भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

पृष्ठ 240, कुल 680 में से

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पृष्ठ 240

१८० सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः अत्यन्ततिरस्कृतवाच्यो यथादिकवेर्वाल्मीकेः— रविसंक्रान्तसौभाग्यस्तुषारावृतमण्डलः । निःश्वासान्ध इवादर्शश्चन्द्रमा न प्रकाशते ॥ इति । अत्यन्ततिरस्कृतवाच्य, जैसे आदिकवि वाल्मीकि का— सूर्य में जिसका सौभाग्य संक्रान्त हो गया है, एवं तुषार से जिसका मण्डल ढँक गया है, ऐसा चन्द्रमा निःश्वास से अन्ध आइने की भांति प्रकाशवान् नहीं है। लोचनम् तास्योपपन्नैव, शुद्धार्थस्याविवक्षणात् । न च तिरस्कृतत्वं धर्मिरूपेण, तस्यापि तावत्यनुगमात् । अत एव च परिणतवाचोयुक्त्या व्यवहृतम्–आदिकवेरिति । ध्वनेर्लक्ष्यप्रसिद्धतामाह–रवीति । हेमन्तवर्णने पञ्चवट्यां रामस्योक्तिरियम् । अन्ध इति चोपहतदृष्टिः । जात्यन्धस्यापि गर्भे दृष्ट्युपघातात् । अन्धोऽयं पुरोऽपि न पश्यतीत्यत्र तिरस्कारोऽन्धार्थस्य न त्वत्यन्तम् । इह त्वादृशस्यान्ध- त्वमारोप्यमाणमपि न सह्यमिति । अन्धशब्दोऽत्र पदार्थस्फुटीकरणाशक्तत्वं नष्टदृष्टिगतं निमित्तीकृत्यादर्शं लक्षणया प्रतिपादयति । असाधारणविच्छायत्वा- नुपयोगित्वादिधर्मजातमसंख्यं प्रयोजनं व्यनक्ति । भट्टनायकेन तु यदुक्तम्— विवक्षा यहाँ नहीं है। (अत्यन्त तिरस्कृतवाच्य ध्वनि में) धर्मी (व्यक्ति) रूप से तिरस्कार नहीं है, क्योंकि उस धर्मी (व्यक्ति) का भी अनुगम (ज्ञान) होता है। इसीलिए 'परिणत' इस वाचोयुक्ति से व्यवहार किया है। आदिकवि— । 'ध्वनि' की लक्ष्य में प्रसिद्धि को कहते हैं—सूर्य— । हेमन्तवर्णन के प्रसङ्ग में पञ्चवटी में राम की यह उक्ति है। 'अन्ध' अर्थात् जिसकी दृष्टि नष्ट हो गई हो। क्योंकि जो जात्यन्ध होता है, उसकी भी दृष्टि का गर्भ में उपघात (नाश) हो जाता है। 'यह अन्धा आगे भी नहीं देखता है' इस कथन में 'अन्ध' शब्द के अर्थ का तिरस्कार है, किन्तु अत्यन्त रूप से (तिरस्कार) नहीं है। किन्तु यहाँ आइने का अन्धत्व आरोप्यमाण होकर भी सह्य नहीं। यहाँ 'अन्ध' शब्द नष्टदृष्टि पुरुष में रहने वाले किसी पदार्थ के स्फुटीकरण में अशक्यत्वरूप धर्म को निमित्त करके, आदर्श की लक्षणा से प्रतिपादन करता है; इस प्रकार असाधारण छायाहीनत्व और अनुपयोगित्व आदि असङ्ख्य धर्म-समूह रूप प्रयोजन को (वह) व्यक्त करता है। परन्तु भट्टनायक ने जो कहा है—'इव' शब्द के योग के कारण गौणता' (गौणी १. 'अत्यन्ततिरस्कृतवाच्य' का यह अर्थ नहीं है कि धर्मी का तिरस्कार होता है, बल्कि लक्ष्य और व्यङ्ग्य अर्थों के ज्ञान में धर्मी का भी ज्ञान अनुप्रविष्ट होता है, अतः 'तिरस्कार' धर्म का ही अभीष्ट है, न कि धर्मी का। इसी लिए 'परिणतः' शब्द का प्रयोग आचार्य ने किया है, अर्थात् धर्मी स्वयं स्थित रहता हुआ अनेक व्यङ्ग्य धर्मान्तरों से परिणत रूप में प्रतीत होता है। २. अन्धा वह होता है जिसकी दोनों आँखें फूट गई हों और जो जन्मान्ध होता है उसकी