ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२०० सलोचन-ध्वन्यालोकः लोचनम् वा तमर्थं व्यङ्क्तः' इत्यत्र । तस्माद्व्यञ्जकत्वाख्येन व्यापारेण गुणालङ्कारौचित्या- दिकयेतिकर्तव्यतया काव्यं भावकं रसान् भावयति, इति त्र्यंशायामपि भाव- नायां करणांशे ध्वननमेव निपतति । भोगोऽपि न काव्यशब्देन क्रियते, अपि तु घनमोहान्ध्यसङ्कटतानिवृत्तिद्वारेणास्वादापरनाम्नि अलौकिके द्रुतिविस्तरवि- कासात्मनि भोगे कर्तव्ये लोकोत्तरे ध्वननव्यापार एव मूर्धाभिषिक्तः । तच्चेदं भोगकृत्त्वं रसस्य ध्वननीयत्वे सिद्धे दैवसिद्धम् । रस्यमानतोदितचमत्कारान- तिरिक्तत्वाद्भोगस्येति । सत्त्वादीनां चाङ्गाङ्गिभाववैचित्र्यस्यानन्त्याद् द्रुत्यादि- त्वेनास्वादगणना न युक्ता । परब्रह्मास्वादसब्रह्मचारित्वं चास्त्वस्य रसास्वा- दस्य । व्युत्पादनं च शासनप्रतिपादनाभ्यां शास्त्रेतिहासकृताभ्यां विलक्षणम् । यथा रामस्तथाहमित्युपमानातिरिक्तां रसास्वादोपायस्वप्रतिभाविजृम्भारूपां व्युत्पत्तिमन्ते करोतीति कमुपालभामहे । तस्मात्स्थितमेतत्—अभिव्यज्यन्ते रसाः प्रतीत्यैव च रस्यन्त इति । तत्राभिव्यक्तिः प्रधानतया भवत्वन्यथा वा । अर्थ को व्यञ्जित करते हैं' इस कारिका में । इस लिए व्यञ्जकत्व नामक व्यापार से गुण और अलङ्कार के औचित्य आदि रूप इतिकर्तव्यता के द्वारा भावक काव्य रसों को भावित करता है । इस प्रकार तीन अंशों ( साध्य, साधन और इतिकर्तव्यता ) वाली 'भावना' में करण ( साधन ) अंश में 'ध्वनन' ही आता है। भोग भी काव्य-शब्द से नहीं किया जाता है ? ( अर्थात् अवश्य किया जाता है ) । अपि तु वह भोग, जो घने मोहान्धकार की आवृत्ति ( सङ्कटता ) भग्न हो जाने के द्वारा आस्वाद नामधारी एवं द्रुत, विस्तर और विकास रूप है, जब ( उत्पन्न ) किया जाता है, उस स्थिति में लोकोत्तर 'ध्वनन' व्यापार ही मूर्धाभिषिक्त ( प्रधान हेतु ) होता है। वह यह भोगकृत्त्व ( भोजकत्व व्यापार ) रस की ध्वननीयता के सिद्ध हो जाने पर दैवसिद्ध (स्वयंसिद्ध) है, क्योंकि भोग रस्यमानता के कारण उत्पन्न चमत्कार से अनतिरिक्त ( अभिन्न ) है। सत्त्व आदि का अङ्गाङ्गिभावप्रयुक्त वैचित्र्य अनन्त हो जाता है, अतः द्रुति आदि रूप से आस्वाद की गणना ठीक नहीं। इस रसास्वाद का परब्रह्म के आस्वाद के समान होना माना गया है ! ( इस काव्य का ) व्युत्पादन, शास्त्र के शासन और इतिहास के प्रतिपादन से विलक्षण है। 'जैसा राम वैसा मैं हूँ' इस प्रकार के उपमान से अतिरिक्त, रसास्वाद के उपायभूत अपनी प्रतिभा की विजृम्भा ( विकास ) रूप व्युत्पत्ति को पर्यन्त में ( उत्पन्न ) करता है, ऐसी स्थिति में हम किसे उलहना दें। इसलिए यह स्थिर हुआ— रस अभिव्यक्त होते हैं, और प्रतीति के द्वारा ही आस्वादित होते हैं, वह अभिव्यक्ति रसास्वाद प्राप्त करने के पश्चात् पर्यन्त में एक विलक्षण व्युत्पत्ति अनुभव होती है, जिसे 'जैसे राम हैं वैसा मैं हूँ', इस उपमान से अतिरिक्त कहा गया है। ध्वनिवादी लोचनकार का अभिमत यह है कि रस की अभिव्यक्ति होती है और उस अभिव्यक्ति का साधन है व्यञ्जना व्यापार । जब वही अभिव्यक्ति प्रधान होती है तब उसे 'ध्वनि' कहते हैं। और अप्रधान की स्थिति में रसादि अलङ्कार ।