ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वितीय उद्योतः १७९ लोचनम् यत्तु हृदयदर्पण उक्तम्—‘हहा हेति संरम्भार्थोऽयं चमत्कारः’ इति । तत्रापि संरम्भः आवेगो विप्रलम्भव्यभिचारीति रसध्वनिस्तावदुपगतः । न च राम- शब्दाभिव्यक्तार्थसाहायकेन विना संरम्भोल्लासोऽपि । अहं सहे तस्याः किं वर्तत इत्येवमात्मा हि संरम्भः । कमलपदे च कः संरम्भ इत्यास्तां तावत् । अनुपयोगात्मिका च मुख्यार्थबाधात्रास्तीति लक्षणामूलत्वादविवक्षितवाच्यभेद- लोगों ने आरोप करके कहा है', वह प्रतीतिसिद्ध नहीं । क्योंकि अनुपयोग रूप बाधा के कारण अर्थ रस ध्वनि का विषय होता है, उसका मूल लक्षणा है । जो कि ‘हृदयदर्पण' में कहा है—‘हहा हा' यह ‘संरम्भ’२ के अर्थ में यह चमत्कार व्यक्त किया है ।’ वहाँ भी संरम्भ या आवेग विप्रलम्भ का व्यभिचारी है इस प्रकार ‘रसध्वनि' स्वीकार किया है । ‘राम’ शब्द से अभिव्यक्त अर्थों की सहायता के बिना संरम्भ का उल्लास भी नहीं होगा । ‘मैं तो सह लेता हूँ' परन्तु उसका क्या होगा ? इस प्रकार का संरम्भ है । ‘कमल’ पद में कौन ‘संरम्भ’ है ? अतः इसे रहने दीजिए ! अनुपयोगरूप मुख्यार्थ बाधा यहाँ है, इस लिए लक्षणामूल होने के कारण इसका अविवक्षितवाच्य ध्वनि का भेद होना उपपन्न ही है क्योंकि शुद्ध ( मुख्य अर्थ ) की १. जैसा कि प्रस्तुत उदाहरणों में ‘राम' शब्द और ‘कमल’ शब्द अनुपयुक्त होने के कारण बाधितार्थ होकर लक्षणा के द्वारा धर्मान्तर में परिणत अर्थ को लक्षित करते हैं, तो इसका अर्थ यह नहीं कि व्यञ्जित होते-होते सभी धर्मान्तरों को लक्षणा के द्वारा ही प्रतीत किया जाय । कुछ लोगों ने बलात् लक्षणा द्वारा ही प्रतीत करने की कोशिश की थी । किन्तु यह प्रकार सहृदय जनों की प्रतीति के विरुद्ध है । कारण यह है कि लक्षणा से एक ही धर्म से अन्वित की प्रतीति हो सकती है, क्योंकि लक्षणा की इसी अंश में सार्थकता है कि वह शब्द के ‘अनुपयोग’ को हटा दे और उपयुक्त अर्थ को प्रस्तुत कर दे । किन्तु लक्षणा द्वारा उपयुक्त अर्थ के प्रतीत होने के पश्चात् भी जब अनेक धर्मान्तर प्रतीत होने लगते हैं तब उन्हें भी विरत-व्यापार लक्षणा का विषय किसी प्रकार नहीं माना जा सकता । अतः यहाँ अनेक धर्मान्तरों को प्रस्तुत अविवक्षितवाच्यध्वनि का विषय मानते हैं, जिसका मूल लक्षणा है । इस प्रकार लक्षणा यहाँ सहकारिणी शक्ति है । २. ‘हहा हा’ इस चमत्कार के प्रयोग से संरम्भ या आवेग व्यक्त होता है । यही श्लोक का विशेष लक्ष्य है । यह बात ‘हृदयदर्पण’ में कही गई है । इसका यह अभिप्राय है कि जो यहाँ ‘राम’ शब्द की व्यञ्जकता की चर्चा है वह अनावश्यक है । इस पर लोचनकार का कहना है कि जो यहाँ ‘संरम्भ’ या आवेग का आप अनुभव करते हैं, वह भी तो विप्रलम्भ-शृङ्गार का व्यभिचारी है ! अतः आप ने स्वयं ‘रसध्वनि' को स्वीकार कर लिया है । और साथ ही, यह संरम्भ भी ‘राम’ शब्द से अभिव्यक्त अर्थों की सहायता के बिना उल्लसित नहीं होगा । क्योंकि राम में आवेग तभी आ सकता है जब वह अपनी समर्थता को और सीता की असमर्थता को अनुभव करेंगे । अतः ‘राम’ पद की व्यञ्जना यह ‘संरम्भ’ के उल्लास की सहायिका है । और, माना कि यह यहाँ ‘संरम्भ’ है किन्तु दूसरे उदाहरण के ‘कमल’ पद में कौन सा ‘संरम्भ’ है ? अन्ततः यह मानना ही पड़ेगा । कि इन उदाहरणों में अनुपयोगात्मक मुख्यार्थ बाधा है, अतः लक्षणामूलक अविवक्षितवाच्य ध्वनि का यह अर्थान्तरसङ्क्रमितवाच्य रूप एक भेद है । यहाँ ‘राम’ और ‘कमल’ शब्द के केवल शुद्ध या वाच्य अर्थ की विवक्षा ही नहीं ।