भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

पृष्ठ 242, कुल 680 में से

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१८४ सलोचन-ध्वन्यालोकः लोचनम् गगनं च मत्तमेघं धारालुलितार्जुनानि च वनानि । निरहङ्कारमृगाङ्का हरन्ति नीला अपि निशाः ॥ इति च्छाया । चशब्दोऽपिशब्दार्थे । गगनं मत्तमेघमपि न केवलं तार- कितम् । धारालुलितार्जुनवृक्षाण्यपि वनानि न केवलं मलयमारुतान्दोलितसह- काराणि । निरहङ्कारमृगाङ्का नीला अपि निशा न केवलं सितकरकरधवलिताः । हरन्ति उत्सुकयन्तीत्यर्थः । मत्तशब्देन सर्वथैवेहासम्भवत्स्वार्थेन बाधितमद्यो- पयोगक्षीबात्मकमुख्यार्थेन सादृश्यान्मेघाँल्लक्षयताऽसमञ्जसकारित्वदुर्निवारत्वा- दिधर्मसहस्रं ध्वन्यते । निरहङ्कारशब्देनापि चन्द्रं लक्षयता तत्पारतन्त्र्यविच्छा- यत्वोज्जिगमिषारूपजिगीषात्यागप्रभृतिः ॥ १ ॥ अविवक्षितवाच्यस्य प्रभिन्नत्वमिति यदुक्तं तत्कृतः ? न हि स्वरूपादेव भेदो भवतीत्याशङ्क्य विवक्षितवाच्यादेवाश्य भेदो भवति, विवक्षा तदभावयो- काव्य में भी— । अलम् । आकाश— । 'और' ( च ) शब्द 'भी' ( अपि ) शब्द के अर्थ में है । मतवाले मेघों वाला भी आकाश, न केवल तारों भरा । धारावृष्टि से कम्पित अर्जुन वृक्षों वाले वन, न केवल मलयमारुत से कम्पित सहकार वृक्षों वाले । अहङ्कार- हीन चन्द्रवाली काली भी रातें, न केवल चन्द्र की किरणों से धवलित । हर लेती हैं अर्थात् उत्सुक करती हैं । यहाँ 'मत्त'१ शब्द, जिसका अर्थ सर्वथा ही सम्भव नहीं हो रहा है और जिसका मुख्य अर्थ मद्य ( मदिरा ) के उपयोग से क्षीब ( पागल ) रूप होने के कारण बाधित है, सादृश्य सम्बन्ध से मेघों को लक्षित कर रहा है, जिससे असमञ्जसकारित्व दुर्निवारत्व आदि हजारों धर्म ध्वनित होते हैं । चन्द्र को लक्षित करता हुआ 'निरहङ्कार' शब्द भी उसमें पारतन्त्र्य, छायाहीनत्व, उदय लेने की इच्छा रूप जिगमिषा का त्याग प्रभृति को ध्वनित करता है ॥ १ ॥ जो कि ( आरम्भ के वृत्तिग्रन्थ में ) 'अविवक्षितवाच्य का प्रभेद' यह कहा है वह कैसे ? क्योंकि स्वरूप से ही ( स्वयं अपने से ही अपना ) भेद नहीं होता, ऐसी आशङ्का करके इस अभिप्राय से, कि विवक्षितवाच्य से ही इस ( अविवक्षितवाच्य ) का भेद है, क्योंकि विवक्षा के भाव और अभाव दोनों का विरोध है, कहते हैं— लक्षणा सर्वथा उपपन्न है । तात्पर्य यह कि 'इव' शब्द 'चन्द्रमा' के साथ अन्वित होगा । यहाँ चन्द्रमा आदर्श के समान है, न कि अन्ध के समान आदर्श है । इस प्रकार 'अन्ध' शब्द अपने वाच्यार्थ के बाधित होने पर लक्षणा से आदर्श का बोधन करता है और प्रयोजन रूप छायाहीनत्व आदि अनेक धर्म प्रतीयमान होते हैं । १. 'मत्त' और 'अहङ्कार' के मुख्य अर्थ प्रस्तुत में अनुपपन्न हैं, क्योंकि मेघ तो जड़ है मत्त कैसे होगा और चन्द्रमा भी अहङ्कार कैसे करेगा ? इस प्रकार ये शब्द सादृश्य से लक्षणा द्वारा क्रमशः मेघ और चन्द्र को लक्षित करते हैं और तब उनसे अनेक निर्दिष्ट धर्म प्रतीयमान होते हैं । यहाँ भी मुख्यार्थ का तिरस्कार है ।

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