ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१७८ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः यथा च ममैव विषमबाणलीलायाम्— ताला जाअन्ति गुणा जाला दे सहिअएहिं घेप्पन्ति । रइकिरणानुग्गहिआइँ होन्ति कमलाइँ कमलाइँ ॥ ( तदा जायन्ते गुणा यदा ते सहृदयैर्गृह्यन्ते । रविकिरणानुगृहीतानि भवन्ति कमलानि कमलानि ॥ इति च्छाया) इत्यत्र द्वितीयः कमलशब्दः । और जैसे, मेरा ही ( उदाहरण श्लोक ) 'विषमबाणलीला' में— तब गुण होते हैं जब सहृदय लोग ग्रहण करते हैं, सूर्य की किरणों से अनुगृहीत होकर ही कमल कमल होते हैं । यहाँ दूसरा 'कमल' शब्द । लोचनम् मानत्वेनोत्कर्षहेतुर्मन्तव्यः । मात्रग्रहणेन संज्ञी नात्र तिरस्कृत इत्याह । यथा चेत्यादि । ताला तदा । जाला यदा । घेप्पन्ति गृह्यन्ते । अर्थान्तरन्यासमाह— रविकिरणेति । कमलशब्द इति । लक्ष्मीपात्रत्वादिधर्मान्तरशतचित्रतापरिणतं संज्ञिनमाहेत्यर्थः । तेन शुद्धेऽर्थे मुख्ये बाधानिमित्तं तत्रार्थे तद्धर्मसमवायः । तेन निमित्तेन रामशब्दो धर्मान्तरपरिणतमर्थं लक्षयति । व्यङ्ग्यान्यसाधारणा- न्यशब्दवाच्यानि धर्मान्तराणि । एवं कमलशब्दः । गुणशब्दस्तु संज्ञिमात्रमा- हेति । तत्र यद्बलात्कैश्चिदारोपितं तदप्रातीतिकम् । अनुप्रयोगबाधितो ह्यर्थोऽस्य ध्वनेर्विषयो लक्षणा मूलं ह्यस्य । होता है । जैसा कि कहा है—दूसरी उक्ति से अशक्य जिस चारुत्व को०— । प्रयोजन के प्रतीयमान होने के कारण उत्कर्ष का हेतु इसे ( अर्थात् विचित्र चर्वणा विषयत्व ) ही मानना चाहिए । 'मात्र' ग्रहण से कहते हैं कि संज्ञी (राम) यहाँ तिरस्कृत नहीं है । और जैसे— । ताला तब । जाला जब । घेप्पन्ति ग्रहण किए जाते हैं ( सामान्य के समर्थन रूप ) 'अर्थान्तरन्यास' को कहते हैं—सूर्य की किरणों से— । 'कमल' शब्द— । अर्थात् लक्ष्मी या शोभा का पात्रत्व—आश्रय होना आदि धर्मान्तरों की सैकड़ों विचित्रताओं में परिणत संज्ञावान् ( कमल ) को कहता है । इस लिए शुद्ध मुख्य अर्थ में बाधा का कारण उस अर्थ में (अर्थात् 'राम' पद के मुख्यार्थ के धर्मी राम में ) उन धर्मों का समवाय (सम्बन्ध) है । उस निमित्त से 'राम' शब्द धर्मान्तर में परिणत अर्थ को लक्षित करता है । असाधारण एवं अशब्दवाच्य धर्मान्तर ( निर्वेद, ग्लानि आदि )—व्यङ्ग्य हैं । इसी प्रकार 'कमल' शब्द है । ( दूसरे श्लोक में ) 'गुण' शब्द केवल संज्ञी को अभिहित करता है । उक्त उदाहरणों में जो बल-पूर्वक कुछ