ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
द्वितीय उद्योतः १८१
ध्वन्यालोकः
अत्रान्धशब्दः ।
गअणं च मत्तमेहं धाराळुलिअज्जणाईं अ वणाईं ।
णिरहङ्कारमिअङ्का हरन्ति नीलाओ वि णिसाओ ॥
अत्र मत्तणिरहङ्कारशब्दौ ॥ १ ॥
यहाँ 'अन्ध' शब्द ।
मत्त मेघों से भरा आकाश भी, धारावृष्टि से कम्पित अर्जुन वृक्षों वाले वन भी
और निरहङ्कार चन्द्रवाली काली रातें भी मन को हर लेती हैं ॥
यहाँ 'मत्त' और 'निरहङ्कार' शब्द ।
लोचनम्
‘इवशब्दाप्रयोगाद् गौणताप्यत्र न काचित्’ इति, तच्छ्लोकार्थमपरामृश्य । आद-
र्शचन्द्रमसोर्हि सादृश्यमिवशब्दो द्योतयति । निःश्वासान्ध इति चादर्शविशेष-
णम् । इवशब्दान्धार्थेन योजने आदर्शश्चन्द्रमा इत्युदाहरणं भवेत् । योजनं
चैतदिवशब्दस्य क्लिष्टम् । न च निःश्वासेनान्ध इवादर्शः स इव चन्द्र इति
कल्पना युक्ता । जैमिनीये सूत्रे ह्येवं योज्यते न काव्येऽपीत्यलम् । गअणमिति ।
लक्षणा) भी यहाँ नहीं सम्भव है', वह श्लोकार्थ को विचार करके नहीं (कहा है)।
आदर्श (आइना) और चन्द्रमा इन दोनों का सादृश्य 'इव' शब्द द्योतित करता है।
और 'निःश्वासान्ध' यह आदर्श (आइना) का विशेषण है। 'इव' शब्द को 'अन्ध'
अर्थ के साथ जोड़ने में 'आदर्श रूप चन्द्रमा' यह उदाहरण होगा। लेकिन 'इव' शब्द का
यह योजना क्लिष्ट है। 'निःश्वास से अन्ध के समान आदर्श और उसके समान चन्द्रमा'
यह कल्पना भी ठीक नहीं । 'जैमिनीयसूत्र' में इस प्रकार योजना होती है, न कि
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आँखें गर्भ में ही फूट गई होती हैं। किन्तु आदर्श का अन्धत्व कदापि सम्भव नहीं, यदि आदर्श
पर अन्धत्व का आरोप भी किया जाय तब भी सह्य नहीं। अतः इस अर्थ का तिरस्कार कर देते हैं
और जिसके पास आँखें नहीं होती हैं वह किसी भी पदार्थ को नहीं स्पष्ट कर सकता इस पदार्थ-
स्फुटीकरणाशक्यत्व रूप अर्थ को निमित्त करके वही 'अन्ध' शब्द आदर्श को लक्षणा से बोधन
करता है। इस प्रकार यहाँ छायाहीनत्व, अनुपयोगित्व आदि अनेक धर्मसमूह प्रयोजन के रूप
में प्रतीयमान हैं। यहाँ 'अन्ध' शब्द के अर्थ के तिरस्कृत हो जाने के कारण प्रस्तुत ध्वनि को
'अत्यन्ततिरस्कृतवाच्य' कहा है।
भट्टनायक ने 'अन्ध' अर्थ के से 'इव' शब्द को जोड़ कर यहाँ गौणी लक्षणा का भी निषेध
किया है। क्योंकि आदर्श अन्धा के समान हो ही सकता है, ऐसी स्थिति में मुख्यार्थ-बाध न होने
के कारण लक्षणा का प्रसंग नहीं होगा। किन्तु उन्होंने श्लोक के अर्थ का विचार नहीं किया है।
यहाँ 'निःश्वासान्ध' शब्द आदर्श का विशेषण है, ऐसी स्थिति में 'इव' का योग उसके साथ नहीं
होगा, यदि करते हैं तो यह योजना क्लिष्ट एवं अनुपयुक्त है। ऐसी कल्पना तो भट्टनायक अपने
'मीमांसा शास्त्र' में ही करें तो अच्छा है, काव्य में इसे अच्छा नहीं समझा जाता। अतः यहाँ
१८४ सलोचन-ध्वन्यालोकः लोचनम् गगनं च मत्तमेघं धारालुलितार्जुनानि च वनानि । निरहङ्कारमृगाङ्का हरन्ति नीला अपि निशाः ॥ इति च्छाया । चशब्दोऽपिशब्दार्थे । गगनं मत्तमेघमपि न केवलं तार- कितम् । धारालुलितार्जुनवृक्षाण्यपि वनानि न केवलं मलयमारुतान्दोलितसह- काराणि । निरहङ्कारमृगाङ्का नीला अपि निशा न केवलं सितकरकरधवलिताः । हरन्ति उत्सुकयन्तीत्यर्थः । मत्तशब्देन सर्वथैवेहासम्भवत्स्वार्थेन बाधितमद्यो- पयोगक्षीबात्मकमुख्यार्थेन सादृश्यान्मेघाँल्लक्षयताऽसमञ्जसकारित्वदुर्निवारत्वा- दिधर्मसहस्रं ध्वन्यते । निरहङ्कारशब्देनापि चन्द्रं लक्षयता तत्पारतन्त्र्यविच्छा- यत्वोज्जिगमिषारूपजिगीषात्यागप्रभृतिः ॥ १ ॥ अविवक्षितवाच्यस्य प्रभिन्नत्वमिति यदुक्तं तत्कृतः ? न हि स्वरूपादेव भेदो भवतीत्याशङ्क्य विवक्षितवाच्यादेवाश्य भेदो भवति, विवक्षा तदभावयो- काव्य में भी— । अलम् । आकाश— । 'और' ( च ) शब्द 'भी' ( अपि ) शब्द के अर्थ में है । मतवाले मेघों वाला भी आकाश, न केवल तारों भरा । धारावृष्टि से कम्पित अर्जुन वृक्षों वाले वन, न केवल मलयमारुत से कम्पित सहकार वृक्षों वाले । अहङ्कार- हीन चन्द्रवाली काली भी रातें, न केवल चन्द्र की किरणों से धवलित । हर लेती हैं अर्थात् उत्सुक करती हैं । यहाँ 'मत्त'१ शब्द, जिसका अर्थ सर्वथा ही सम्भव नहीं हो रहा है और जिसका मुख्य अर्थ मद्य ( मदिरा ) के उपयोग से क्षीब ( पागल ) रूप होने के कारण बाधित है, सादृश्य सम्बन्ध से मेघों को लक्षित कर रहा है, जिससे असमञ्जसकारित्व दुर्निवारत्व आदि हजारों धर्म ध्वनित होते हैं । चन्द्र को लक्षित करता हुआ 'निरहङ्कार' शब्द भी उसमें पारतन्त्र्य, छायाहीनत्व, उदय लेने की इच्छा रूप जिगमिषा का त्याग प्रभृति को ध्वनित करता है ॥ १ ॥ जो कि ( आरम्भ के वृत्तिग्रन्थ में ) 'अविवक्षितवाच्य का प्रभेद' यह कहा है वह कैसे ? क्योंकि स्वरूप से ही ( स्वयं अपने से ही अपना ) भेद नहीं होता, ऐसी आशङ्का करके इस अभिप्राय से, कि विवक्षितवाच्य से ही इस ( अविवक्षितवाच्य ) का भेद है, क्योंकि विवक्षा के भाव और अभाव दोनों का विरोध है, कहते हैं— लक्षणा सर्वथा उपपन्न है । तात्पर्य यह कि 'इव' शब्द 'चन्द्रमा' के साथ अन्वित होगा । यहाँ चन्द्रमा आदर्श के समान है, न कि अन्ध के समान आदर्श है । इस प्रकार 'अन्ध' शब्द अपने वाच्यार्थ के बाधित होने पर लक्षणा से आदर्श का बोधन करता है और प्रयोजन रूप छायाहीनत्व आदि अनेक धर्म प्रतीयमान होते हैं । १. 'मत्त' और 'अहङ्कार' के मुख्य अर्थ प्रस्तुत में अनुपपन्न हैं, क्योंकि मेघ तो जड़ है मत्त कैसे होगा और चन्द्रमा भी अहङ्कार कैसे करेगा ? इस प्रकार ये शब्द सादृश्य से लक्षणा द्वारा क्रमशः मेघ और चन्द्र को लक्षित करते हैं और तब उनसे अनेक निर्दिष्ट धर्म प्रतीयमान होते हैं । यहाँ भी मुख्यार्थ का तिरस्कार है ।
द्वितीय उद्योतः १८३
ध्वन्यालोकः
असंलक्ष्यक्रमोद्द्योतः क्रमेण द्योतितः परः ।
विवक्षिताभिधेयस्य ध्वनेरात्मा द्विधा मतः ॥ २ ॥
मुख्यतया प्रकाशमानो व्यङ्ग्योऽर्थो ध्वनेरात्मा । स च वाच्यार्था-
पेक्षया कश्चिदलक्ष्यक्रमतया प्रकाशते, कश्चित्क्रमेणेति द्विधा मतः ॥२॥
तत्र
रसभावतदाभासतत्प्रशान्त्यादिरक्रमः ।
ध्वनेरात्माङ्गिभावेन भासमानो व्यवस्थितः ॥ ३ ॥
जिसका अभिधेय विवक्षित है, ऐसा ध्वनि दो प्रकार का होता है, एक वह जिसके
व्यङ्ग्य का क्रम संलक्षित नहीं होता है, दूसरी वह जिसके व्यङ्ग्य का क्रम संलक्षित
होता है ॥ २ ॥
मुख्य रूप से प्रकाशमान व्यङ्ग्य अर्थ ध्वनि का आत्मा है । वह कोई वाच्य अर्थ
की अपेक्षा अलक्ष्यक्रम रूप से प्रकाशित होता है और कोई क्रम से, इस प्रकार दो
प्रकार भी माना गया है । वहाँ—
अङ्गी रूप से भासमान ध्वनि का आत्मा ( स्वरूप ) रस, भाव, रसाभास, भावा-
भास, भावप्रशम, भावशान्ति, आदि अक्रम ( असंलक्ष्यक्रम ) रूप से व्यवस्थित है ।
लोचनम्
विरोधादित्यभिप्रायेणाह—असंलक्ष्येति । सम्यङ् न लक्षयितुं शक्यः क्रमो यस्य
तादृश उद्द्योत उद्द्योतनव्यापारोऽस्येति बहुव्रीहिः । ध्वनिशब्दसान्निध्याद्विव-
क्षिताभिधेयत्वेनान्यपरत्वमत्राक्षिप्तमिति स्वकण्ठेन नोक्तम् । ध्वनेरिति । व्यङ्ग्य-
स्येत्यर्थः । आत्मेति । पूर्वश्लोकेन व्यङ्ग्यस्य वाच्यमुखेन भेद उक्तः । इदानीं तु
द्योतनव्यापारमुखेन द्योत्यस्य स्वात्मनिष्ठ एवेत्यर्थः । व्यङ्ग्यस्य ध्वनेर्द्योतने
स्वात्मनि कः क्रम इत्याशङ्क्याह—वाच्यार्थापेक्षयेति । वाच्योऽर्थो विभावादिः ॥
तत्रेति । तयोर्मध्यादित्यर्थः । यो रसादिरर्थः स एवाक्रमो ध्वनेरात्मा न
असंलक्ष्य— । सम्यक् प्रकार से लक्षित न किया जा सके क्रम जिसका उस प्रकार का
उद्योत अर्थात् उद्योतनव्यापार वाला, यह ‘बहुव्रीहि’ समास है । ‘ध्वनि’ शब्द के
सान्निध्य से, अभिधेय के विवक्षित होने के कारण ‘अन्यपरत्व’ आक्षेपतः यहाँ आ
जाता है, अतः उसे कण्ठतः नहीं कहा है । ध्वनि का— । अर्थात् व्यङ्ग्य का ।
आत्मा— । पहले श्लोक से व्यङ्ग्य का वाच्य के प्रकार से भेद कहा है । किन्तु अब
द्योतन व्यापार के प्रकार से द्योत्य अर्थात् व्यङ्ग्य का स्वात्मनिष्ठ भेद ही कहते हैं,
यह अर्थ है । व्यङ्ग्य ध्वनि के द्योतन में, स्वयं में कौन—सा क्रम है ? यह आशङ्का
करके कहते हैं—वाच्य अर्थ की अपेक्षा से । वाच्य अर्थ विभाव आदि ।
वहाँ— । अर्थात् उन दोनों में से । जो रसादिरूप अर्थ है वही अक्रम होकर
१८४ सलोचन-ध्वन्यालोकः लोचनम् त्वक्रम एव सः । क्रमत्वमपि हि तस्य कदाचिद्भवति । तदा चार्थशक्त्युद्द्भवा- नुस्वानरूपभेदेतेति वक्ष्यते । आत्मशब्दः स्वभाववचनः प्रकारमाह । तेन रसादिर्योऽर्थः स ध्वनेरक्रमो नाम भेदः । असंलक्ष्यक्रम इति यावत् । ननु किं सर्वदैव रसादिरर्थो ध्वनेः प्रकारः ? नेत्याह; किं तु यदाङ्गित्वेन प्रधानत्वे- नावभासमानः । एतच्च सामान्यलक्षणे 'गुणीकृतस्वार्थावि'त्यत्र यद्यपि निरू- पितम्, तथापि रसवदाद्यलङ्कारप्रकाशनावकाशदानायानूदितम् । स च रसा- दिर्ध्वनिर्व्यवस्थित एव; न हि तच्छून्यं काव्यं किञ्चिदस्ति । यद्यपि च रसेनेव सर्वं जीवति काव्यम्, तथापि तस्य रसस्यैकघनचमत्कारात्मकस्यापि कुतश्चिदं- शात्प्रयोजकीभूतादधिकोऽसौ चमत्कारो भवति । तत्र यदा कश्चिदुद्रिक्तावस्थां प्रतिपन्नो व्यभिचारी चमत्कारातिशयप्रयोजको भवति, तदा भावध्वनिः । यथा- तिष्ठेत्कोपवशात्प्रभावपिहिता दीर्घं न सा कुप्यति स्वर्गायोत्पतिता भवेन्मयि पुनर्भावार्द्रमस्या मनः । तां हर्तुं विबुधद्विषोऽपि न च मे शक्ताः पुरोवर्तिनीं सा चात्यन्तमगोचरं नयनयोर्यातेति कोऽयं विधिः ॥ अत्र हि विप्रलम्भरससद्भावेऽपीति वितर्काख्यव्यभिचारिचमत्क्रियाप्रयुक्त आस्वादातिशयः । व्यभिचारिण उदयस्थित्यपायत्रिधर्मकाः । यदाह—'विविध- ध्वनि का आत्मा है, न कि वह अक्रम ही है, क्योंकि उसका कभी क्रमत्व भी होता है । तब अर्थ रूप शक्ति से उत्पन्न अनुरणन रूप भेद होता है, यह कहेंगे । स्वभाव के अर्थ में 'आत्मा' शब्द प्रकार बताता है । उससे, रसादि रूप जो अर्थ है वह ध्वनि का अक्रम नामक भेद है, अर्थात् असंलक्ष्यक्रम है । शङ्का है कि क्या रसादि अर्थ हमेशा ही ध्वनि का प्रकार है ? उत्तर में कहते हैं कि, नहीं । किन्तु जब अङ्गी या प्रधान रूप से प्रतीत होता है, ( तब ध्वनि का प्रकार है) । इस बात को यद्यपि ( ध्वनि के ) सामान्य लक्षण में 'गुणीकृतस्वार्थों०' इस स्थल पर निरूपण कर दिया है, तथापि रसवत् आदि अलङ्कारों के प्रकाशन का अवकाश देने के लिए अनुवाद किया है। वह रस आदि ध्वनि के रूप में व्यवस्थित ही है, क्योंकि उससे शून्य काव्य कोई चीज नहीं है । यद्यपि रस से ही सारा काव्य जीवित रहता है, तथापि एकघन चमत्कार रूप भी उस रस के कहीं प्रयोजक अंश से अधिक चमत्कार होता है । वहाँ जब कोई व्यभिचारी भाव उद्रिक्त या निष्पन्न अवस्था को प्राप्त करके अतिशय चमत्कार का प्रयोजक होता है, तब भावध्वनि होता है । जैसे— वह ( उर्वशी ) भले ही कुछ कोप से अन्तर्हित हो जाय पर वह अधिक कुपित नहीं होती, भले ही वह स्वर्ग चली गई हो, फिर भी उसका मन मेरे प्रति भावार्द्र है, मेरे सामने स्थित उसे असुर भी हरण नहीं कर सकते, और वह आँखों के अत्यन्त अविषय हो गई है, यह कैसा प्रकार है ? यहाँ विप्रलम्भ रस के होने पर भी वितर्क नामक व्यभिचारी भाव के चमत्कार से प्रयुक्त अतिशय आस्वाद हो रहा है । व्यभिचारी भावों के तीन धर्म हैं—उदय,
द्वितीय उद्योतः १८५ लोचनम् माभिमुख्येन चरन्तीति व्यभिचारिणः' इति। तत्रोदयावस्थाप्रयुक्तः कदा- चित्। यथा— याते गोत्रविपर्यये श्रुतिपथं शय्यामनुप्राप्तया निर्ध्यांतं परिवर्तनं पुनरपि प्रारब्धुमङ्गीकृतम्। भूयस्तत्प्रकृतं कृतं च शिथिलक्षिप्तैकदोर्लेखया तन्वङ्ग्या न तु पारितः स्तनभरः क्रष्टुं प्रियस्योरसः॥ अत्र हि प्रणयकोपस्योज्जिगमिषतैव यदवस्थानं न तु पारित इत्युदयाव- काशनिराकरणात्तदेवास्वादजीवितम्। स्थितिः पुनरुदाहृता—'तिष्ठेत्कोपवशात्' इत्यादिना। क्वचित्तु व्यभिचारिणः प्रशमावस्थया प्रयुक्तश्चमत्कारः। यथोदा- हृतं प्राक् 'एकस्मिन् शयने पराङ्मुखतया' इति। अयं तत्प्रशम इत्युक्तः। अत्र चेर्ष्याविप्रलम्भस्य रसस्यापि प्रशम इति शक्यं योजयितुम्। क्वचित्तु व्यभिचा- रिणः सन्धिरेव चर्वणास्पदम्। यथा— ओसुरु सुम्ठि आइं मुहु चुम्बिअं जेण। अमिअरसघोण्टाणं पडिजाणिअं तेण॥ इत्यत्र श्रुत्युक्ते तु कोपे कोपकषायगद्गदमन्दरुदिताया येन मुखं चुम्बितं स्थिति और अपाय। जो कि कहते हैं—'विविध प्रकार (अर्थात् तीन प्रकार से) अभिमुख रूप से चरण करते हैं, अतः व्यभिचारी कहे जाते हैं'। उनमें कभी उदयावस्था से प्रयुक्त व्यभिचारी भाव होता है, जैसे— सेज पर आई कृश अङ्गों वाली (नायिका) ने गोत्रविपर्यय (प्रिय द्वारा दूसरी नायिका के नामोच्चारण) कर दिए जाने पर सोचा कि करवट बदल ले और फिर करवट बदलना आरम्भ किया, फिर करवट बदलने का प्रयत्न किया, लेकिन एक हाथ को शिथिल करके अलग हटाया, किन्तु प्रिय के वक्ष से अपने स्तन के भार को खींच न पाई। यहाँ नायिका का प्रणय-कोप उदय लेना ही चाहता है, ऐसी स्थिति को प्राप्त है 'नहीं वह खींच पाई' इस कथन द्वारा उसके हृदय के अवकाश का निराकरण कर देने से वही (उदय लेने की स्थिति में अवस्थान) आस्वाद का प्राण है। 'स्थिति' का उदाहरण दे चुके हैं—'तिष्ठेत् कोपवशात्०' इत्यादि से। कहीं पर व्यभिचारी भाव की प्रशम अवस्था से प्रयुक्त चमत्कार होता है। जैसा कि पहले उदाहरण दे चुके हैं—'एकस्मिन् शयने पराङ्मुखतया०।' यह व्यभिचारी भाव का प्रशम कहा गया है। यहाँ ईर्ष्याविप्रलम्भ रस का प्रशम है, ऐसी योजना कर सकते हैं। कहीं पर तो व्यभिचारी भाव की सन्धि ही चर्वणा (आस्वाद) प्रतिष्ठान होती है। जैसे— ईर्ष्याजनित अश्रु से शोभित नायिका के मुख को जिसने चुम्बन किया है, उसने अमृत-रस के निगलने (रुक-रुक कर पीने) की तृप्ति को जान लिया। (?) यहाँ 'ईर्ष्या' शब्द से अभिहित कोप में 'कोप के मिश्रण से गद्गद एवं मंद-मंद रोती हुई नायिका के मुख को जिसने चुम्बन किया उसने अमृतरस के निगलने की
१८६ सलोचन-ध्वन्यालोकः लोचनम् तेनामृतरसनिगरणविश्रान्तिपरम्पराणां तृप्तिर्ज्ञातेति कोपप्रसादसन्धिश्चमत्कार- स्थानम् । क्वचिद्व्यभिचार्यन्तरशबलतैव विश्रान्तिपदम् । यथा— काकार्यं शशलक्ष्मणः क्व च कुलं भूयोऽपि दृश्येत सा दोषाणां प्रशमाय मे श्रुतमहो कोपेऽपि कान्तं मुखम् । किं वक्ष्यन्त्यपकल्मषाः कृतधियः स्वप्नेऽपि सा दुर्लभा चेतः स्वास्थ्यमुपैहि कः खलु युवा धन्योऽधरं धास्यति ॥ अत्र हि वितर्कौत्सुक्ये मतिस्मरणे शङ्कादैन्ये धृतिचिन्तने परस्परं बाध्य- बाधकभावेन द्वन्द्वशो भवन्ती, पर्यन्ते तु चिन्ताया एव प्रधानतां ददती परमास्वादस्थानम् । एवमन्यदप्युत्प्रेक्ष्यम् । एतानि चोदयसन्धिशबलत्वादि- कानि कारिकायामादिग्रहणेन गृहीतानि । नन्वेवं विभावानुभावमुखेनाप्यधिकश्चमत्कारो दृश्यत इति विभावध्वनिरनु- भावध्वनिश्च वक्तव्यः । मैवम्; विभावानुभावौ तावत्स्वशब्दवाच्यावेव । तच्च- र्वणापि चित्तवृत्तिष्वेव पर्यवस्यतीति रसभावेभ्यो नाधिकं चर्वणीयम् । यदा तु विभावानुभावावपि व्यङ्ग्यौ भवतस्तदा वस्तुध्वनिरपि किं न सह्यते । यदा तु विभावाभासाद्रत्याभासोदयस्तदा विभावानुभासाच्चर्वणाभास इति रसाभासस्य विश्रान्ति अर्थात् आनन्द की परम्पराओं की तृप्ति को जान लिया’ इस प्रकार कोप और प्रसाद की सन्धि चमत्कार का स्थान है । कहीं पर व्यभिचारी का एक-दूसरे व्यभिचारी में मिल जाना (शबलता) ही विश्रान्ति (आनन्द) का पद (प्रतिष्ठान) होता है । जैसे— (यह ब्राह्मण-कन्या में आसक्ति रूप) अकार्य (गलत कार्य) कहाँ और चन्द्र का वंश कहाँ ? काश, वह फिर और भी दिख जाती ! मैंने दोषों के शमन करने के लिए शास्त्र पढ़ा है, अहो ! उसका मुख कोप की अवस्था में भी सुन्दर लगता है; मालिन्य से रहित एवं सुन्दर आचरण वाले लोग क्या कहेंगे ? वह स्वप्न में भी दुर्लभ है; हे चित्त, तू धीरज धारण कर, कौन धन्य युवक होगा जो उसके अधर का पान करेगा ? यहाँ, वितर्क और औत्सुक्य, मति और स्मरण, शङ्का और दैन्य, धृति और चिन्तन भाव परस्पर बाध्य-बाधक रूप में रहते हुए पर्यन्त में चिन्ता को प्रधान करते हुए परम आस्वाद के प्रतिष्ठान हैं । इसी प्रकार और की भी उत्प्रेक्षा कर लेनी चाहिए । ये उदय, सन्धि, शबलता आदि कारिका में ‘आदि’ शब्द से ग्रहण किए गए हैं । शङ्का है कि इस प्रकार विभाव और अनुभाव के प्रकार से भी अधिक चमत्कार देखा जाता है, ऐसी स्थिति में विभावध्वनि और अनुभावध्वनि को कहना चाहिए ! उत्तर है कि, ऐसा नहीं; विभाव और अनुभाव अपने शब्द से ही वाच्य होते हैं, उनकी चर्वणा भी चित्तवृत्तियों में ही पर्यवसित होती है, इस लिए रस और भावों से अधिक (दूसरा) चर्वणा के योग्य नहीं है । जब कि विभाव और अनुभाव व्यङ्ग्य होते हैं, तब वस्तुध्वनि को क्यों नहीं मान लेते हैं ? जब कि विभावाभाव से रत्याभास का उदय होगा तब विभाव के भी साथ भासित होने के कारण चर्वणाभास होगा;
द्वितीय उद्योतः १८७ लोचनम् विषयः । यथा रावणकाव्याकर्णने शृङ्गाराभासः । यद्यपि ‘शृङ्गारानुकृतिर्या तु स हास्यः’ इति मुनिना निरूपितं तथाप्यौत्तरकालिकं तत्र हास्यरसत्वम् । दूराकर्षणमोहमन्त्र इव मे तन्नाम्नि याते श्रुतिं चेतः कालकलामपि प्रकुरुते नावस्थितिं तां विना । इत्यत्र तु न हास्यचर्वणावसरः । ननु नात्र रतिः स्थायिभावोऽस्ति । परस्परास्थाबन्धाभावात् केनैतदुक्तं रतिरिति । रत्याभासो हि सः । अतश्चा- भासता येनास्य सीता मय्युपेक्षिका द्विष्ठा वेति प्रतिपत्तिर्हृदयं न स्पृशत्येव । तत्स्पर्शे हि तस्याप्यभिलाषो विलीयेत । न च मयीयमनुरक्तेत्यपि निश्चयेन कृतं, कामकृतान्मोहात् । अत एव तदाभासत्वं वस्तुतस्तत्र स्थाप्यते शुक्तौ रजता- भासवत् । एतच्च शृङ्गारानुकृतिशब्दं प्रयुञ्जानो मुनिरपि सूचितवान् । अनुकृ- तिरमुख्यता आभास इति ह्येकोऽर्थः । अत एवाभिलाषे एकतरनिष्ठेऽपि शृङ्गा- रशब्देन तत्र तत्र व्यवहारस्तदाभासतया मन्तव्यः । शृङ्गारेण वीरादीनामप्या- भासरूपतोपलक्षितैव । एवं रसध्वनेरेवामी भावध्वनिप्रभृतयो निष्यन्दाः । आस्वादे प्रधानं प्रयोजकमेवमंशं विभज्य पृथग्व्यवस्थाप्यते । यथा गन्धयुक्ति- इस प्रकार रसाभास का विषय होगा । जैसे रावणकाव्य के श्रवण करने में शृङ्गाराभास होगा । यद्यपि भरत मुनि ने निरूपण किया है कि ‘जो शृङ्गार का अनुकरण हो उसे हास्य कहना चाहिए’, तथापि हास्यरस की स्थिति ( शृङ्गार के ) उत्तर काल में होती है । ‘दूर ही से आकर्षण कर लेने वाले मोहमन्त्र की भाँति उसके नाम के कान में प्रवेश करते ही चित्त थोड़ी देर भी उसके बिना नहीं ठहर पाता है ।’ यहाँ हास्यरस की चर्वणा का अवसर नहीं है । जब कि रति स्थायिभाव यहाँ नहीं है क्योंकि एक-दूसरे के प्रति ( परस्पर ) आस्था बन्ध का अभाव है फिर किसने कहा कि यह रति है ? क्योंकि वह रत्याभास है । इस कारण से भी रति की आभासता जाहिर होती है कि रावण के हृदय को यह ज्ञान छू तक नहीं सका है, कि सीता मेरे प्रति उपेक्षा का भाव रखती है या द्वेष का । यदि उसे ऐसा ज्ञान होता तो उसका अभिलाष विलीन हो जाता । ‘मुझ में यह अनुरक्त है’ यह निश्चय भी नहीं है, क्योंकि कामजनित मोह हो चुका है । इसलिए रति की आभासता को वस्तुतः वहाँ स्थापित करते हैं, जैसे शुक्ति में रजत का आभास होता है । इसे ‘शृङ्गार की अनुकृति’ इस शब्द का प्रयोग करते हुए मुनि ने भी सूचित कर दिया है । अनुकृति, अमुख्यता और आभास एक ही अर्थ है । इस लिए अभिलाष जब किसी एक ( पक्ष ) में ही रहे, तब ‘शृङ्गार’ शब्द से व्यवहार उसके आभास के रूप में मानना चाहिए । एक शृङ्गार के कहने से वीर आदि रसों की भी आभासरूपता उपलक्षित ही है । इस प्रकार ये भावध्वनि प्रभृति रसध्वनि के ही निष्यन्द हैं । आस्वाद के इस प्रकार प्रधान अंश को विभक्त करके अलग व्यवस्थापित करते हैं । जिस प्रकार गन्ध योजना की कला के जानकार लोग एक रस के आस्वाद से व्याप्त आमोद ( गन्ध ) के
१८८ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः रसादिरर्थो हि सहेव वाच्येनावभासते । स चाङ्गित्वेनावभासमानो ध्वनेरात्मा । रसादि रूप अर्थ वाच्य के साथ हीसा प्रतीत होता है । और वह अङ्गी (प्रधान) रूप से प्रतीत होता हुआ ध्वनि का आत्मा (स्वरूप) है । लोचनम् नैरेकरससम्मूर्च्छितामोदोपभोगेऽपि शुद्धमास्यादिप्रयुक्तमिदं सौरभमिति । रसध्वनिस्तु स एव योऽत्र मुख्यतया विभावानुभावव्यभिचारिसंयोजनोदित- स्थायिप्रतिपत्तिकस्य प्रतिपत्तुः स्थाय्यंशचर्वणाप्रयुक्त एवास्वादप्रकर्षः । यथा— कृच्छ्रेणोरुयुगं व्यतीत्य सुचिरं भ्रान्त्वा नितम्बस्थले मध्येऽस्यास्त्रिवलीतरङ्गविषमे निःष्पन्दतामागता । मद्दृष्टिस्तृषितेव सम्प्रति शनैरारुह्य तुङ्गौ स्तनौ साकाङ्क्षं मुहुरीक्षते जललवप्रस्यन्दिनी लोचने ॥ अत्र हि नायिकाकारानुवर्ण्यमानस्वात्मप्रतिकृतिपवित्रितचित्रफलकावलो- कनाद्वत्सराजस्य परस्परास्थाबन्धरूपो रतिस्थायिभावो विभावानुभावसंयोज- नवशेन चर्वणारूढ इति । तदलं बहुना१! स्थितमेतत्-रसादिरर्थोऽङ्गित्त्वेन भास- मानोऽसंलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्यस्य ध्वनेः प्रकार इति । सहेवेति । इवशब्देनासंलक्ष्यता विद्यमानत्वेऽपि क्रमस्य व्याख्याता । वाच्येनेति । विभावानुभावादिना । उपभोग में भी कहते हैं कि यह गन्ध शुद्ध मांसी (एक प्रकार का गन्ध द्रव्य) आदि से तैयार है । रसध्वनि तो वही है जो यहाँ मुख्य रूप से विभाव, अनुभाव, व्यभिचारी के संयोग से उत्पन्न स्थायी भाव की प्रतिपत्ति या ज्ञान वाले ज्ञाता या सहृदय का स्थायी के अंश की चर्वणा के कारण ही प्रकृष्ट आस्वाद है । जैसे— ‘प्यासी हुई सी मेरी दृष्टि कठिनाई से प्रिया के ऊरुयुगल को पार कर, नितम्ब के स्थल में देर तक भ्रमण कर, इसके त्रिवली की तरङ्गों से विषम मध्यभाग में निश्चलभाव को प्राप्त कर गई, अब इन उन्नत स्तनों पर धीरे से चढ़ कर हसरत के साथ अश्रुजल को बरसने वाली आँखों को बार-बार देख रही है ।’ यहाँ, नायिका (रत्नावली) के आकार रूप चित्र से देखी गई अपनी प्रतिकृति (चित्र) से पवित्र हुए फलक को देखने के कारण वत्सराज (उदयन) का परस्पर आस्थारूप रति-स्थायिभाव विभाव और अनुभाव के संयोजन के कारण चर्वणा की स्थिति तक आरूढ हो गया है । बहुत कहने से फायदा नहीं ! बात यह हुई—रसादि अर्थ अङ्गी या प्रधान रूप से भासमान होकर असंलक्ष्यक्रम व्यङ्ग्य ध्वनि का प्रकार है । साथ१ जैसा— । ‘जैसा’ या ‘सा’ (इव) शब्द से क्रम के रहते हुए भी उसका संलक्ष्यता व्याख्यान की गई है । वाच्य के साथ— । अर्थात् विभाव, अनुभाव आदि के साथ । १. वृत्तिग्रन्थ के ‘सहेव’ का ‘निर्णयसागर’ के संस्करण का पाठ ‘सहैव’ है। इसके अनुसार
द्वितीय उद्योतः १८९ ध्वन्यालोकः इदानीं रसवदलङ्कारादलक्ष्यक्रमद्योतनात्मकनो ध्वनेर्विभक्तो विषय इति प्रदर्श्यते— वाच्यवाचकचारुत्वहेतूनां विविधात्मनाम् । रसादिपरता यत्र स ध्वनेर्विषयो मतः ॥ ४ ॥ अब रसवद् अलङ्कार से अलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्य रूप ध्वनि का विषय अलग है, यह दिखाते हैं— नाना प्रकार के वाच्य, वाचक और उनके चारुत्व-हेतुओं का जहाँ रस आदि में तात्पर्य हो, वह ‘ध्वनि’ का विषय माना गया है ॥ ४ ॥ लोचनम् नन्वङ्गित्वेनावभासमान इत्युच्यते; तत्राङ्गित्वमपि किमस्ति रसादेर्येन तन्निराकरणायतद्विशेषणमित्यभिप्रायेणोपक्रमते—इदानीमित्यादिना । अङ्गत्व- मस्ति रसादीनां रसवत्प्रेयऊर्जस्विसमाहितालङ्काररूपतायामिति भावः । अनया च भङ्ग्या रसवदादिष्वलङ्कारेषु रसादिध्वनेर्नान्तर्भाव इति सूचयति । शङ्का है कि जब ‘अङ्गी या प्रधान रूप से अवभासमान’ (ध्वनि को) कहते हैं तो वहाँ रसादि का अङ्गत्व भी क्या है ? जिससे उसके (अङ्गत्व) के निराकरण के लिए यह विशेषण है, इस अभिप्राय से उपक्रम करते हैं—‘अत्र’इत्यादि द्वारा । भाव यह कि रसवत् , प्रेयस्, ऊर्जस्वि, समाहित अलङ्कार के रूपों में रसादि का अङ्गत्व है । इस अङ्गी के द्वारा सूचित करते हैं कि रसवद् आदि अलङ्कारों में रसादि१ ध्वनि का ‘रसादि अर्थ वाच्य के साथ ही प्रतीत होता है’ यह अर्थ होता है । किन्तु यह पाठ भ्रमपूर्ण ही है । क्योंकि वाच्य विभावादि और रसादि अर्थ की प्रतीति में क्रम अवश्य होता है किन्तु वह व्यङ्ग्य रसादि की प्रतीति इतनी शीघ्रता से होती है कि वह क्रम संलक्षित नहीं हो पाता । जैसे कमल के सैकड़ों पत्तों को एक बार सूचिका से छेदने पर क्रम की प्रतीति नहीं होती । इस प्रकार वाच्य के साथ ही रसादि की प्रतीति न होकर वाच्य के साथ जैसी ही प्रतीति होती है, अतः ‘एव’ (ही) के स्थान पर ‘इव’ (जैसा) पाठ ही उचित है । दूसरे यह भी कि वाच्य के साथ ही व्यङ्ग्य अर्थ की प्रतीति कैसे सम्भव है ? क्योंकि दो अर्थों का एक ही समय में ज्ञान मन की सामर्थ्य से बाहर है । लोचनकार ने ‘सहैव’ पाठ को ही निर्दिष्ट किया है । १. जब रस प्रधान होता है अर्थात् अङ्गी होता है तब रसादि ध्वनि होती है, किन्तु जब रस की स्थिति अप्रधान या अङ्ग की होती है तब वह रसवत् आदि अलङ्कार की कोटि में आता है । अलङ्कारों में ध्वनि के अन्तर्भाव का सम्भव न होने की बात पहले कह चुके हैं । समासोक्ति आदि अलङ्कारों में ध्वनि का सामान्यतः अन्तर्भाव तो है ही नहीं, इसी प्रकार रसवद् अलङ्कार में भी रसादि ध्वनि का अन्तर्भाव नहीं है । यह भी बात पहले कही गई है कि वस्तुध्वनि का समासोक्ति आदि अलङ्कारों में अन्तर्भाव नहीं । कहने का तात्पर्य यह कि ध्वनि तत्त्व सर्वथा एक अलग अस्तित्व रखता है ।
१९० सलोचन-ध्वन्यालोकः लोचनम् पूर्वं हि समासोक्त्यादिषु वस्तुध्वनेर्नान्तर्भाव इति दर्शितम् । वाच्यं च वाचकं च तच्चारुत्वहेतवश्चेति द्वन्द्वः । वृत्तावपि शब्दाश्चालङ्काराश्चार्थाश्चालङ्काराश्चेति द्वन्द्वः। मत इति। पूर्वमेवैतदुक्तमित्यर्थः । ननूक्तं भट्टनायकेन—'रसो यद्वा अन्तर्भाव नहीं है। पहले दिखा चुके हैं कि समासोक्ति आदि अलङ्कारों में वस्तुध्वनि का अन्तर्भाव नहीं है। 'वाच्य और वाचक और उनके चारुत्वहेतु' यह द्वन्द्व समास है। वृत्ति में भी 'शब्द, अलङ्कार और अर्थालङ्कार' यह द्वन्द्व समास है। माना गया है।— अर्थात् पहले ही यह कहा जा चुका है। शङ्का—भट्टनायक' ने कहा है 'रस यदि परगत १. इसके सम्बन्ध में विभिन्न आचार्यों के सैद्धान्तिक विचारों के जानने के पूर्व सामान्यतः यहाँ भरत मुनि के 'रससूत्र' से परिचित होना आवश्यक है, क्योंकि प्राचीन सभी व्याख्याएँ उन्हीं के रस-सूत्र पर आधारित हैं। भरतमुनि कहते हैं—'विभावानुभावसञ्चारिसंयोगाद्रस- निष्पत्तिः।' अर्थात् विभाव, अनुभाव तथा सञ्चारी या व्यभिचारी भाव के संयोग से (स्थायीभाव) रस रूप में निष्पन्न होता है। इसके पूर्व कि हमें इस सूत्र की विभिन्न व्याख्याएँ विदित हों, विभाव आदि को समझ लेना आवश्यक है। स्थायीभाव—वासना के रूप में बहुत काल तक प्राणियों के, विशेष रूप से मनुष्य के भीतर स्थिर रहने वाली चित्तवृत्तियाँ 'स्थायीभाव' कहलाती हैं। साहित्य-शास्त्र में आठ स्थायीभावों का निर्देश है— रतिर्हासश्च शोकश्च क्रोधोत्साहौ भयं तथा। जुगुप्सा विस्मयश्चेति स्थायिभावाः प्रकीर्तिताः॥ कुछ लोगों ने 'निर्वेद' (वैराग्य) को भी एक स्थायीभाव माना है। विभाव—वे पदार्थ, जिनसे स्थायीभाव उद्बुद्ध होते हैं 'विभाव' कहलाते हैं। वे दो प्रकार के हैं—आलम्बन और उद्दीपन। नायक-नायिका आलम्बन-विभाव हैं और उद्यान, चन्द्रोदय आदि उद्दीपन-विभाव हैं। आलम्बन-विभाव से स्थायीभाव उद्बुद्ध हो जाता है और उद्दीपन-विभाव से अङ्कुरित हो जाता है। अङ्कुरण भी उद्बोधन का ही एक रूप है। अनुभाव—बाह्य कटाक्ष आदि चेष्टाएँ 'अनुभाव' कहलाती हैं। इनसे स्थायीभाव प्रतीत होने लगता है। विभाव स्थायीभाव के कारण माने जाते हैं अनुभाव कार्य। चेष्टाएँ स्थायीभाव या उद्बुद्ध वासना के अनुसार होती हैं अतः पश्चात् होने के कारण उन्हें 'अनुभाव' कहते हैं (अनु पश्चाद् भवन्तीत्यनुभावाः)। इन कार्य रूप अनुभावों अर्थात् कटाक्षादि चेष्टाओं से रत्यादि स्थायीभाव शीघ्र अवगत हो जाते हैं। सञ्चारी भाव या व्यभिचारी भाव—ये स्थिर न रहनेवाली चित्तवृत्तियाँ हैं। जब कि स्थायीभाव स्थायी होते हैं तो ये व्यभिचारीभाव अस्थायी होते हैं। इस प्रकार आलम्बन और उद्दीपन विभावों से स्थायीभाव उद्बुद्ध होता है, अनुभावों से प्रतीति के योग्य होता है और व्यभिचारियों से परिपोष प्राप्त कर आस्वाद्यमान हो 'रस' हो जाता है। इस प्रकार साहित्यिक आचार्यों ने रस आठ माने हैं— शृङ्गारहास्यकरुणरौद्रवीरभयानकाः। बीभत्साद्भुतसंज्ञौ चेत्यष्टौ नाट्य रसाः स्मृताः॥ जिन्होंने 'निर्वेद' को भी स्थायीभाव माना है, वे 'शान्त' को नवम रस मानते हैं।
द्वितीय उद्योतः १९१ लोचनम् परगततया प्रतीयते तर्हि ताटस्थ्यमेव स्यात् । न च स्वगतत्वेन रामादिच- रितमयात्काव्यादसौ प्रतीयते । स्वात्मगतत्वेन च प्रतीतौ स्वात्मनि रसस्यो- रूप से (अर्थात् सहृदय से अतिरिक्त में) प्रतीत होता है, तब ताटस्थ्य (सहृदय से असम्बन्ध) ही होगा (अर्थात् स्वयं सहृदय को ऐसी स्थिति में रसप्रतीति नहीं होगी)। भट्टनायक का रस-विचार—भरत के रस-सूत्र के अनुसार विभाव आदि के संयोग से रस की निष्पत्ति होती है। इस पर भट्टनायक पहले 'प्रतीति' की दृष्टि से विचार करते हैं और तत्पश्चात् उसकी प्रक्रिया का अपने अनुसार निरूपण करते हैं। पहले यह विचार करते हैं कि रस की प्रतीति 'परगत' रूप से होती है या 'स्वगत' रूप से। अर्थात् सहृदय को रस का बोध अनुकार्य राम या अनुकर्ता नट में होता है अथवा अपने में। भट्टनायक के विचार में दोनों पक्षों में किसी को स्वीकार नहीं किया जा सकता, क्योंकि यदि रस को अनुकार्य या अनुकर्ता में मानते हैं तो सहृदय एक तटस्थ व्यक्ति हो जाता है, ऐसी स्थिति में, उसे क्या आ पड़ी है कि वह भिन्न के रस से स्वयं आनन्द का अनुभव करे। और यदि 'स्वगत' रूप से अर्थात् सहृदय में रस को मानते हैं तब यह स्वीकार करना पड़ता है कि रस सहृदय में उत्पन्न होता है। किन्तु यह ठीक इसलिए नहीं है कि सीता तो सहृदय या सामाजिक का 'विभाव' नहीं है और रस जब भी उत्पन्न होगा तब विभाव से ही उत्पन्न होगा। सहृदय या सामाजिक को जब तक यह भावना है कि सीता राम की पत्नी है तब तक सीता की रामविषयक रति की चर्वणा कैसे कर सकता है ? यदि साधारण कान्तात्व की भावना यहाँ मानते हैं तब भी जो कि सीता आदि में पूज्य-बुद्धि है वह किसी प्रकार सहृदय की रति का उद्बोध नहीं होने देगी। दूसरे यह भी नहीं कि सहृदय तत्काल अपनी पत्नी को स्मरण करने लगता है। पुनश्च राम आदि अलौकिक पात्रों के समुद्रबन्धन आदि विभावों का साधारण्य कैसे बन सकता है ? इस प्रकार साधारणीकरण के सम्भव न होने के कारण स्वगतरूप से भी रस की प्रतीति नहीं होगी। राम के उत्साह आदि के स्मरण यदि साधारणीकरण में सहायक मानते हैं तब भी पूर्व अनुभव के न होने के कारण स्मरण भी नहीं बनता है और काव्यरूप शब्द से यदि प्रतीति करते हैं तब तो लोक में प्रत्यक्ष नायिका-नायक को देखकर भी द्रष्टा को रस उत्पन्न होना चाहिए। सामाजिकों में रस की उत्पत्ति मानने में यह एक और कठिनाई है कि करुण रस के उत्पन्न होने पर दुःखी होने के कारण किसी प्रकार पुनः वे करुण-रस की प्रेक्षा में प्रवृत्त न होंगे। इन अनेक कारणों से सहृदयों में रस की उत्पत्ति नहीं मानी जा सकती। इसी प्रकार उनमें रस की अभिव्यक्ति भी नहीं होगी। क्योंकि शृङ्गार जो वासना या शक्ति के रूप में सहृदयों के अन्तःकरण में विद्यमान रहता है उसकी अभिव्यक्ति स्वीकार करने पर कान्ता आदि उपायों के तारतम्य की स्थिति में भी अभिव्यक्ति में भी तारतम्य होगा। जिस प्रकार अन्धकार में पड़ी वस्तु की अभिव्यक्ति अधिक से अधिक तभी होगी जब अधिक से अधिक उस अभिव्यक्ति के उपायभूत आलोक को सम्पादित करेंगे, उसी प्रकार रस की भी अभिव्यक्ति तारतम्य-युक्त होगी यह एक दोष, दूसरा दोष यह कि अभिव्यक्ति को परगत मानते हैं या स्वगत, यह झगड़ा तब भी रह ही जाता है। इस प्रकार भट्टनायक काव्य से रस के प्रतीत, उत्पन्न या अभिव्यक्त होने के सिद्धान्तों का निराकरण करके अपने मत का प्रतिष्ठापन करते हैं कि काव्यात्मक शब्द, चूँकि अन्य शब्दों से विलक्षण होते हैं, के अभिधायकत्व, भावकत्व और भोजकत्व ये तीन अंशभूत व्यापार हैं। प्रथम अर्थविषयक व्यापार है, दूसरा रसादि-विषयक और तीसरा सहृदय-विषयक व्यापार है। और को न मानकर यदि केवल शुद्ध अभिधा को ही यहाँ मानते हैं तो शास्त्र के 'तन्त्र' आदि
१९२ सलोचन-ध्वन्यालोकः लोचनम् त्पत्तिरेवाभ्युपगता स्यात् । सा चायुक्ता, सीतायाः सामाजिकं प्रत्यविभाव- त्वात् । कान्तात्वं साधारणं वासनाविकासहेतुविभावतायां प्रयोजकमिति चेत्- देवतावर्णनादौ तदपि कथम् । न च स्वकान्तास्मरणं मध्ये संवेद्यते । अलोक- सामान्यानां च रामादीनां ये समुद्रसेतुबन्धादयो विभावास्ते कथं साधारण्यं भजेयुः । न चोत्साहादिमान् रामः स्मर्यते, अननुभूतत्वात् । शब्दादपि तत्प्र- तिपत्तौ न रसोपजनः । प्रत्यक्षादिव नायकमिथुनप्रतिपत्तौ । उत्पत्तिपक्षे च करुणस्योत्पादाद् दुःखित्वे करुणप्रेक्षासु पुनरप्रवृत्तिः स्यात् । तन्न उत्पत्तिरपि, नाप्यभिव्यक्तिः, शक्तिरूपस्य हि शृङ्गारस्याभिव्यक्तौ विषयार्जनतारतम्यप्रवृत्तिः स्यात् । तत्रापि किं स्वगतोऽभिव्यज्यते रसः परगतो वेति पूर्ववदेव दोषः । और स्वगत रूप से (अर्थात् सहृदय में) वह (रस) राम आदि के चरित रूप काव्य से नहीं प्रतीत होता है, क्योंकि अपने आप में प्रतीति मान लेने पर सहृदय में रस की उत्पत्ति माननी होगी। परन्तु वह ठीक नहीं, क्योंकि सामाजिक (या सहृदय) के प्रति सीता विभाव नहीं है। यदि कहिए कि साधारण कान्तात्व रत्यादि वासना के विकास के हेतुभूत विभावना में प्रयोजक है। तो वह भी देवता के वर्णन आदि में कैसे होगा ? ऐसा नहीं कि बीच में अपनी कान्ता के स्मरण का संवेदन होता है। और, आलोक सामान्य चरित वाले राम आदि में जो समुद्र के सेतुबन्ध आदि विभाव हैं, वे कैसे साधारण्य को प्राप्त कर सकते हैं ? और उत्साह आदि से युक्त राम का तत्काल स्मरण भी नहीं होता, क्योंकि उनका पहले कभी अनुभव नहीं हुआ रहता है। शब्द रूप काव्य से यदि उस रामगत उत्साह की प्रतीति करते हैं, तब भी (सहृदयों के) रस उत्पन्न नहीं होगा, जैसे नायक-नायिका को प्रत्यक्ष देखकर (किसी के रसोत्पत्ति नहीं होती) । रस की उत्पत्ति को (सहृदयों में) मान लेने पर करुण रस के उत्पन्न होने से दुःखी होने पर पुनः वे (सहृदय) करुण रस-प्रधान नाटकों में प्रवृत्त नहीं होंगे। इस लिए उत्पत्ति भी नहीं, अभिव्यक्ति भी नहीं। शक्ति या वासना रूप शृङ्गार (और वीर आदि अन्य रस) की अभिव्यक्ति में विषय के अर्जन (ग्रहण) में अनुभव के अंश में तारतम्य की
से और काव्य के 'शेष' अलङ्कार से भेद रह जायगा ? (अनेक अर्थ के बोध की इच्छा से एक पद का एक बार उच्चारण 'तन्त्र' कहलाता है 'हलन्त्यम्' में दो अर्थ हैं।) यदि कहिए कि शास्त्र के शब्दों में नागरिका आदि वृत्तियों का विचार नहीं होता और श्रुतिदुष्ट आदि दोषों का वर्जन नहीं होता, यही दोनों का भेद या अन्तर है। तो इतने मात्र से कुछ भी नहीं होता। इसलिए रसभावनाव्य या भावकत्व रूप द्वितीय व्यापार की कल्पना करते हैं। इस व्यापार से अभिधा विलक्षण हो जाती है। यह व्यापार रसविषयक होकर विभावादि को 'साधारण' बना देता है। इस प्रकार रस के भावित होने पर सहृदय को भोजकत्व व्यापार से रस का 'भोग' होता है। वह 'भोग' अनुभव और स्मरण से विलक्षण, द्रुतविस्तरविकारूप, रजस्तमोवैचित्र्यानुविद्धसत्त्वमय, चित्स्वभाव, निर्वृत्ति या आनन्दरूप, परब्रह्मास्वादसहोदर एवं विश्रान्ति या विगलितवेद्यान्तर- स्थिति रूप है। इस प्रकार भोजकत्ववादी भट्टनायक का मत है।
द्वितीय उद्योतः १९३ लोचनम् तेन न प्रतीयते नोत्पद्यते नाभिव्यज्यते काव्येन रसः । किं त्वन्यशब्दवैलक्षण्यं काव्यात्मनः शब्दस्य त्र्यंशताप्रसादात् । तत्राभिधायकत्वं वाच्यविषयम्, भावकत्वं रसादिविषयम्, भोगकृत्त्वं सहृदयविषयमिति त्रयोऽशभूता व्यापाराः। तत्राभिधाभागो यदि शुद्धः स्यात्तत्तन्त्रादिभ्यः शास्त्राम्नायेभ्यः श्लेषाद्यलङ्काराणां को भेदः ? वृत्तिभेदवैचित्र्यं चाकिञ्चित्करम्। श्रुतिदुष्टादिवर्जनं च किमर्थम् ? तेन रसभावनाख्यो द्वितीयो व्यापारः; यद्वशादभिधा विलक्षणैव । तच्चैतद्भाव- कत्वं नाम रसान् प्रति यत्काव्यस्य तद्विभावादीनां साधारणत्वापादनं नाम । भाविते च रसे तस्य भोगः योऽनुभवस्मरणप्रतिपत्तिभ्यो विलक्षण एव द्रुति- विस्तरविकासात्मा रजस्तमोवैचित्र्यानुविद्धसत्त्वमयनिजचित्स्वभावनिर्वृतिवि- श्रान्तिलक्षणः परब्रह्मास्वादसविधः । स एव च प्रधानभूतोऽशः सिद्धरूप इति । व्युत्पत्तिर्नासाप्रधानमेवे'ति । अत्रोच्यते—रसस्वरूप एव तावद्विप्रतिपत्तयः प्रतिवादिनाम् । तथाहि- प्रवृत्ति करनी पड़ेगी । वहाँ भी, क्या स्वगत ( सहृदयात्मगत ) रस अभिव्यक्त होगा, या परगत, यह दोष पहले के समान ही है । इस लिए काव्य से रस न प्रतीत होता है, न उत्पन्न होता है, न अभिव्यक्त होता है। किन्तु तीन अंशों वाला होने के प्रसाद से काव्य रूप शब्द की अन्य शब्दों से विलक्षणता है। वहाँ अभिधायकत्व ( अभिधा ) वाच्यविषयक व्यापार है भावकत्व रसादिविषयक व्यापार है और भोगकृत्त्व (भोजकत्व ) सहृदयविषयक व्यापार है, इस प्रकार काव्यरूप शब्द के ये तीन अंश- भूत व्यापार हैं। वहाँ यदि अभिधा के अंश को शुद्ध ( अर्थात् इतर व्यापार से अनालिङ्गित ) मान लिया जाय तो तन्त्र आदि शास्त्र के प्रकारों से श्लेष आदि अलङ्कारों का क्या भेद होगा? उपनागरिका आदि वृत्तियों के भेदों का वैचित्र्य ( विलक्षणता ) कुछ नहीं कर सकती । और फिर श्रुतिदुष्ट आदि दोषों का वर्जन किस काम का होगा ? इस लिए रसभावना रूप दूसरा व्यापार है, जिसके कारण अभिधा विलक्षण ही हो जाती है । वह यह भावकत्व रसों के प्रति जो काव्य के उन रसों के विभावादि के साधारणीकरणत्व आपादन है । रस के भावित होने पर, उसका भोग, जो अनुभव, स्मरण और प्रतिपत्ति से विलक्षण ही है, और वह द्रुति, विस्तार और विकास रूप है, तथा रजस् और तमस् के वैचित्र्य से अनुविद्ध स्वात्मचैतन्य रूप लोकोत्तर आनन्द है, अर्थात् विगलित वेद्यान्तररूप में अवस्थिति रूप वाला एवं परब्रह्म के आस्वाद का समीपवर्ती है। वही प्रधानभूत अंश सिद्धरूप है । ( सहृदयों को ) व्युत्पत्ति ( चतुर्वर्ग फल की प्राप्ति रूप फल ) मिलता है, वह तो अप्रधान है ।' इस प्रसङ्ग में कहते हैं—रस के स्वरूप के सम्बन्ध में ही प्रतिवादियों के विभिन्न मत हैं । जैसा कि—कुछ लोग कहते हैं' 'पूर्व अवस्था' में जो 'स्थायी' है, वही व्यभि- १. भट्ट लोल्लट आदि का उत्पत्तिवाद—विभावादि के संयोग से रस की निष्पत्ति या उत्पत्ति होती है । यह रस की उत्पत्ति अनुकार्य राम में होती है । इस विचार को 'काव्य-प्रकाश' में इस १३ ध्व०
१९४ सलोचन-ध्वन्यालोकः लोचनम् पूर्वावस्थायां यः स्थायी स एव व्यभिचारिसम्पातादिना प्राप्तपरिपोषोऽनुकार्य- गत एव रसः । नाट्ये तु प्रयुज्यमानत्वान्नाट्यरस इति केचित् । प्रवाहधर्मिण्यां चित्तवृत्तौ चित्तवृत्तेः चित्तवृत्त्यन्तरेण कः परिपोषार्थः ? विस्मयशोकक्रोधादेश्च चारी भावों के सम्पात आदि से परिपोष प्राप्त करके अनुकार्य ( राम आदि ) में ही 'रस' होता है । परन्तु नाट्य में प्रयोग किए जानेके कारण नाट्य का रस होता है । कुछ लोग कहते हैं कि—"चित्तवृत्ति के प्रवाहधर्म होने से एक चित्तवृत्ति का दूसरी चित्तवृत्ति से प्रकार कहा है कि रत्यादि स्थायीभाव ललना आदि आलम्बन विभावों से उत्पन्न होता है, उद्यान आदि उद्दीपन विभावों से उद्दीपित होता है, कटाक्ष आदि अनुभावों से प्रतीतियोग्य होता है और उत्कण्ठादि व्यभिचारियों से परिपोषित हुआ 'रस' रूप में अनुकार्य में होता है । और नट में सामाजिक लोग राम आदि के रूप के अनुसन्धान के कारण आरोप करते हैं । इस प्रकार अनुकार्यगत रस का अनुकर्ता नट में आरोप ही उनके चमत्कार का कारण होता है । मुख्यरूप से रामादि अनुकार्य में और गौणरूप से अनुकर्ता नट में रस की प्रतीति होती है, यह भट्टलोल्लट का मत 'लोचन' में बहुत संक्षिप्तरूप से कहा है । भरतमुनि ने नाट्य से सम्बद्ध होने के कारण 'नाट्यरस' कहा है । इसका यह अर्थ नहीं कि रस नाट्य में उत्पन्न होता है । १. श्रीशङ्कुक का अनुमितिवाद—यद्यपि 'लोचन' में उपर्युक्त मत और प्रस्तुत मत के आचार्यों के नाम का उल्लेख नहीं है तथापि 'अभिनवभारती' और 'काव्यप्रकाश' आदि ग्रन्थों के अनुसार आचार्यों का मैंने नामोल्लेख किया है । अस्तु, प्रस्तुत मत के आचार्य श्रीशङ्कुक भट्टलोल्लट प्रभृति के 'अनुकार्यगत रस' के सिद्धान्त का खण्डन करते हैं । उनके अनुसार स्थायीभाव का व्यभिचारी आदि भावों से परिपोष जैसा कि उपर्युक्त मत में कहा गया है, सम्भव नहीं, क्योंकि जब कि चित्तवृत्तियाँ प्रवाहधर्म होती हैं, कभी एक सी नहीं रहतीं, फिर कैसे एक से दूसरी का परिपोष बन सकेगा । बल्कि इसके विपरीत क्रमशः चित्तवृत्तियाँ शिथिल ही हो जाती हैं । इसलिए व्यभिचारी आदि द्वारा स्थायीभाव के परिपोष के न बनने के कारण अनुकार्य में रस की बात गलत हो जाती है । दूसरे यदि कहते हैं कि तब अनुकर्ता नट में रस की सत्ता मान लिया जाय तो यह भी बात नहीं, क्योंकि जब नट में रस की सत्ता ही सिद्ध हो गई तो उसके द्वारा लय आदि के अनुसरण की बात नहीं बनती । वह अनुकर्ता नट इसलिए लय आदि का अनुसरण करता है कि उससे रस का अनुभव हो; जब रस उसमें पहले से सिद्ध है तो उसका यह उद्योग व्यर्थ सिद्ध हो जाता है । और तीसरे यदि सामाजिक में रस मानते हैं तो उसे चमत्कार क्या मिलता है ? प्रेम किसी और ने किया, सुख किसी और को मिला, उससे सामाजिक को क्या मिला ? बल्कि करुण आदि में तो सामाजिक को दुःख ही अनुभव होना चाहिए, क्योंकि रस उसमें उत्पन्न होता है ! इस प्रकार यह भी पक्ष नहीं । यदि 'स्थायी का अनुकरण रस है' यह कहेंगे तब भी स्थायी के अनन्त होने के कारण किसी नियत स्थायी का अनुकरण ही नहीं बन सकेगा और उसका न तो उस स्थायी के अनुकरण का कोई प्रयोजन ही प्रतीत होता है । और यदि सामाजिकों को यह प्रतीत होता है कि नट किसी विशिष्ट स्थायी का अनुकरण कर रहा है तो तटस्थ नट के प्रति उनकी उदासीनता होगी और इस प्रकार उन्हें चतुर्वर्ग की व्युत्पत्ति भी नहीं होगी । अपने मत के अनुसार श्री शङ्कुक का यह कहना है कि रस नाट्य में रहता है । क्योंकि
द्वितीय उद्योतः १९५ लोचनम् क्रमेण तावन्न परिपोष इति नानुकार्ये रसः । अनुकर्तरि च तद्भावे लयाद्यननु- सरणं स्यात् । सामाजिकगते वा कश्चमत्कारः ? प्रत्युत करुणादौ दुःखप्राप्तिः । तस्मान्नायं पक्षः । कस्तर्हि ? इहानन्त्यान्नियतस्यानुकारो न शक्यः, निष्प्रयोज- नश्च, विशिष्टाप्रतीतौ तटस्थ्येन व्युत्पत्त्यभावात् । तस्मादनियतावस्थात्मकं स्थायिनमुद्दिश्य विभावानुभावव्यभिचारिभिः संयुज्यमानैरयं रामः सुखीति स्मृतिविलक्षणा स्थायिनि प्रतीतिगोचरतयास्वा- दरूपा प्रतिपत्तिरनुकर्त्रालम्बना नाट्यैकगामिनी रसः । स च न व्यतिरिक्तमा- धारमपेक्षते । किं त्वनुकार्याभिन्नाभिमते नर्तके आस्वादयिता सामाजिक इत्येतावन्मात्रमदः । तेन नाट्य एव रसः, नानुकार्यादिष्विति केचित् । परिपोषरूप फल क्या होगा ? दूसरे यह कि विस्मय, शोक और क्रोध आदि का क्रम से परिपोष नहीं होता है, अतः अनुकार्य में रस नहीं हो सकता । यदि अनुकर्ता नट में रस को मानेंगे तो नट में रस जब सिद्ध ही है तब उसके द्वारा रसोपयोगी ताल-लय आदि का अनुसरण नहीं बनेगा । और यदि सामाजिक में रस स्वीकार करेंगे तब कौन-सा चमत्कार होगा ? प्रत्युत करुण आदि रस में (सामाजिक को) दुःख की प्राप्ति होगी । अतः यह पक्ष नहीं हो सकता । फिर कौन होगा ? तत्तद्गत रत्यादि भाव के अनन्त होने के कारण नियत (निश्चित, एक अवस्था वाले स्थायी) का अनुकरण नहीं किया जा सकता और वह निष्प्रयोजन भी है, क्योंकि स्थायी के वैशिष्य की प्रतीति में (नट के) तटस्थ होने के कारण (चतुर्वर्ग, धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष के उपाय रूप) व्युत्पत्ति नहीं होगी । इस लिए जिसकी अवस्था नियत नहीं है ऐसे स्थायी को उद्देश करके संयोग प्राप्त करते हुए विभाव, अनुभाव और व्यभिचारी से 'यह राम सुखी है' यह स्मृति से विलक्षण, स्थायी के प्रतीतिगोचर होने के कारण आस्वादरूप, अनुकर्ता नट में आलम्बित, एकमात्र नाट्य में रहने वाली प्रतिपत्ति (ज्ञान) 'रस' है। वह रस दूसरे आधार की अपेक्षा नहीं करता किन्तु अनुकार्य (राम आदि) से अभिन्न रूप में मान लिए गए नर्तक में सामाजिक आस्वाद प्राप्त करता है, यह इतना मात्र है । इस लिए नाट्य में ही रस है अनुकार्य आदि में नहीं ।' अनियत अवस्था वाले स्थायी को उद्देश्य करके संयोग प्राप्त करते हुए विभावानुभावव्यभिचारी भावों के द्वारा अनुकर्त्ता नट को आलम्बन करके जो स्थायी की नाट्यगत प्रतीति है, वही रस है। सामाजिक अनुकर्त्ता नट को देख कर अनुभव करता है कि यह (नर्तक या नट) सीताविषयक- रतिमान् राम है, इस प्रकार नर्तक को वह राम आदि अनुकार्य से अभिन्न मान लेता है। रस एक आस्वादरूप प्रतीति है जो सामाजिक की विशिष्ट बुद्धि के होने पर मानी जाती है। सामाजिक नट को देख कर अनुमान द्वारा अनुकार्य रामादि से उसे अभिन्न मान लेता है, उसके स्थायी का आस्वाद प्राप्त करता है। इस प्रकार श्री शङ्कुक के अनुसार 'रस' नट के आश्रित रूप में नाट्य के आश्रित है।
१९६ सलोचन-ध्वन्यालोकः लोचनम् अन्ये तु—अनुकर्तरि यः स्थाय्यवभासोऽभिनयादिसामग्र्यादिकृतो भित्ता- विव हरितालादिना अश्वावभासः, स एव लोकातीततयास्वादपरसंज्ञया प्रतीत्या रस्यमानो रस इति नाट्याद्रसा नाट्यरसाः। अपरे पुनुर्विभावानुभावमात्रमेव विशिष्टसामग्र्या समर्प्यमाणं तद्विभावनीयानुभावनीयस्थायिरूपचित्तवृत्त्युचित- वासनानुषक्तं स्वनिर्वृतिचर्वणाविशिष्टमेव रसः। तन्नाट्यमेव रसाः। अन्ये तु शुद्धं विभावम्, अपरे शुद्धमनुभावम्, केचित्तु स्थायिमात्रम्, इतरे व्यभिचारिणम्, अन्य लोग¹ कहते हैं—अनुकर्ता नट में अभिनयादि सामग्री आदि से उत्पन्न जो स्थायी का अवभास (मिथ्या ज्ञान), भीत पर हरिताल आदि से अश्व के मिथ्या ज्ञान की भाँति, है, वही लोकातीत होने के कारण 'आस्वाद' नामक प्रतीति से रस्यमान हो 'रस' है, इस प्रकार नाट्य से रस 'नाट्यरस' कहलाते हैं। और लोगों² के अनुसार विभाव-अनुभाव मात्र ही, विशिष्ट सामग्री के द्वारा (सामाजिकों) में समर्पित, उनसे विभावनीय एवं अनुभावनीय स्थायी रूप चित्तवृत्ति के उचित वासना में सम्बद्ध, एवं सामाजिक की निर्वृति या आनन्दरूप चर्वणा से विशिष्ट होकर ही रस है। इस प्रकार नाट्य ही रस³ हैं। अन्य लोग शुद्ध विभाव को, दूसरे शुद्ध अनुभाव को, कुछ लोग स्थायी सामाजिक नट को राम समझता है और नट के शिक्षाभ्यास से प्रदर्शित कृत्रिम विभाव- अनुभाव-व्यभिचारी के द्वारा नट में रस का अनुमान करता है। श्री शङ्कुक रस की 'अनुमिति' मानते हैं। सामाजिक की नट में जो रामबुद्धि उत्पन्न होती है उसे 'स्मृति' आदि से विलक्षण मानते हैं, वह सम्यग् ज्ञान, मिथ्याज्ञान, संशय और सादृश्य आदि सभी प्रतीतियों से विलक्षण चित्र के तुरग की जैसी प्रतीति है। चित्र का घोड़ा घोड़ा नहीं है तथापि सभी प्रतीतियों से उसकी प्रतीति विलक्षण होती है। १. इस मत में अभिनयादि सामग्री द्वारा अनुकर्त्ता नट में स्थायी का मिथ्याज्ञान सामाजिक का आस्वाद रूप 'रस' है। जिस प्रकार हरिताल आदि से भीत पर अश्व आदि का चित्र बना दिया जाता है उससे अश्व का मिथ्या ज्ञान होता है उसी प्रकार स्थायी का मिथ्या ज्ञान अनुकर्त्ता नट में उत्पन्न होकर सामाजिक के चमत्कार को उत्पन्न करता है। २. यहाँ विभाव-अनुभाव ही 'रस' होते हैं, नाट्यादि सामग्री से ये सामाजिकों में पहुँच जाते हैं और उनके द्वारा विभावनीय अनुभावनीय स्थायिरूप चित्तवृत्ति की वासना से सम्बद्ध हो जाते हैं और फिर सामाजिक की निर्वृति रूप चर्वणा से विशिष्ट होकर 'रस' की स्थिति को प्राप्त करते हैं। इस प्रकार इस मत में नाट्य से रस नहीं, बल्कि नाट्य ही रस है, यह माना गया है। और भी, किसी ने शुद्ध विभाव को, किसी ने शुद्ध अनुभाव को, किसी ने स्थायी भाव मात्र को, किसी ने व्यभिचारी भाव को, किसी ने इनके संयोग को, किसी ने अनुकार्य को और किसी ने सकल समुदाय को 'रस' कहा है। ३. 'नाट्यरस' का प्रयोग भरत मुनि ने नाट्यशास्त्र में किया है। विभिन्न व्याख्याकारों ने अपने अपने अनुसार इसका अर्थ किया है। उत्पत्तिवादी लोल्लट के अनुसार अनुकार्यगत रस होने के कारण 'नाट्ये प्रयुज्यमानत्वान्नाट्यरसः' यह विग्रह है। श्री शङ्कुक के यहाँ अनुकार्य के रूप में अभिमत नर्तक या नट में सामाजिक विलक्षण अनुमान द्वारा रस का आस्वादन करता है अतः 'नाट्ये, नाट्याश्रये नटे रसः' यह विग्रह है। उपर्युक्त अन्य मतों में 'नाट्याद् रसः' और 'नाट्यमेव रसः' 'नाट्यरसः' यह विग्रह किये गए हैं।
द्वितीय उद्योतः १९७
लोचनम्
अन्ये तत्संयोगम्, एकेऽनुकार्यम्, केचन सकलमेव समुदायं रसमाहुरित्यलं बहुना । काव्येऽपि च लोकनाट्यधर्मिस्थानीयेन स्वभावोक्तिवक्रोक्तिप्रकारद्वयेना- लौकिकप्रसन्नमधुरौजस्विशब्दसमर्प्यमाणविभावादियोगादियमेव रसवार्ता । अस्तु वात्र नाट्याद्विचित्ररूपा रसप्रतीतिः; उपायवैलक्षण्यादियमेव तावदत्र सरणिः । एवं स्थिते प्रथमपक्ष एवैतानि दूषणानि, प्रतीतेः स्वपरगतत्वादिवि- कल्पनेन । सर्वपक्षेषु च प्रतीतिरपरिहार्या रसस्य । अप्रतीतं हि पिशाचवद्व्य- वहार्यं स्यात् । किं तु यथा प्रतीतिमात्रत्वेनाविशिष्टत्वेऽपि प्रात्यक्षिकी आनुमा- निकी आगमोत्था प्रतिभानकृता योगिप्रत्यक्षजा च प्रतीतिरूपायवैलक्षण्यादन्यैव, तद्वदियमपि प्रतीतिश्चर्वणास्वादनभोगापरनामा भवतु । तन्निदानभूताया हृदयसंवादाद्युपकृताया विभावादिसामग्र्या लोकोत्तररूपत्वात् । रसाः प्रती- मात्र को, इतर लोग व्यभिचारी को, दूसरे लोग इनके संयोग को, कुछ लोग अनुकार्य को और कुछ लोग समुदाय रूप समस्त को 'रस' कहते हैं । अलं बहुना । 'काव्य में भी लोकधर्मी और नाट्यधर्मी के समान, ( क्रम से ) स्वभावोक्ति और वक्रोक्ति इन दोनों प्रकारों से अलौकिक, प्रसन्न, मधुर और ओजस्वी शब्द से समर्प्यमाण विभावादि के योग से इसी प्रकार रस की वार्ता ( प्रतीति ) है । यहाँ ( काव्य में ) नाट्य से रस की प्रतीति विचित्र२ है, तथापि उपाय के विलक्षण होने के कारण यही यहाँ भी प्रकार है। इस प्रकार स्थित होने पर, पहले पक्ष में ही ये दोष हैं, क्योंकि प्रतीति स्वगत होती है या परगत होती है यह विकल्प करते हैं। सभी पक्षों में रस की प्रतीति का निराकरण नहीं है । क्योंकि अप्रतीत वस्तु पिशाच की भाँति, व्यवहार में नहीं आती । किन्तु जिस प्रकार प्रतीति मात्र होने से अवशिष्ट ( समान ) होने पर भी प्रात्यक्षिकी, आनुमानिकी, आगमोत्था, प्रतिभानकृता, योगिप्रत्यक्षजा ये प्रतीतियाँ उपाय के विलक्षण होने से पृथक्-पृथक् हो जाती हैं, उसी प्रकार यह भी प्रतीति, जिसके नाम चर्वणा, आस्वादन, भोग आदि हैं, ( अन्य प्रतीतियों से विलक्षण ) है। क्योंकि इस प्रतीति का निदानभूत जो हृदयसंवाद आदि से उपकृत, विभावादि सामग्री है, वह लोकोत्तर है । 'रस प्रतीत होते हैं' यह 'ओदनं पचति' ( भात को
१. नाट्य दो प्रकार के होते हैं- लोकधर्मी और नाट्यधर्मी। जिसमें अभिनय स्वाभाविक होता है, अर्थात् पुरुष का अभिनय पुरुष करता है और स्त्री का अभिनय स्त्री, वह लोकधर्मी नाट्य है। और जिसमें स्वर, अलंकार और स्त्री-पुरुषादि अपने वेष का परिवर्तन करते हैं वह नाट्यधर्मी नाट्य है। २. दृश्यकाव्य रूप नाट्य में जो रस की प्रतीति का प्रकार है उससे विचित्र प्रकार श्रव्यकाव्य में है। श्रव्यकाव्य में विभावादि उपाय दृष्टिगोचर नहीं होते हैं, अपितु शब्द के द्वारा समर्पित होते हैं। इस प्रकार केवल विभावादि के उपस्थापन को लेकर दोनों का भेद हो जाता है, और बातें सब एक-सी हैं । जिस प्रकार नाट्य में लोकधर्मी और नाट्यधर्मी रूप भेद होते हैं उसी प्रकार काव्य में भी क्रमशः स्वभावोक्ति द्वारा और वक्रोक्ति द्वारा विभावादि का उपस्थापन होता है।
१९८ सलोचन-ध्वन्यालोकः लोचनम् यन्त इति ओदनं पचतीतिवद् व्यवहारः, प्रतीयमान एव हि रसः। प्रतीतिरेव विशिष्टा रसना। सा च नाट्ये लौकिकानुमानप्रतीतेर्विलक्षणा; तां च प्रमुखे उपायतया सन्दधाना। एवं काव्ये अन्यशाब्दप्रतीतेर्विलक्षणा, तां च प्रमुखे उपायतयापेक्षमाणा। तस्मादनुत्थानोपहतः पूर्वपक्षः। रामादिचरितं तु न सर्वस्य हृदयसंवादीति महत्साहसम्। चित्रवासनाविशिष्टत्वाच्चेतसः। यदाह—'तासामनादित्व- माशिषो नित्यत्वात्। जातिदेशकालव्यवहितानामप्यानन्तर्यं स्मृतिसंस्कारयो- रेकरूपत्वात्' इति। तेन प्रतीतिस्तावद्रसस्य सिद्धा। सा च रसनारूपा पचाता है) के समान व्यवहार है, क्योंकि रस प्रतीयमान ही होता है, विशिष्ट प्रतीति ही 'रसना' है। वह नाट्य में लौकिक अनुमानजन्य प्रतीति से विलक्षण प्रतीति है। उस (लौकिक अनुमानजन्य प्रतीति) को (वह प्रतीति) पहले अपने उपाय के रूप में अपेक्षा करती है। इस प्रकार काव्य में अन्य (लौकिक-वैदिक) शब्दजन्य प्रतीति से विलक्षण प्रतीति है, उस (शब्दप्रतीति) को पहले में उपायरूप से अपेक्षा करती है। इस लिए पूर्वपक्ष¹ न उत्थित होने के कारण उपहत हो गया। यह कहना बड़े साहस की बात है कि राम आदि का चरित सबका हृदयसंवादी नहीं है, क्योंकि चित्त नानाविध वासना से विशिष्ट होता है। जैसा कि (योगसूत्रकार कहते हैं)—'वे² (वासनाएँ) अनादि होती हैं क्योंकि आशिष या संकल्प विशेष (कि हमें सुख मिलता रहे कभी सुख के साधनों से वियोग न हो) नित्य होते हैं।' 'अतः जाति, देश और काल के व्यवधान होने पर भी (वासनाओं का) आनन्तर्य (क्रम) बना रहता है क्योंकि स्मृति और संस्कार दोनों एकरूप होते हैं।' उस कारण रस की प्रतीति सिद्ध
१. जैसा कि भट्टनायक ने कहा है कि रस प्रतीत नहीं होता है, यह बात निर्मूल हो जाती है। क्योंकि रस की प्रतीति को सभी ने अपने-अपने ढंग से स्वीकार किया है। जब वह प्रतीत नहीं होता है तो भट्टनायक उसे व्यवहार कैसे करेंगे ? जिस प्रकार उपाय की विलक्षणता से विभिन्न प्रतीतियाँ होती हैं उसी प्रकार यह भी एक विलक्षण प्रतीति है। इस प्रतीति की चर्वणा आदि अनेक संज्ञाएं हैं। इसकी उपायसामग्री विभावादि हैं। 'रस की प्रतीति' यह उसी प्रकार का प्रयोग है जैसे 'भात को पकाता है' यह व्यवहार है; भात तो पका हुआ ही होता है, फिर भी ऐसा प्रयोग सुना जाता है। रस प्रतीयमान ही होता है, अतः रस की प्रतीति रस से भिन्न नहीं है। नाट्य के क्षेत्र में वह प्रतीति लौकिक अनुमान की प्रतीति से विलक्षण होती है, किन्तु उस लौकिक अनुमान-प्रतीति को वह अपना उपाय बनाती है और काव्य के क्षेत्र में वह प्रतीति अन्य शाब्द प्रतीति से विलक्षण होती है और उस शब्द प्रतीति को अपना उपाय बनाती है। २. मानव-चित्त में अनन्तानन्त संस्कार वासना के रूप में जन्मजन्मान्तर से एकत्र होते हैं। किन्तु जब उनकी अभिव्यञ्जक सामग्री एकत्र होती है तभी वे प्रकट होते हैं। इस प्रकार वासना को अनादि माना गया है ! वासना रूप संस्कार, जो चित्त में विद्यमान होते हैं, अपनी अभिव्यञ्जक सामग्री के प्रत्यक्ष होते ही स्मृत हो उठते हैं। अनादि-अनन्त संस्कारों का आदि मूल है प्राणी के मन की सुखेच्छा। वही उसे कार्य के लिए प्रवृत्त करती है और वह कर्म द्वारा अनुभवों को संस्कार के रूप में अपने चित्त में आहित करता है। इस प्रकार आचार्य भट्टनायक ने उठाई है,
द्वितीय उद्योतः १९९ लोचनम् प्रतीतिरुत्पद्यते । वाच्यवाचकयोस्तत्राभिधादिविविक्तो व्यञ्जनात्मा ध्वननव्या- पार एव । भोगीकरणव्यापारश्च काव्यस्य रसविषयो ध्वननात्मैव, नान्यत्कि- ञ्चित् । भावकत्वमपि समुचितगुणालङ्कारपरिग्रहात्मकमस्माभिरेव वितत्य वक्ष्यते । किमेतदपूर्वम् ? काव्यं च रसान् प्रति भावकमिति यदुच्यते, तत्र भवतैव भावनादुत्पत्तिपक्ष एव प्रत्युज्जीवितः । न च काव्यशब्दानां केवलानां भावकत्वम्, अर्थापरिज्ञाने तदभावात् । न च केवलानामर्थानाम्, शब्दान्तरे- णार्प्यमाणत्वे तदयोगात् । द्वयोस्तु भावकत्वमस्माभिरेवोक्तम् । 'यत्रार्थः शब्दो है। वह रसना रूप उत्पन्न होती है। उसमें वाच्य और वाचक (काव्य) का अभिधा से व्यतिरिक्त व्यञ्जना (ध्वनन) ही रूप व्यापार है। (भट्टनायक का अभिमत) भोगी- करण¹ (भोजकत्व) व्यापार काव्य का रसविषयक व्यापार होने के कारण ध्वनन रूप ही है, दूसरा कुछ नहीं। समुचित गुणों और अलङ्कारों का परिग्रह रूप भावकत्व व्यापार को भी हम ही विस्तार करके कहेंगे। फिर यह अपूर्व क्या है ? यदि आप कहते हैं कि रसों के प्रति काव्य भावक होता है, वहाँ आप ही ने भावन करने (अर्थात् काव्य को रस का उत्पादक मान लेने) से उत्पत्तिपक्ष को पुनरुज्जीवित कर दिया है। केवल काव्य के शब्दों का भावकत्व नहीं बन सकता, क्योंकि अर्थ के परिज्ञान न होने से उनका भावकत्व नहीं बनेगा। केवल अर्थों का भी (भावकत्व), नहीं सम्भव है शब्दान्तर (लौकिक वाक्य) से भी उन अर्थों के उपस्थित होने पर उनमें भावकत्व का योग नहीं। दोनों का भावकत्व तो हमने ही कहा है 'जहाँ अर्थ अथवा शब्द उस गलत सिद्ध होती है, क्योंकि प्राणियों का चित्त नानाविध वासनाओं से युक्त होता है। अतः लोकोत्तर चरित के पात्रों के साथ भी सामाजिकों का 'हृदयसंवाद' बन जाता है। १. भट्टनायक ने काव्यरूप शब्द के तीन अंश (व्यापार) माने हैं—अभिधायकत्व, भावकत्व और भोजकत्व। लोचनकार तृतीय व्यापार भोगकृत्त्व या भोजकत्व को 'ध्वनन' व्यापार रूप ही मानते हैं, क्योंकि 'रस' ध्वन्यमान तत्त्व है और भोगकृत्त्व उस ध्वन्यमान रस का साधन है। 'भोग' भी वह चमत्कार है जो रस की रस्यमानता से उत्पन्न होता है। द्वितीय व्यापार भावकत्व भी समुचित गुणालङ्कार का परिग्रह रूप है। क्योंकि जब तक काव्य समुचित गुण-अलङ्कार- परिगृहीत नहीं होता तब तक रस के प्रति भावक नहीं होता । यहाँ लोचनकार ने मीमांसकों की तीन अंशों वाली 'भावना' से प्रस्तुत में काव्य के द्वारा रसों के भावन को संगत किया है। जैसा कि मीमांसक लोग कहते हैं, जैसे 'यजेत' इस वैदिक प्रयोग में 'भावना' के ये तीन अंश साध्य, साधन और इतिकर्त्तव्यता प्रत्यय के आख्यातात्व और लिङ्गत्व रूप अंशों से प्रतीत होते हैं। तात्पर्य यह कि यहाँ 'यजेत' के द्वारा यह भावना प्रतीत होती है कि क्या करे, किससे करे और कैसे करे ! इन आकांक्षाओं के उत्पन्न होने पर स्वर्गादि इष्ट को साध्य रूप से, स्वर्गादि को यागादि करण या साधन रूप से और प्रयाज आदि क्रियाकलाप को इतिकर्तव्यता रूप से भावन करे। इसी प्रकार प्रस्तुत में भी भावक काव्य व्यञ्जकत्व व्यापार रूप करण से, गुणालङ्कार के औचित्य रूप इतिकर्त्तव्यता द्वारा रसों को भावन करता है अर्थात् सहृदयों को रस का आस्वादन कराता है। शास्त्र से शासन और इतिहास से प्रतिपादन होता है, किन्तु इनसे भी विलक्षण काव्य का व्युत्पादन है। अर्थात् सहृदय को अपनी प्रतिभा से काव्य द्वारा
२०० सलोचन-ध्वन्यालोकः लोचनम् वा तमर्थं व्यङ्क्तः' इत्यत्र । तस्माद्व्यञ्जकत्वाख्येन व्यापारेण गुणालङ्कारौचित्या- दिकयेतिकर्तव्यतया काव्यं भावकं रसान् भावयति, इति त्र्यंशायामपि भाव- नायां करणांशे ध्वननमेव निपतति । भोगोऽपि न काव्यशब्देन क्रियते, अपि तु घनमोहान्ध्यसङ्कटतानिवृत्तिद्वारेणास्वादापरनाम्नि अलौकिके द्रुतिविस्तरवि- कासात्मनि भोगे कर्तव्ये लोकोत्तरे ध्वननव्यापार एव मूर्धाभिषिक्तः । तच्चेदं भोगकृत्त्वं रसस्य ध्वननीयत्वे सिद्धे दैवसिद्धम् । रस्यमानतोदितचमत्कारान- तिरिक्तत्वाद्भोगस्येति । सत्त्वादीनां चाङ्गाङ्गिभाववैचित्र्यस्यानन्त्याद् द्रुत्यादि- त्वेनास्वादगणना न युक्ता । परब्रह्मास्वादसब्रह्मचारित्वं चास्त्वस्य रसास्वा- दस्य । व्युत्पादनं च शासनप्रतिपादनाभ्यां शास्त्रेतिहासकृताभ्यां विलक्षणम् । यथा रामस्तथाहमित्युपमानातिरिक्तां रसास्वादोपायस्वप्रतिभाविजृम्भारूपां व्युत्पत्तिमन्ते करोतीति कमुपालभामहे । तस्मात्स्थितमेतत्—अभिव्यज्यन्ते रसाः प्रतीत्यैव च रस्यन्त इति । तत्राभिव्यक्तिः प्रधानतया भवत्वन्यथा वा । अर्थ को व्यञ्जित करते हैं' इस कारिका में । इस लिए व्यञ्जकत्व नामक व्यापार से गुण और अलङ्कार के औचित्य आदि रूप इतिकर्तव्यता के द्वारा भावक काव्य रसों को भावित करता है । इस प्रकार तीन अंशों ( साध्य, साधन और इतिकर्तव्यता ) वाली 'भावना' में करण ( साधन ) अंश में 'ध्वनन' ही आता है। भोग भी काव्य-शब्द से नहीं किया जाता है ? ( अर्थात् अवश्य किया जाता है ) । अपि तु वह भोग, जो घने मोहान्धकार की आवृत्ति ( सङ्कटता ) भग्न हो जाने के द्वारा आस्वाद नामधारी एवं द्रुत, विस्तर और विकास रूप है, जब ( उत्पन्न ) किया जाता है, उस स्थिति में लोकोत्तर 'ध्वनन' व्यापार ही मूर्धाभिषिक्त ( प्रधान हेतु ) होता है। वह यह भोगकृत्त्व ( भोजकत्व व्यापार ) रस की ध्वननीयता के सिद्ध हो जाने पर दैवसिद्ध (स्वयंसिद्ध) है, क्योंकि भोग रस्यमानता के कारण उत्पन्न चमत्कार से अनतिरिक्त ( अभिन्न ) है। सत्त्व आदि का अङ्गाङ्गिभावप्रयुक्त वैचित्र्य अनन्त हो जाता है, अतः द्रुति आदि रूप से आस्वाद की गणना ठीक नहीं। इस रसास्वाद का परब्रह्म के आस्वाद के समान होना माना गया है ! ( इस काव्य का ) व्युत्पादन, शास्त्र के शासन और इतिहास के प्रतिपादन से विलक्षण है। 'जैसा राम वैसा मैं हूँ' इस प्रकार के उपमान से अतिरिक्त, रसास्वाद के उपायभूत अपनी प्रतिभा की विजृम्भा ( विकास ) रूप व्युत्पत्ति को पर्यन्त में ( उत्पन्न ) करता है, ऐसी स्थिति में हम किसे उलहना दें। इसलिए यह स्थिर हुआ— रस अभिव्यक्त होते हैं, और प्रतीति के द्वारा ही आस्वादित होते हैं, वह अभिव्यक्ति रसास्वाद प्राप्त करने के पश्चात् पर्यन्त में एक विलक्षण व्युत्पत्ति अनुभव होती है, जिसे 'जैसे राम हैं वैसा मैं हूँ', इस उपमान से अतिरिक्त कहा गया है। ध्वनिवादी लोचनकार का अभिमत यह है कि रस की अभिव्यक्ति होती है और उस अभिव्यक्ति का साधन है व्यञ्जना व्यापार । जब वही अभिव्यक्ति प्रधान होती है तब उसे 'ध्वनि' कहते हैं। और अप्रधान की स्थिति में रसादि अलङ्कार ।