ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२०२ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः प्रधानतयाऽन्योऽर्थो वाक्यार्थीभूतस्तस्य चाङ्गभूता ये रसादयस्ते रसादेरलङ्कारस्य विषया इति मामकीनः पक्षः । तद्यथा चाटुषु प्रेयोऽ- लङ्कारस्य वाक्यार्थत्वेऽपि रसादयोऽङ्गभूता दृश्यन्ते । अन्य अर्थ जिस काव्य में वाक्यार्थ हो और उसके जो रसादि अङ्ग हों वे रसादि अलङ्कार के विषय हैं यह मेरा पक्ष है। वह जैसा कि चाटु के विषयों में प्रेयोऽलङ्कार के मुख्य वाक्यार्थ होने पर भी रसादि अङ्गभूत देखे जाते हैं। लोचनम् माह—तद्यथेति । तदित्यङ्गत्त्वम् । यथात्र वक्ष्यमाणोदाहरणे, तथान्यत्रापीत्यर्थः । भामहाभिप्रायेण चाटुषु प्रेयोऽलङ्कारस्य वाक्यार्थत्वेऽपि रसादयोऽङ्गभूता दृश्यन्त इतीदमेकं वाक्यम् । भामहेन हि गुरुदेवनृपतिपुत्रविषयप्रीतिवर्णनं प्रेयोऽलङ्कार इत्युक्तम् । तत्र प्रेयानलङ्कारो यत्र स प्रेयोऽलङ्कारोऽलङ्करणीय इहोक्तः । न त्वलङ्कारस्य वाक्यार्थत्वं युक्तम् । यदि वा वाक्यार्थत्वं प्रधानत्वम् । चमत्कार- होता है, न कि दूसरा । यहाँ उदाहरण कहते हैं—वह, जैसा कि— । 'वह' अर्थात् अङ्गत्व । अर्थात् जैसे यहाँ वक्ष्यमाण उदाहरण में, उसी प्रकार अन्यत्र भी । भामह¹ के अभिप्राय से 'चाटु के विषयों में प्रेयोऽलङ्कार के वाक्यार्थ होने पर भी रसादि अङ्गभूत देखे जाते हैं' यह एक वाक्य है। क्योंकि भामह ने कहा है कि गुरु, देवता, नृपति, पुत्र के विषय में प्रीति का वर्णन 'प्रेयोऽलङ्कार' है, यह कहा है। 'प्रेयान् (प्रियतम) जहाँ अलङ्कार है वह 'प्रेयोऽलङ्कार'² अलङ्करणीय यहाँ कहा गया है । क्योंकि 'अलङ्कार' का वाक्यार्थत्व ठीक नहीं। यदि वा वाक्यार्थत्व अर्थात् प्रधानत्व या चमत्कारकारिता । उद्भट² के मतानुयायी लोग (इस वाक्य को) टुकड़े करके व्याख्यान १. भामह के अभिप्राय से यह एक ही वाक्य है कि चाटु या प्रशंसाविषयक स्थलों में प्रेयो- लङ्कार की होती है अतः वहां रसादि अङ्गभूत हो जाते हैं। भामह के अनुसार गुरु, देवता, नृपति, पुत्र के सम्बन्ध में प्रीति का वर्ण 'प्रेयोऽलङ्कार' है। इसलिए भामह के अनुसार 'प्रेयोऽलङ्कार' का विग्रह होगा 'प्रेयान् अलङ्कारो यत्र' अर्थात् जहां अतिशय प्रिय प्राणी अलङ्कार या वर्णन का विषय हो वह 'प्रेयोऽलङ्कार' है। इसलिए प्रस्तुत में 'प्रेयोऽलङ्कार' वाक्यार्थ होने के कारण अलङ्कार नहीं बल्कि स्वयं अलङ्करणीय है। 'वाक्यार्थ' का दूसरा अर्थ प्रधानत्व है, अर्थात् चमत्कारकारी होना । २. इस व्याख्यान के विपरीत उद्भट के मतानुयायी लोग इसका वाक्यभेद करके व्याख्यान करते हैं। उनका कहना है कि पूर्व वाक्य में रसवदलङ्कार के विषय होने की चर्चा है, यहां उत्तर वाक्य में चाटुओ के वाक्यार्थ होने की स्थिति में प्रेयोऽलङ्कार का भी विषय है, यह बात कही गई है। यह तात्पर्य 'अपि' या 'भी' शब्द के वाक्य में प्रयोग से प्रतीत होता है, अर्थात् केवल रसवदलङ्कार का ही नहीं, अपितु प्रेयोऽलङ्कार का भी विषय है। उद्भट के मत में 'भावालङ्कार' (जिसमें रत्यादि भावों का वर्णन हो) ही प्रेयोऽलङ्कार है।