भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

पृष्ठ 237, कुल 680 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 237

द्वितीय उद्योतः १७७ ध्वन्यालोकः इत्यत्र रामशब्दः । अनेन हि व्यङ्ग्यधर्मान्तरपरिणतः सञ्ज्ञी प्रत्याय्यते, न संज्ञिमात्रम् । यह 'राम' शब्द । इस ( 'राम' शब्द ) से व्यञ्जित होते हुए दूसरे धर्म से परिणत व्यक्ति प्रतीत कराया जाता है, केवल व्यक्ति नहीं । लोचनम् यथा 'तद्गेहम्' इत्युक्तेऽपि 'नतभित्ति' इति । अन्यथा रामपदं दशरथकुलोद्भव- त्वकौसल्यास्नेहपात्रत्वबाल्यचरितजानकीलाभादिधर्मान्तरपरिणतमर्थं कथं न ध्वनेदिति । अस्मीति । स एवाहं भवामीत्यर्थः । भविष्यतीति क्रियासामान्यम् । तेन किं करिष्यतीत्यर्थः । अथ च भवनमेवास्या असम्भाव्यमिति । उक्तप्रका- रेण हृदयनिहितां प्रियां स्मरणशब्दाविकल्पपरस्परया प्रत्यक्षीभावितां हृदयस्फो- टनोन्मुखीं ससंभ्रममाह—हहा हेति । देवीति । युक्तं तव धैर्यमित्यर्थः । अनेनेति । रामशब्देनानुपयुज्यमानार्थेनेति भावः । व्यङ्ग्यं धर्मान्तरं प्रयोजन- रूपं राज्यनिर्वासनाद्यसङ्ख्येयम् । तच्चासङ्ख्यत्वादभिधाव्यापारेणाशक्यसम- र्पणम् । क्रमेणार्प्यमाणमप्येकधीविषयभावाभावान्न चित्रचर्वणापदमिति न चारुत्वातिशयकृत् । प्रतीयमानं तु तदसङ्ख्यमनुद्भिन्नविशेषत्वेनैव किं किं रूपं न सहत इति चित्रपानकरसापूपगुडमोदकस्थानीयविचित्रचर्वणापदं भवति । यथोक्तम्—'उक्त्यन्तरेणाशक्यं यत्' इति । एष एव सर्वत्र प्रयोजनस्य प्रतीय- 'नतभित्ति' कहा है । अन्यथा 'राम' पद दशरथ के कुल में उत्पन्न होना, कौसल्या के स्नेह का पात्र होना, बाल्यचरित और जानकीलाभ आदि धर्मान्तर में परिणत अर्थ को कैसे नहीं ध्वनित करता ! 'हूँ' अर्थात् वही मैं हूँ । 'होगी' यह क्रिया सामान्य है, इससे अर्थ है कि फिर क्या करेगी ? और ऐसी स्थिति में उसका होना ( अस्तित्व ) ही असम्भव हो जायगा । कहे प्रकार के अनुसार ( मेघ आदि उद्दीपकों का प्रियतमा के पास भी होने का ) स्मरण, ( 'वैदेही' यह ) शब्द ओर 'कैसे होगी' यह विकल्प या वितर्क, इन सबों की परम्परा से प्रत्यक्ष हुई एवं हृदय के स्फोटनार्थ उन्मुख प्रियतमा से सम्भ्रम-सहित कहते हैं—हा हा देवि— । अर्थात् तुम्हें धैर्य धारण करना ठीक है । इससे— । भाव यह कि जिसका अर्थ उपयोग में नहीं आ रहा है ऐसे 'राम' शब्द से । व्यङ्ग्य धर्मान्तर अर्थात् राज्य से निर्वासन आदि असङ्ख्येय प्रयोजन रूप धर्मान्तर । और वह असंख्य होने के कारण अभिधाव्यापार से समर्पित ( अवगत ) होना सम्भव नहीं । क्रम से अर्प्यमाण ( अवगत ) होने पर भी, एक बुद्धि की विषयता के अभाव में चित्र ( विलक्षण ) चर्वणा के स्थान ( विषय ) को नहीं पहुँच सकता, ऐसी स्थिति में अतिशय चारुत्व को नहीं करता है । परन्तु वह असङ्ख्य प्रतीयमान अनुद्भिन्न होने की विशेषता के कारण ही क्या-क्या रूप नहीं सहन ( धारण ) करता ? इस प्रकार वह चित्रपानकरस, अपूप, गुड़ और मोदक की भाँति विचित्र चर्वणा का पद ( अधिष्ठान ) १२ ध्व०