भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

पृष्ठ 261, कुल 680 में से

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पृष्ठ 261

द्वितीय उद्योतः २०१ ध्वन्यालोकः रसभावतदाभासतत्प्रशमलक्षणं मुख्यमर्थमनुवर्तमाना यत्र शब्दार्था- लङ्कारा गुणाश्च परस्परं ध्वन्यपेक्षया विभिन्नरूपा व्यवस्थितास्तत्र काव्ये ध्वनिरिति व्यपदेशः ॥ ४ ॥ प्रधानेऽन्यत्र वाक्यार्थे यत्राङ्गं तु रसादयः । काव्ये तस्मिन्नलङ्कारो रसादिरिति मे मतिः ॥ ५ ॥ यद्यपि रसवदलङ्कारस्यान्यैर्दर्शितो विषयस्तथापि यस्मिन् काव्ये जहाँ रस, भाव, रसाभास, भावाभास, भावप्रशम रूप मुख्य अर्थ का अनुगमन करते हुए शब्द, अर्थ और उनके अलङ्कार और गुण परस्पर ध्वनि की अपेक्षा भिन्न स्वरूप से व्यवस्थित होते हैं उस काव्य में 'ध्वनि' यह व्यपदेश (व्यवहार) होता है॥ अन्यत्र जहाँ वाक्यार्थ के प्रधान होने पर रस आदि अङ्ग हो जाते हैं उस काव्य में रसादि अलङ्कार हैं, यह मेरी मति (सिद्धान्त) है। यद्यपि रसवत् अलङ्कार का विषय दूसरों ने दिखाया है तथापि प्रधान रूप से लोचनम् प्रधानत्वे ध्वनिः, अन्यथा रसाद्यलङ्काराः । तदाह—मुख्यमर्थमिति । व्यवस्थिता इति । पूर्वोक्तयुक्तिभिर्विभागेन व्यवस्थापितत्वादिति भावः ॥ ४ ॥ अन्यत्रेति । रसस्वरूपे वस्तुमात्रेऽलङ्कारतायोग्ये वा । मे मतिरित्यन्यपक्षं दूष्यत्वेन हृदि निधायाभीष्टत्वात्स्वपक्षं पूर्वं दर्शयति—तथापीति । स हि पर- दर्शितो विषयो भाविनीत्या नोपपन्न इति भावः । यस्मिन् काव्ये इति स्पष्टत्वे- नासङ्गतं वाक्यमित्थं योजनीयम्-यस्मिन् काव्ये ते पूर्वोक्ता रसादयोऽङ्गभूता वाक्यार्थीभूतान्योऽर्थः, चशब्दस्तुशब्दस्यार्थे; तस्य काव्यस्य सम्बन्धिनो ये रसादयोऽङ्गभूतास्ते रसादेरलङ्कारस्य रसवदाद्यलङ्कारशब्दस्य विषयाः; स एवालङ्कारशब्दवाच्यो भवति योऽङ्गभूतः, न त्वन्य इति यावत् । अत्रोदाहरण- प्रधान रूप से हो अथवा अन्यथा (अप्रधान) रूप से। प्रधान होने पर 'ध्वनि' होगी; अन्यथा रसादि अलङ्कार । उसे कहते हैं—मुख्य अर्थ—। व्यवस्थित—। भाव यह कि पहले कही गई युक्तियों से विभाग के द्वारा व्यवस्थापित किए जा चुके हैं ॥ ४ ॥ अन्यत्र— । रसस्वरूप, वस्तुमात्र अथवा अलङ्कारता के योग्य वाक्यार्थ। मेरी मति— । इस कथन से दूसरे पक्ष को हृदय में दूषणीय मानकर, अभीष्ट होने के कारण अपने पक्ष को पहले दिखाते हैं—तथापि— । भाव यह कि वह परदर्शित विषय वक्ष्यमाण नीति के अनुसार उपपन्न नहीं है, जिस काव्य में यह स्पष्ट रूप से असङ्गत वाक्य इस प्रकार लगाना चाहिए—जिस काव्य में वे पूर्वोक्त रसादि अङ्गभूत हों और अन्य अर्थ वाक्यार्थीभूत (प्रधान अर्थ) हो, ('च' शब्द 'तु' शब्द के अर्थ में है); उस काव्य के सम्बन्धी जो रसादि अङ्गभूत हैं, वे रसादि अलङ्कार के—'रसवदादि- अलङ्कार' शब्द के—विषय हैं; वही 'अलङ्कार' शब्द का वाच्य होता है जो अङ्गभूत