अथवा—'वहाँ' यह प्रथम उद्योत में कहे हुए का शेष है । वहाँ प्रथम उद्योत में वृत्तिकार ने अविवक्षित वाच्य का जो प्रभेद (विवक्षितान्यपरवाच्य से भिन्नत्व) प्रकाशित किया था उसके अवान्तर प्रकार के प्रतिपादनार्थ यह कहते हैं । उसके अवान्तर भेद के प्रतिपादन के द्वारा ही और अनुवाद के द्वारा अविवक्षित वाच्य का जो प्रभेद अर्थात् विवक्षितान्यपरवाच्य से प्रभिन्नत्व है, उसके प्रतिपादन के लिए यह कहते हैं । भाव यह कि मूलरूप से दो भेद होना

१७४ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः अर्थान्तरे सङ्क्रमितमत्यन्तं वा तिरस्कृतम् । अविवक्षितवाच्यस्य ध्वनेर्वाच्यं द्विधा मतम् ॥ १ ॥ तथाविधाभ्यां च ताभ्यां व्यङ्ग्यस्यैव विशेषः । अर्थान्तर में सङ्क्रमित और अत्यन्त तिरस्कृत, इस रूप से अविवक्षितवाच्य ध्वनि का वाच्य दो प्रकार का माना गया है ॥ १ ॥ क्योंकि उन (दोनों प्रकार के वाच्यों) से व्यङ्ग्य का ही विशेष (उत्कर्ष) है। लोचनम् मूलतो द्विभेदत्वं कारिकाकारस्यापि सम्मतमेवेति भावः । सङ्क्रमितमिति णिचा व्यञ्जना व्यापारे यः सहकारिवर्गस्तस्यायं प्रभाव इत्युक्तं तिरस्कृतशब्देन च । येन वाच्येनाविवक्षितेन सताऽविवक्षितावाच्यो ध्वनिर्व्यपदिश्यते तद्वाच्यं द्विधेति सम्बन्धः । योऽर्थ उपपद्यमानोऽपि तावतैवानुपयोगाद्धर्मान्तरसंवलन- यान्यतामिव गतो लक्ष्यमाणोऽनुगतधर्मी सूत्रन्यायेनास्ते स रूपान्तरपरिणत उक्तः । यस्त्वनुपपद्यमान उपायतामात्रेणार्थान्तरप्रतिपत्तिं कृत्वा पलायत इव स तिरस्कृत इति । ननु व्यङ्ग्यात्मनो यदा ध्वनेर्भेदो निरूप्यते तदा वाच्यस्य द्विधेति भेदकथनं न सङ्गतमित्याशङ्क्याह—तथाविधाभ्यां चेति । चो यस्मा- कारिकाकार को भी सम्मत ही है। 'सङ्क्रमित' इस 'णिच्' प्रत्यय से और 'तिरस्कृत' शब्द से व्यञ्जना व्यापार में जो सहकारी वर्ग है उसका प्रभाव है, यह कहा¹ है। सम्बन्ध यह है कि जिस वाच्य के अविवक्षित होने से अविवक्षितवाच्य ध्वनि कहा जाता है वह वाच्य दो प्रकार का है। जो अर्थ उपपन्न होता हुआ भी, उतने ही अंश में उपयोग के न होने से धर्मान्तर के मिल जाने के कारण, दूसरा बना—जैसा मालूम पड़ता हुआ, धर्मी के अनुगत होने की स्थिति में सूत्र की भाँति, होता है, वह रूपान्तर-परिणत (अर्थान्तरसङ्क्रमित) कहा गया है। परन्तु जो कि अनुपपन्न होता हुआ, उपायमात्र होने के कारण (क्योंकि मुख्यार्थ का सम्बन्ध भी लक्षण का निमित्त है) दूसरे अर्थ की प्रतीति उत्पन्न करके जैसे पलायन कर जाता है, वह तिरस्कृत कहा जाता है। (शंका) जब कि व्यङ्ग्य रूप ध्वनि का भेद-निरूपण करते हैं, तब वाच्य का 'द्विधा' यह भेदकथन सङ्गत नहीं होता है, यह आशङ्का करके कहते हैं—उन दोनों प्रकार के—। 'च' 'और' का प्रयोग ('यस्मात्') य! १. वाच्य अर्थान्तर में सङ्क्रान्त नहीं होता, प्रत्युत सङ्क्रान्त कराया जाता है अर्थात् 'सङ्क्रमित' होता हैं, इस प्रकार यहाँ 'णिच्' प्रत्यय के प्रयोग से प्रयोजक कर्ता की अपेक्षा है, यहाँ प्रयोजक कर्ता है व्यञ्जना-व्यापार में सहकारिवर्ग, अर्थात् लक्षणा और वक्ता की विवक्षा आदि। बिना इनकी सहायता से वाच्य अर्थान्तर में सङ्क्रान्त नहीं होता। यही स्थिति 'तिरस्कृत' शब्द की भी है। प्रस्तुत अविवक्षित वाच्य ध्वनि को इसी कारण 'लक्षणामूल ध्वनि' भी कहते हैं। लक्षणा के आधार पर ही अर्थान्तरसंक्रमितवाच्य और अत्यन्ततिरस्कृतवाच्य ये दो भेद

द्वितीय उद्योतः १७५ ध्वन्यालोकः तत्रार्थान्तरसङ्क्रमितवाच्यो यथा— स्निग्धश्यामलकान्तिलिप्तवियतो वेल्लद्बलाका घना वाताः शीकरिणः पयोदसुहृदामानन्दकेकाः कलाः। अर्थान्तरसङ्क्रमितवाच्य, जैसे— स्निग्ध एवं श्यामल कान्ति से आकाश को लिप्त कर देने वाले और वेल्लित होती हुई बकपङ्क्तियों वाले मेघ, फुहारों वाले वायु और मेघ के साथ मयूरों की अव्यक्त- लोचनम् दर्थे। व्यञ्जकवैचित्र्याद्धि युक्तं व्यङ्ग्यवैचित्र्यमिति भावः। व्यञ्जके त्वर्थे यदि ध्वनिशब्दस्तदा न कश्चिद्दोष इति भावः। भेदप्रतिपादकेनैवान्वर्थनाम्ना लक्षणमपि सिद्धमित्यभिप्रायेणोदाहरणमे- वाह—अर्थान्तरसङ्क्रमितवाच्यो यथेति। अत्र श्लोके रामशब्द इति सङ्गतिः। स्निग्धया जलसम्बन्धसरसया श्यामलया द्रविडवनितोचितासितवर्णया कान्त्या चाकचक्येन लिप्तमाच्छुरितं वियन्नभो यैः। वेल्लन्त्यो विजृम्भमाणास्तथा चलन्त्यः परभागवशात्प्रहर्षवशाच्च बलाकाः सितपक्षिविशेषा येषु त एवंविधा 'क्योंकि' के अर्थ में है। भाव यह कि व्यञ्जक के वैचित्र्य से व्यङ्ग्य का वैचित्र्य बनता है। परन्तु यदि व्यञ्जक के अर्थ में 'ध्वनि' शब्द का प्रयोग हो, तब कोई दोष नहीं। भेद का प्रतिपादन करने वाले यथार्थ नाम से लक्षण भी सिद्ध हो गया है, इस अभिप्राय से उदाहरण को ही कहते हैं—अर्थान्तरसङ्क्रमितवाच्य, जैसे—। इस श्लोक में 'राम' 'शब्द' है, यह सङ्गति है। स्निग्ध अर्थात् जल के सम्बन्ध के कारण सरस, श्यामल अर्थात् द्रविड़ देश की स्त्रियों के समान वर्ण वाली कान्ति अर्थात् चाकचिक्य या चमक उससे लिप्त अर्थात् आच्छुरित आकाश है जिन मेघों से। वेल्लित होती हुई अर्थात् विजृम्भमाण तथा परभाग के कारण (मेघों के श्याम वर्ण होने और अपने सित वर्ण होने के कारण) और प्रहर्ष के कारण चलती हुई बलाकायें होते हैं। इसे स्पष्ट समझने के लिए प्रस्तुत में 'लक्षणा' के सम्बन्ध में कुछ और भी विदित करना आवश्यक है। कहा जा चुका है कि 'लक्षणा' शब्द की वह आरोपित शक्ति है जिससे मुख्यार्थ के बाध, मुख्यार्थ के योग एवं रूढ़ि अथवा प्रयोजन में अन्यतर के होने पर अन्य अर्थ लक्षित होता है। यह लक्षणा दो प्रकार की है—उपादान लक्षणा और लक्षणलक्षणा। जहाँ अपनी सिद्धि के लिए दूसरे का आक्षेप होता है वह उपादान लक्षणा और जहाँ दूसरे अर्थ की सिद्धि के लिए अपने अर्थ का त्याग (समर्पण) होता है वह लक्षणलक्षणा है। 'कुन्ताः प्रविशन्ति' यह उपादानलक्षणा है, क्योंकि कुन्त अपने प्रवेश की सिद्धि के लिये कुन्तधारी पुरुषों का आक्षेप करते हैं। 'गङ्गायां घोषः' यह उदाहरण लक्षणलक्षणा का है, क्योंकि आधाराधेयभाव की सिद्धि के लिए यहाँ 'गङ्गा' शब्द अपने अर्थ का त्याग कर देता है। इस प्रकार पहले में कुन्तधारियों के आक्षेप से एवं दूसरे में 'गङ्गा' के प्रवाह रूप अर्थ के त्याग से अन्वयानुपपत्ति दूर होती है। ये दोनों लक्षणा के भेद क्रमशः

१७६ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः कामं सन्तु दृढं कठोरहृदयो रामोऽस्मि सर्वं सहे वैदेही तु कथं भविष्यति हहा हा देवि धीरा भव ॥ मधुर केका, ये सब जितना चाहें खूब हों, मैं तो राम हूँ, सब कुछ सहन करता हूँ, परन्तु विदेहपुत्री सीता कैसे होगी ? हा हा, देवि, तुम धैर्य धारण करो । लोचनम् मेघाः । एवं नभस्तावद् दुरालोकं वर्तते । दिशोऽपि दुःसहाः । यतः सूक्ष्मजल- कणोद्गारिणो वाता इति मन्दमन्दत्वमेषामनियतदिगागमनं च बहुवचनेन सूचितम् । तर्हि गुहासु क्वचित्प्रविश्यास्यतामित्यत आह—पयोदानां ये सुहृद- स्तेषु च सत्सु ये शोभनहृदया मयूरास्तेषामानन्देन हर्षेण कलाः षड्जसंवा- दिन्यो मधुराः केकाः शब्दविशेषाः ताश्च सर्वं पयोदवृत्तान्तं दुस्सहं स्मारयन्ति; स्वयं च दुस्सहा इति भावः । एवमुद्दीपनविभावोद्बोधितविप्रलम्भः परस्पराधि- ष्ठानत्वादृतेः विभावानां साधारणतामभिमन्यमानः इत एव प्रभृति प्रियतमां हृदये विधायैव स्वात्मवृत्तान्तं तावदाह—कामं सन्विति । दृढमिति सातिश- यम् । कठोरहृदय इति । रामशब्दार्थध्वनिविशेषावकाशदानाय कठोरहृदयपदम् । अर्थात् उज्ज्वल पांखों वाली बकपंकतियां जिनमें हैं वे, इस प्रकार के मेघ । इस प्रकार आकाश बिलकुल दिखाई नहीं देता है और दिशाएं भी दुःसह हो रही हैं । क्योंकि जब जल में फुहारों को फैलाने वाले वायु हैं, यह कह कर उनका मन्द-मन्द और अनियत दिशा से आगमन को 'बहुवचन' द्वारा सूचित किया । ऐसी स्थिति में कहीं कन्दराओं में घुस कर बैठना चाहिए, इस कारण से कहते हैं—मेघों के जो मित्र हैं, उनके विद्यमान होने पर जो शोभनहृदय वाले मयूर हैं उनके आनन्द या हर्ष से षड्ज- कायें स्वर से मेल खाती हुई अव्यक्त-मधुर के मांस ( शब्द-विशेष ), वे मेघ के समस्त दुःसह वृत्तान्त को याद दिलाती हैं और स्वयं दुःसह हैं, यह भाव है । इस प्रकार उद्दीपन विभाव के कारण विप्रलम्भ के उद्बोधित हो जाने पर एक-दूसरे नायक-नायिका में अधिष्ठित रति के होने से विभावों के साधारण्य को मानते हुए ( नायक ) यहाँ से ही लेकर प्रियतमा को हृदय में रखकर ही अपना वृतान्त कहता है—जो चाहे हो—। दृढ अर्थात् बहुत कुछ । कठोर हृदय वाला— । 'राम' शब्द के अर्थ को ध्वनि-विशेष के अवकाश देने के लिए 'कठोर हृदय' पद को रखा है । जैसे 'तद्गेहम्' यह कहकर भी

अर्थान्तरसङ्क्रमित वाच्य और अत्यन्त तिरस्कृतवाच्य ध्वनियों के मूल में होते हैं । पहले में आक्षेप अर्थात् अर्थान्तर में सङ्क्रमण और दूसरे में अपना त्याग ( तिरस्कार ) होता है । इस प्रकार 'सङ्क्रमित' इस णिजन्त प्रयोग से व्यञ्जना की सहकारिणी लक्षणा के प्रभाव को ग्रन्थकार ने सूचित किया है, यह लोचनकार के कथन का तात्पर्य है । आगे दोनों ध्वनियों के उदाहरणों से यह विषय और भी स्पष्ट हो जायगा । स्वयं लोचनकार ने दोनों ध्वनियों के स्वरूप को कण्ठोक्त कर दिया है ।

द्वितीय उद्योतः १७७ ध्वन्यालोकः इत्यत्र रामशब्दः । अनेन हि व्यङ्ग्यधर्मान्तरपरिणतः सञ्ज्ञी प्रत्याय्यते, न संज्ञिमात्रम् । यह 'राम' शब्द । इस ( 'राम' शब्द ) से व्यञ्जित होते हुए दूसरे धर्म से परिणत व्यक्ति प्रतीत कराया जाता है, केवल व्यक्ति नहीं । लोचनम् यथा 'तद्गेहम्' इत्युक्तेऽपि 'नतभित्ति' इति । अन्यथा रामपदं दशरथकुलोद्भव- त्वकौसल्यास्नेहपात्रत्वबाल्यचरितजानकीलाभादिधर्मान्तरपरिणतमर्थं कथं न ध्वनेदिति । अस्मीति । स एवाहं भवामीत्यर्थः । भविष्यतीति क्रियासामान्यम् । तेन किं करिष्यतीत्यर्थः । अथ च भवनमेवास्या असम्भाव्यमिति । उक्तप्रका- रेण हृदयनिहितां प्रियां स्मरणशब्दाविकल्पपरस्परया प्रत्यक्षीभावितां हृदयस्फो- टनोन्मुखीं ससंभ्रममाह—हहा हेति । देवीति । युक्तं तव धैर्यमित्यर्थः । अनेनेति । रामशब्देनानुपयुज्यमानार्थेनेति भावः । व्यङ्ग्यं धर्मान्तरं प्रयोजन- रूपं राज्यनिर्वासनाद्यसङ्ख्येयम् । तच्चासङ्ख्यत्वादभिधाव्यापारेणाशक्यसम- र्पणम् । क्रमेणार्प्यमाणमप्येकधीविषयभावाभावान्न चित्रचर्वणापदमिति न चारुत्वातिशयकृत् । प्रतीयमानं तु तदसङ्ख्यमनुद्भिन्नविशेषत्वेनैव किं किं रूपं न सहत इति चित्रपानकरसापूपगुडमोदकस्थानीयविचित्रचर्वणापदं भवति । यथोक्तम्—'उक्त्यन्तरेणाशक्यं यत्' इति । एष एव सर्वत्र प्रयोजनस्य प्रतीय- 'नतभित्ति' कहा है । अन्यथा 'राम' पद दशरथ के कुल में उत्पन्न होना, कौसल्या के स्नेह का पात्र होना, बाल्यचरित और जानकीलाभ आदि धर्मान्तर में परिणत अर्थ को कैसे नहीं ध्वनित करता ! 'हूँ' अर्थात् वही मैं हूँ । 'होगी' यह क्रिया सामान्य है, इससे अर्थ है कि फिर क्या करेगी ? और ऐसी स्थिति में उसका होना ( अस्तित्व ) ही असम्भव हो जायगा । कहे प्रकार के अनुसार ( मेघ आदि उद्दीपकों का प्रियतमा के पास भी होने का ) स्मरण, ( 'वैदेही' यह ) शब्द ओर 'कैसे होगी' यह विकल्प या वितर्क, इन सबों की परम्परा से प्रत्यक्ष हुई एवं हृदय के स्फोटनार्थ उन्मुख प्रियतमा से सम्भ्रम-सहित कहते हैं—हा हा देवि— । अर्थात् तुम्हें धैर्य धारण करना ठीक है । इससे— । भाव यह कि जिसका अर्थ उपयोग में नहीं आ रहा है ऐसे 'राम' शब्द से । व्यङ्ग्य धर्मान्तर अर्थात् राज्य से निर्वासन आदि असङ्ख्येय प्रयोजन रूप धर्मान्तर । और वह असंख्य होने के कारण अभिधाव्यापार से समर्पित ( अवगत ) होना सम्भव नहीं । क्रम से अर्प्यमाण ( अवगत ) होने पर भी, एक बुद्धि की विषयता के अभाव में चित्र ( विलक्षण ) चर्वणा के स्थान ( विषय ) को नहीं पहुँच सकता, ऐसी स्थिति में अतिशय चारुत्व को नहीं करता है । परन्तु वह असङ्ख्य प्रतीयमान अनुद्भिन्न होने की विशेषता के कारण ही क्या-क्या रूप नहीं सहन ( धारण ) करता ? इस प्रकार वह चित्रपानकरस, अपूप, गुड़ और मोदक की भाँति विचित्र चर्वणा का पद ( अधिष्ठान ) १२ ध्व०