ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वितीय उद्योतः २०३ ध्वन्यालोकः स च रसादिरलङ्कारः शुद्धः सङ्कीर्णो वा । तत्राद्यो यथा— किं हास्येन न मे प्रयास्यसि पुनः प्राप्तश्चिराद्दर्शनं केयं निष्करुण प्रवासरुचिता केनासि दूरीकृतः । वह रसादि-अलङ्कार शुद्ध अथवा सङ्कीर्ण (दो प्रकार का) होता है। उनमें पहला, जैसे— ‘मजाक से क्या लाभ ! बहुत देर के बाद दर्शन देकर फिर तुम मुझ से दूर नहीं जा सकते । हे निष्करुण, यह प्रवास में तेरी रुचि कैसी ? किसने तुम्हें दूर कर दिया ?’ लोचनम् कारितेति यावत् । उद्भटमतानुसारिणस्तु अङ्क्त्वा व्याचक्षते—चाटुषु चाटु- विषये वाक्यार्थत्वे चाटूनां वाक्यार्थत्वे प्रेयोऽलङ्कारस्यापि विषय इति पूर्वेण सम्बन्धः । उद्भटमते हि भावालङ्कार एव प्रेय इत्युक्तः, प्रेम्णा भावानामुपलक्ष- णात् । न केवलं रसवदलङ्कारस्य विषयः यावत्प्रेयःप्रभृतेरपीत्यपिशब्दार्थः । रसवच्छब्देन प्रेयःशब्देन च सर्व एव रसवदाद्यलङ्कारा उपलक्षिताः, तदेवाह— रसादयोऽङ्गभूता दृश्यन्त इति । उक्तविषय इति शेषः । शुद्ध इति । रसान्तरेणाङ्गभूतेनालङ्कारान्तरेण वा न मिश्रः, आमिश्रस्तु सङ्कीर्णः । स्वप्नस्थानुभूतसदृशत्वेन भवनमिति हसन्नेव प्रियतमः स्वप्नेऽवलो- कितः । न मे प्रयास्यसि पुनरिति । इदानीं त्वां विदितशठभावं बाहुपाशबन्धान्न करते हैं—चाटु अर्थात् चाटुविषय के वाक्यार्थ होने पर ‘प्रेयोऽलङ्कार’ का भी विषय है, यह पहले से सम्बन्ध (अन्वय) है । क्योंकि उद्भट के मत में भावालङ्कार ही ‘प्रेयस्’ कहा गया है, प्रेम से भाव का उपलक्षण है । ‘अपि’ (या ‘भी’) शब्द का अर्थ है कि न केवल रसवदलङ्कार का, अपितु प्रेयःप्रभृति अलङ्कार का भी विषय है । ‘रसवत्’ शब्द से और ‘प्रेयस्’ शब्द से सभी ‘रसवदादि-अलङ्कार उपलक्षित हैं, उसी को कहते हैं—‘रसादि अङ्गभूत देखे जाते हैं’ यह उक्त विषय है । शुद्ध—। अर्थात् अङ्गभूत किसी रस अथवा किसी अलङ्कार से न मिला हुआ; और जो मिला हुआ (आमिश्र) है वह ‘सङ्कीर्ण’ है । अनुभव किए हुए के सदृश ही स्वप्न होता है, अतः हंसता हुआ ही प्रियतम स्वप्न में देखा गया । फिर तुम मुझसे दूर नहीं जा सकते—। जब तुम्हारा शठभाव (छिपकर प्रतिकूल आचरण) जान लिया है, ऐसी स्थिति में बाहुपाश के बन्धन से नहीं छोड़ूंगी । अतएव रिक्तबाहु- १. जहां भी ‘रसादि’ शब्द का प्रयोग है उससे रस के साथ भाव, तदाभास (रसाभास और भावाभास) तथा भावशान्त्यादि (यहां ‘आदि’ पद से भावोदय, भावसन्धि और भावशबलता गृहीत हैं) गृहीत होते हैं। ये रसादि किसी के अङ्ग के रूप में होने पर क्रमशः रसवत्, प्रेय, ऊर्जस्वि और समाहित अलङ्कार के नाम से अभिहित होते हैं । अर्थात् रस, अङ्ग होने पर ‘रसवदलङ्कार’, भाव, अङ्ग होने पर ‘प्रेयोऽलङ्कार’, तदाभास (रसाभास और भावाभास) अङ्ग होने