भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

पृष्ठ 259, कुल 680 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 259

द्वितीय उद्योतः १९९ लोचनम् प्रतीतिरुत्पद्यते । वाच्यवाचकयोस्तत्राभिधादिविविक्तो व्यञ्जनात्मा ध्वननव्या- पार एव । भोगीकरणव्यापारश्च काव्यस्य रसविषयो ध्वननात्मैव, नान्यत्कि- ञ्चित् । भावकत्वमपि समुचितगुणालङ्कारपरिग्रहात्मकमस्माभिरेव वितत्य वक्ष्यते । किमेतदपूर्वम् ? काव्यं च रसान् प्रति भावकमिति यदुच्यते, तत्र भवतैव भावनादुत्पत्तिपक्ष एव प्रत्युज्जीवितः । न च काव्यशब्दानां केवलानां भावकत्वम्, अर्थापरिज्ञाने तदभावात् । न च केवलानामर्थानाम्, शब्दान्तरे- णार्प्यमाणत्वे तदयोगात् । द्वयोस्तु भावकत्वमस्माभिरेवोक्तम् । 'यत्रार्थः शब्दो है। वह रसना रूप उत्पन्न होती है। उसमें वाच्य और वाचक (काव्य) का अभिधा से व्यतिरिक्त व्यञ्जना (ध्वनन) ही रूप व्यापार है। (भट्टनायक का अभिमत) भोगी- करण¹ (भोजकत्व) व्यापार काव्य का रसविषयक व्यापार होने के कारण ध्वनन रूप ही है, दूसरा कुछ नहीं। समुचित गुणों और अलङ्कारों का परिग्रह रूप भावकत्व व्यापार को भी हम ही विस्तार करके कहेंगे। फिर यह अपूर्व क्या है ? यदि आप कहते हैं कि रसों के प्रति काव्य भावक होता है, वहाँ आप ही ने भावन करने (अर्थात् काव्य को रस का उत्पादक मान लेने) से उत्पत्तिपक्ष को पुनरुज्जीवित कर दिया है। केवल काव्य के शब्दों का भावकत्व नहीं बन सकता, क्योंकि अर्थ के परिज्ञान न होने से उनका भावकत्व नहीं बनेगा। केवल अर्थों का भी (भावकत्व), नहीं सम्भव है शब्दान्तर (लौकिक वाक्य) से भी उन अर्थों के उपस्थित होने पर उनमें भावकत्व का योग नहीं। दोनों का भावकत्व तो हमने ही कहा है 'जहाँ अर्थ अथवा शब्द उस गलत सिद्ध होती है, क्योंकि प्राणियों का चित्त नानाविध वासनाओं से युक्त होता है। अतः लोकोत्तर चरित के पात्रों के साथ भी सामाजिकों का 'हृदयसंवाद' बन जाता है। १. भट्टनायक ने काव्यरूप शब्द के तीन अंश (व्यापार) माने हैं—अभिधायकत्व, भावकत्व और भोजकत्व। लोचनकार तृतीय व्यापार भोगकृत्त्व या भोजकत्व को 'ध्वनन' व्यापार रूप ही मानते हैं, क्योंकि 'रस' ध्वन्यमान तत्त्व है और भोगकृत्त्व उस ध्वन्यमान रस का साधन है। 'भोग' भी वह चमत्कार है जो रस की रस्यमानता से उत्पन्न होता है। द्वितीय व्यापार भावकत्व भी समुचित गुणालङ्कार का परिग्रह रूप है। क्योंकि जब तक काव्य समुचित गुण-अलङ्कार- परिगृहीत नहीं होता तब तक रस के प्रति भावक नहीं होता । यहाँ लोचनकार ने मीमांसकों की तीन अंशों वाली 'भावना' से प्रस्तुत में काव्य के द्वारा रसों के भावन को संगत किया है। जैसा कि मीमांसक लोग कहते हैं, जैसे 'यजेत' इस वैदिक प्रयोग में 'भावना' के ये तीन अंश साध्य, साधन और इतिकर्त्तव्यता प्रत्यय के आख्यातात्व और लिङ्गत्व रूप अंशों से प्रतीत होते हैं। तात्पर्य यह कि यहाँ 'यजेत' के द्वारा यह भावना प्रतीत होती है कि क्या करे, किससे करे और कैसे करे ! इन आकांक्षाओं के उत्पन्न होने पर स्वर्गादि इष्ट को साध्य रूप से, स्वर्गादि को यागादि करण या साधन रूप से और प्रयाज आदि क्रियाकलाप को इतिकर्तव्यता रूप से भावन करे। इसी प्रकार प्रस्तुत में भी भावक काव्य व्यञ्जकत्व व्यापार रूप करण से, गुणालङ्कार के औचित्य रूप इतिकर्त्तव्यता द्वारा रसों को भावन करता है अर्थात् सहृदयों को रस का आस्वादन कराता है। शास्त्र से शासन और इतिहास से प्रतिपादन होता है, किन्तु इनसे भी विलक्षण काव्य का व्युत्पादन है। अर्थात् सहृदय को अपनी प्रतिभा से काव्य द्वारा