भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

पृष्ठ 241, कुल 680 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 241

द्वितीय उद्योतः १८१

ध्वन्यालोकः
अत्रान्धशब्दः ।
गअणं च मत्तमेहं धाराळुलिअज्जणाईं अ वणाईं ।
णिरहङ्कारमिअङ्का हरन्ति नीलाओ वि णिसाओ ॥
अत्र मत्तणिरहङ्कारशब्दौ ॥ १ ॥
यहाँ 'अन्ध' शब्द ।
मत्त मेघों से भरा आकाश भी, धारावृष्टि से कम्पित अर्जुन वृक्षों वाले वन भी
और निरहङ्कार चन्द्रवाली काली रातें भी मन को हर लेती हैं ॥
यहाँ 'मत्त' और 'निरहङ्कार' शब्द ।
लोचनम्
‘इवशब्दाप्रयोगाद् गौणताप्यत्र न काचित्’ इति, तच्छ्लोकार्थमपरामृश्य । आद-
र्शचन्द्रमसोर्हि सादृश्यमिवशब्दो द्योतयति । निःश्वासान्ध इति चादर्शविशेष-
णम् । इवशब्दान्धार्थेन योजने आदर्शश्चन्द्रमा इत्युदाहरणं भवेत् । योजनं
चैतदिवशब्दस्य क्लिष्टम् । न च निःश्वासेनान्ध इवादर्शः स इव चन्द्र इति
कल्पना युक्ता । जैमिनीये सूत्रे ह्येवं योज्यते न काव्येऽपीत्यलम् । गअणमिति ।
लक्षणा) भी यहाँ नहीं सम्भव है', वह श्लोकार्थ को विचार करके नहीं (कहा है)।
आदर्श (आइना) और चन्द्रमा इन दोनों का सादृश्य 'इव' शब्द द्योतित करता है।
और 'निःश्वासान्ध' यह आदर्श (आइना) का विशेषण है। 'इव' शब्द को 'अन्ध'
अर्थ के साथ जोड़ने में 'आदर्श रूप चन्द्रमा' यह उदाहरण होगा। लेकिन 'इव' शब्द का
यह योजना क्लिष्ट है। 'निःश्वास से अन्ध के समान आदर्श और उसके समान चन्द्रमा'
यह कल्पना भी ठीक नहीं । 'जैमिनीयसूत्र' में इस प्रकार योजना होती है, न कि
---------------------------------------------------------------------------------------------------------
आँखें गर्भ में ही फूट गई होती हैं। किन्तु आदर्श का अन्धत्व कदापि सम्भव नहीं, यदि आदर्श
पर अन्धत्व का आरोप भी किया जाय तब भी सह्य नहीं। अतः इस अर्थ का तिरस्कार कर देते हैं
और जिसके पास आँखें नहीं होती हैं वह किसी भी पदार्थ को नहीं स्पष्ट कर सकता इस पदार्थ-
स्फुटीकरणाशक्यत्व रूप अर्थ को निमित्त करके वही 'अन्ध' शब्द आदर्श को लक्षणा से बोधन
करता है। इस प्रकार यहाँ छायाहीनत्व, अनुपयोगित्व आदि अनेक धर्मसमूह प्रयोजन के रूप
में प्रतीयमान हैं। यहाँ 'अन्ध' शब्द के अर्थ के तिरस्कृत हो जाने के कारण प्रस्तुत ध्वनि को
'अत्यन्ततिरस्कृतवाच्य' कहा है।
भट्टनायक ने 'अन्ध' अर्थ के से 'इव' शब्द को जोड़ कर यहाँ गौणी लक्षणा का भी निषेध
किया है। क्योंकि आदर्श अन्धा के समान हो ही सकता है, ऐसी स्थिति में मुख्यार्थ-बाध न होने
के कारण लक्षणा का प्रसंग नहीं होगा। किन्तु उन्होंने श्लोक के अर्थ का विचार नहीं किया है।
यहाँ 'निःश्वासान्ध' शब्द आदर्श का विशेषण है, ऐसी स्थिति में 'इव' का योग उसके साथ नहीं
होगा, यदि करते हैं तो यह योजना क्लिष्ट एवं अनुपयुक्त है। ऐसी कल्पना तो भट्टनायक अपने
'मीमांसा शास्त्र' में ही करें तो अच्छा है, काव्य में इसे अच्छा नहीं समझा जाता। अतः यहाँ