ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२०४ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः स्वप्नान्तेष्विति ते वदन् प्रियतमव्यासक्तकण्ठग्रहो बुद्ध्वा रोदिति रिक्तबाहुवलयस्तारं रिपुस्त्रीजनः ॥ इस प्रकार स्वप्न में प्रिय के कण्ठ में बाहें डाले कहती हुई तुम्हारी रिक्तबाहुवलय वाली रिपु-स्त्रियाँ जग कर जोर से रुदन करती हैं । लोचनम् मोद्यामि । अत एव रिक्तबाहुवलय इति । स्वीकृतस्य चोपालम्भो युक्त इत्याह- केयं निष्करुणेति । केनासीति । गोत्रस्खलनादावपि न मया कदाचित्खेदितोऽसि । स्वप्नान्तेषु । स्वप्नायितेषु सुप्तप्रलपितेषु पुनःपुनरुद्भूततया बहुष्विति वदन्त्युष्माकं सम्बन्धी रिपुस्त्रीजनः प्रियतमे विशेषेणासक्तः कण्ठग्रहो येन तादृश एव सन् बुद्ध्वा शून्यवलयाकारीकृतबाहुपाशः सन् तारं मुक्तकण्ठं रोदितीति । अत्र शोक- स्थायिभावेन स्वप्नदर्शनोद्दीपितेन करुणरसेन चर्व्यमाणेन सुन्दरीभूतो नरपति- प्रभावो भातीति करुणः शुद्ध एवालङ्कारः । न हि त्वया रिपवो हता इति यादृग- नलङ्कृतोऽयं वाक्यार्थस्तादृगयम्, अपि तु सुन्दरतरीभूतोऽत्र वाक्यार्थः, सौन्दर्यं च करुणरसकृतमेवेति । चन्द्रादिना वस्तुना यथा वस्त्वन्तरं वदनाद्यलङ्क्रियते तदुपमितत्वेन चारुतायावभासात् । तथा रसेनापि वस्तु वा रसान्तरं वोपस्कृतं सुन्दरं भाति इति रसस्यापि वस्तुन इवालङ्कारत्वे को विरोधः ? वलय— । अपने आदमी को उलहना उचित है, इसलिए कहते हैं—हे निष्करुण यह प्रवास में— । किस ने— । कभी मैंने गोत्रस्खलन ( अन्य प्रिय का नामग्रहण ) आदि द्वारा भी तुम्हें खिन्न नहीं किया है । स्वप्नान्त अर्थात् सपनाने की स्थिति के प्रलापों में, बार-बार उत्पन्न होने के कारण बहुत से, इस प्रकार प्रलाप करती हुई तुम्हारी रिपु-स्त्रियाँ, प्रियतम में विशेष रूप से आसक्त किया है कण्ठग्रह को जिन्होंने, ऐसी ही अवस्था में जग कर, वलय से शून्यता की स्थिति को प्राप्त बाहुपाश वाली वे अधिक स्वर में अर्थात् मुक्तकण्ठ, रुदन करती हैं । यहाँ शोक जिसका स्थायी भाव है, और जो स्वप्न-दर्शन से उद्दीपित है ऐसे चर्वित होते हुए करुणरस से सुन्दर बना राजा का प्रभाव शोभावान् होता है, इस प्रकार करुण शुद्ध अवस्था में ही अलङ्कार है । 'तुमने शत्रुओं को मार डाला है' यह जिस प्रकार का अलङ्कारहीन वाक्यार्थ है उस प्रकार का यह नहीं है, बल्कि यहाँ सुन्दरतर वाक्यार्थ बन पड़ा है, और सौन्दर्य करुणरस के द्वारा ही है । चन्द्रादि पदार्थों से उस प्रकार दूसरा पदार्थ मुख आदि अलङ्कृत होता है, क्योंकि चन्द्र द्वारा उपमित होने से वह चारुरूप से मालूम होने लगता है । उसी प्रकार रस से भी वस्तु अथवा रसान्तर उपस्कृत होकर सुन्दर हो जाता है, इस प्रकार रस का भी, वस्तु की भाँति, अलङ्कार होने में क्या विरोध है ? पर 'ऊर्जस्वि' और भावशान्त्यादि, अङ्ग होने पर 'समाहित' कहलाते हैं । इस प्रकार 'रसादि' और 'रसवदाद्यलङ्कार' को प्राधान्य और अप्राधान्य मूलक रूप में सर्वत्र समझना चाहिए ।